बस्तर में एड्स पीड़ितों की संख्या 700 के पार

बस्तर में एड्स पीड़ितों की संख्या 700 के पार
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में लाइलाज बीमारी एड्स के बढ़ते मरीजों ने स्वास्थ्य विभाग और शासन को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में लाइलाज बीमारी एड्स के बढ़ते मरीजों ने स्वास्थ्य विभाग और शासन को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में लाइलाज बीमारी एड्स के बढ़ते मरीजों ने स्वास्थ्य विभाग और शासन को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। संभाग में एड्स के मरीजों की संख्या 700 को पार कर गई है। सूत्रों की मानें तो कुछ महीनों में ही मरीजों की बढ़ती संख्या चिंताजनक है। संभाग के एआरटी सेंटर में 6 से 8 मरीजों की रोजाना पुष्टि हो रही है। चिंताजनक पहलू तो यह भी है कि इसकी चपेट में सेना के कुछ जवान भी आ गए हैं।

बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ में एड्स के लगभग 15 हजार मरीज है। इस बीमारी के मरीजों की सूबे में लगातार संख्या बढ़ रही है। बात यदि बस्तर संभाग की बात की जाए तो 8 फरवरी 2008 के बाद से इस बीमारी की जांच और पहचान का काम शुरू हुआ है। अब तक यह संख्या 705 तक पहुंच गई है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि बस्तर के सीधे-साधे लोग परंपरागत रिवाजों को मानते हैं। शिक्षा का अभाव और जागरूकता की कमी इस बीमारी का सबसे बड़ा शत्रु है।

मरीज की उम्र इलाज के अभाव में केवल 9 से 10 साल ही रह जाती है। एआरटी सेंटर खुलने के बाद इन मरीजों को बड़ी राहत मिली है। मरीज को इलाज और खानपान के विषय में गहराई से बताया जा रहा है, जिससे उन मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े साथ ही मरीजों के घटती उम्र के औसत को भी बचाया जा सके। बस्तर में 18 माह के बच्चों से लेकर 17 साल के मरीजों की संख्या 45 है। ये वे लोग हैं जिनकी जानकारी विभाग के पास उपलब्ध है।



सूत्रों का कहना है कि यह संख्या अधिक भी हो सकती है। कई लोग तो गांव में इस बीमारी से ग्रस्ति होकर मौत के घाट उतर जाते हैं। संभाग में एड्स बड़े शहरों की तरह तेजी से फैल रहा है। बताया जाता है कि संभाग में तैनात सीआरपीएफ के जवान भी इस बीमारी से पीड़ित है। सूत्रों की मानें तो सात जवान सेना के भी हैं और इनका बकायदा इलाज भी चल रहा है। इन जवानों के लिए एक बात जरूर लाभप्रद है कि ये लोग शिक्षित हैं, जिसके कारण इलाज करने में आसानी हो जाती है। ये जवान समय पर आकर उपचार करवाते हैं, जिससे कम हुई सफेद रक्त कणिकाओं में बढ़ोतरी के लिए बेहतर उपचार और सलाह दी जाती है। इन रक्त कणिकाओं के बढ़ने से पीड़ित मरीज की उम्र बढ़ जाती है।
सूबे में पांच एआरटी सेंटर हैं। इसमें जो मशीनें हैं वो अमेरिका से आई हैं। इन मशीनों की देखरेख के लिए इंजीनियर भी अमेरिका से शिक्षण लेकर आए हैं। यह मशीनें बड़ी कीमती होती हैं। एक बार खराब होने पर इंजीनियर की कमी के चलते हफ्तो जांच बाधित हो जाती है। इसके बाद भी इस बीमारी से लड़ने और जागरूकता फैलाने के लिए शासन पुरजोर कोशिश करने में लगा हुआ है।

एआरटी सेंटर जगदलपुर के डाक्टर सोमेश पांडे के अनुसार पहले जागरूकता ही बचाव था। अब तो एआरटी सेंटर होने से मरीजों का जीवन काल पूरी उम्र पा सकता है, बशर्ते वह सही समय पर इलाज और सलाह लेता रहे। बस्तर में बढ़ती एड्स के मरीजों की संख्या चिंता का बड़ा विषय बनती जा रही है। बहरहाल नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में इस बीमारी के पीड़ितों की संख्या बढ़ना शासन प्रशासन दोनों ही के लिए चिंता का विषय बन गई है।

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