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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- "अखतरिया...कहां गै, कोन जनी?..."

जुन्ना चांउर,  अउ जुन्ना शराब (पुरानी शराब) बने सुहाथे, मिठाथे. अब ओकर मरम ला उही मन जानही जउन एकर सुवाद लेथे. वइसने जतका जुन्ना कलाकृति, साहित्य, भाखा इहां तक जतका जुन्ना मनखे (वयोवृद्ध) होथे तेन मन बहुत काम के होथे. जेन पारखी होथे तउने ओकर कीमत ला जान सकत हे. अड़ानी (अज्ञानी) मन का समझही ओला. ओकर मन बर तो हीरा घला हा पथरा बरोबर हे.

जुन्ना चांउर, अउ जुन्ना शराब (पुरानी शराब) बने सुहाथे, मिठाथे. अब ओकर मरम ला उही मन जानही जउन एकर सुवाद लेथे. वइसने जतका जुन्ना कलाकृति, साहित्य, भाखा इहां तक जतका जुन्ना मनखे (वयोवृद्ध) होथे तेन मन बहुत काम के होथे. जेन पारखी होथे तउने ओकर कीमत ला जान सकत हे. अड़ानी (अज्ञानी) मन का समझही ओला. ओकर मन बर तो हीरा घला हा पथरा बरोबर हे.

जुन्ना चांउर, अउ जुन्ना शराब (पुरानी शराब) बने सुहाथे, मिठाथे. अब ओकर मरम ला उही मन जानही जउन एकर सुवाद लेथे. वइसने जतका जुन्ना कलाकृति, साहित्य, भाखा इहां तक जतका जुन्ना मनखे (वयोवृद्ध) होथे तेन मन बहुत काम के होथे. जेन पारखी होथे तउने ओकर कीमत ला जान सकत हे. अड़ानी (अज्ञानी) मन का समझही ओला. ओकर मन बर तो हीरा घला हा पथरा बरोबर हे.

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”अखतरिया… कहां गै, कोन जनी?…

जुन्ना-नवा के बात निकलगे तब एक ठन पता के बात बताय बर चाहत हौं. परनदिन का होइस, एक झन सियनहा साहित्यकार उटपुटांग बेरा में दमक दीस. न दिन रिहिसे, न रात. दीया-बाती के बेरा रिहिसे. अचानक स्कूटर दबावत घर केदुआरी मं धमक दीस. अतका बेर नहाय बर चल दे रहेंव. ए मोर दिनचरया में शामिल हे. नांव ले के हुंकारू पारथे. बेटी निकलिस नइ पहिचाने सकिस ओला. अपन परिचय देवत पूछिस- फलाना हावय का? हां हावय नहावत हे, बेटी जब ओला बतइस तब किहिस- बता दे जाके फलाना जी आय हे. बेटी आके बताथे. नाहत रेहेंव तउन लकर-धकर पोंछ-पाछ के तौलिया अउ सलूखा ला पहिन के आयेंव, राम-रमउवा करेंव.

दुआरी मं कनेर के छोटे जनिक पेड़ हे, बने घन-घन ले फूल फूले हे. बइठक रूम मं नइ बइठ के अंगना मं बइठना पसंद करिस. बने फुर-फुर पुरवाही चलत रिहिसे. कुरसी मं बइठे के पहिली ओह कहिथे- अरे मैं अटक गे हौं, तेकरे सेती तोर में आये हौं, डर्रागेंव का बात होगे, अइसन वइसन कउनो का बात हें? संशो मं परगेंव, अटकगे हौं काहत हे तब जरूर कोनो खास बात हे.
ओला पूछथौं- बने फोर के बता न का बात हे, डर्रागें हौं. अरे अइसन-वइसन कांही बात नोहय. ओहर बताथे- अरे तैं तो किताब लिखे हस ना ”ओ माँ” तेमा एक जघा अटकगे हौं, दिमाग नइ पूरत हे धूरा ला पटक दे हौं गरियार बइला-भइसा बरोबर, ओतेक दिमाग ला तुतारी मारत हौं, कोचकत हौं फेर दिमाग टस के मस नइ होवत हे. ओहर पकड़ मं आबे नइ करत हे.

का बात पकड़ मं न नइ आवत हे गा, सियनहा तेमा धूरा ला पटक देहौं कहिथस? ओहर बताथे- तीन-चार दिन ले परेसान हौं, एक जघा तैं लिख दे हस, ‘अखतरिया’, तब ये बता ये ‘अखतरिया’ का होथे? मैं अपन अक्कल भिड़ावत हौं, अउ सोचत हौं- ये अखतरिया का बला हे, ये पगतरिया तो नोहय?

मैं ओला बतायेंव- ते पहुंचे बर तो सही सही रस्दा मं आगे हस, बग ला पाले हस फेर थोरेचकिन के फरक हे. ओला पूछथौं- अच्छा तैं बता- ओकर का मतलब निकालत हस? ओहर बताथे- पांव मं पहिनथे तउने ला कहिथे, धन का? मैं केहेंव- बिल्कुल सही उत्तर भिड़ाय हस गा. ओला छत्तीसगढ़ मं अखतरिया कहिथे अउ तुंहर कोती के मन का कहिथे तउन ला ओला तुमन जानौ?
अखतरिया नहीं ओला पगतरिया कहिथे. ओ सियनहा हा अपन विचार रखथे. मैं केहेंव- नहीं गा, ओला हमर कोती सबो झन अखतरिया कहिथे. चमड़ा के बने रहिथे. मेहर जाति के जउन चर्मकार होथे तउन मन बनाथे.

फेर अब एहर चलन के बाहिर होगे हे. कोनो माई लोगिन के पांव मं अब अखतरिया देखे ले नइ मिलत हे. नवा जमाना के नवा फैशन आगे हे. अब ये धीरे-धीरे नंदावत जात हे या केहे जाय के नंदागे हे जान. पहिली खेतखार जांय या फेर गांव-गंवई जाना-आना होवय तब अखतरिया पहिन के जांय.

सियनहा कहिथे- नवा जमाना के अब नवा चलन आगे हे संगवारी. अब कोने नइ पहिनय अखतरिया ला, आजकल के बहू-बेटी के आन-मान-शान हा घट नइ जाही. फैशन के जमाना हे, टीपटॉप दिखही सिनेमा, टीवी सीरियल के हिरोइन असन तभे तो ओमन ला बहू-बेटी कइही? अखतरिया ला पहिनही तब नाक नइ कटा जही, जकड़बही, भूतही, बही, पगली असन नइ कहि दिही. कहां हजार , पांच सौ के जूती अउ कहां पच्चीस-तीस रुपइया के अखतरिया, अंतर तो होथे रे भई.

दूनो झन खिलखिलाके हांस भरथे. मैं केहेंव- सियनहा, देख ले संसार कोन डाहर जात हे? अखतरिया हा सुक्खा अउ चउमास मं घला काम आथे, कांटा-खूंटी, खेत-खार, नरवा, तरिया सबो कोती पहिन के रेंग जा, कांही फरक नइ परना हे फेर ये हजार रुपइया के जूती सिरिफि कोनो तिहार, परब अउ समारोह होवत हे तेंने भर के पूरती हे.

सिनहा बताथे- ”ओ मां” किताब हा लगथे अपन मां (महतारी) ला सपरपित करे हस तइसे लागथे. शुरू ले आखिरी तक उकरे ऊपर लिखे हस. अच्छा लगिसे, जुन्ना मनखे के जुन्ना विचार हा ओ मां ला पढेंव तब जाने-समझे ले मिलिस. अउ सबले बढिय़ा के किताब मं जुन्ना-जुन्ना जिनिस मिलिस, जउन आज नंदावत जात हे, ओला बचा करके संजो के रखे के कोशिश करे हस. नीक लगिसे, तोर संग भेंट करके, गोठ-बात करके. मोर पियास बुझागे ओला जाने खातिर बिन पानी मछरी कस छटपटावत रेहेंव.
सियनहा उठे ले धरथे ततके बेर बेटी घला गरम-गरम चाय ले के आगे. ये बीच आधा-एक घंटा कइसे बिलमगे, पता नइ चलिस, रात ह दिन अजगर सही निगल गे रहिथे. ओहर उठथे अउ कहिथे- ले मैं चलथौं फिर कभू मिलबो, गोठियाबो, अच्छा लगिस, बात करके. गाड़ी सुरू करिस, मैं जोहार करेंव तहां ले चलते बनिस.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Articles in Chhattisgarhi, Chhattisgarhi, Chhattisgarhi Articles

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