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सूखे बुंदेलखंड के पहाड़ पर 'जलपरी' की खेती!

बुंदेलखंड में अवैध खनन के कारोबार से जुड़े माफिया यहां एक पहाड़ी में 'जलपरी' की खेती यानी मत्स्य पालन भी कर रहे हैं।

बुंदेलखंड में अवैध खनन के कारोबार से जुड़े माफिया यहां एक पहाड़ी में 'जलपरी' की खेती यानी मत्स्य पालन भी कर रहे हैं।

बुंदेलखंड में अवैध खनन के कारोबार से जुड़े माफिया यहां एक पहाड़ी में 'जलपरी' की खेती यानी मत्स्य पालन भी कर रहे हैं।

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    बांदा। बुंदेलखंड में अवैध खनन के कारोबार से जुड़े माफिया यहां एक पहाड़ी में 'जलपरी' की खेती यानी मत्स्य पालन भी कर रहे हैं। आप हैरत में पड़ गए होंगे कि जहां बूंद-बूंद पानी को पौधे तरस रहे हों, वहां मत्स्यपालन कैसे संभव है? मगर यह सच है। माफियाओं ने मानक के विपरीत खनन कर पहाड़ को तालाब में बदल दिया है और वे यहां मछली पालन कर रहे हैं।

    बुंदेलखंड में मछुआरा समुदाय के लोग मत्स्य पालन के लिए एक अदद तालाब के लिए भले ही तरस रहे हों, मगर यहां के खनन माफियाओं की चांदी है। पहले तो वे काले सोने (ग्रेनाइट पत्थर) की लालच में मानकों के विपरीत पहाड़ों का सीना चीरते हैं, बाद में तालाब में तब्दील हो चुके पहाड़ों पर 'जलपरी' की खेती करते हैं और इस तरह वे दोहरा लाभ कमा रहे हैं।

    इसकी बानगी बांदा जिले के नरैनी कस्बे से सटे रामचंद्रन पहाड़ पर आसानी से देखने को मिल जाएगी। यह पहाड़ी पूर्ववर्ती मायावती सरकार में खनिज मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा और इसी दल के पूर्व विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के रिश्तेदारों को संयुक्त रूप से शासकीय शर्तों के साथ आवंटित है। मगर डायनामाइट के विस्फोट के जरिए एक सौ फीट से ज्यादा की गहराई का 'काला सोना' (ग्रेनाइट पत्थर) खोद कर बेंच लिया, जिससे यह भारी-भरकम पहाड़ गहरे तालाब में बदल चुका है। अब खनन माफियाओं के गुर्गे यहां जलपरी की खेती (मत्स्यपालन) कर रहे हैं। पहाड़ में बने तालाब की गहराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चंद किलोमीटर की दूरी पर बह रही केन नदी का जल स्तर सिकुड़ जाता है, मगर पहाड़ के तालाब में साल भर पानी बना रहता है।

    स्थानीय सूत्रों ने बताया कि करीब ढाई एकड़ के इस पहाड़ी तालाब में इस साल पैंतीस हजार मछली के बीज डाले गए हैं, लेकिन मत्स्य पालन और खनिज विभाग के अधिकारी इससे अनजान हैं।

    बांदा में तैनात जिला खनिज अधिकारी अरविंद दास का कहना है कि नरैनी के रामचंद्रन पहाड़ का दो-तिहाई भाग राज्य के पूर्व खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के रिश्तेदार के नाम व शेष एक-चौथाई भाग पूर्व विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के रिश्तेदार प्रमोद पांडेय के नाम शासकीय शर्तों के साथ तीन साल पहले आवंटित हुआ था। दास ने कहा कि पहाड़ में ग्रेनाइट पत्थर निकालने की गहराई और अब मत्स्य पालन की जानकारी नहीं है।

    इसी तरह चित्रकूटधाम परिक्षेत्र, बांदा में तैनात मत्स्य पालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. आर के गौड़ ने बताया कि बांदा जिले में करीब सात सौ तालाबों में मत्स्य पालन किया जा रहा है, पहाड़ में मत्स्य पालन की सूचना नहीं है। अपर जिला अधिकारी (एडीएम) बांदा विजय बहादुर सिंह का कहना है कि पहाड़ में मत्स्य पालन किए जाने की जानकारी मीडिया से मिली है, उपजिला अधिकारी नरैनी को भेज कर जांच कराएंगे।

    इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी भले ही अवैध और मानक के विपरीत खनन करने या पहाड़ में मत्स्य पालन से बेखर हों, परन्तु पहाड़ में पत्थर तोड़ने का काम करने वाले कामगार लल्लू का कहना है कि इस पहाड़ में पिछले दो साल से मत्स्य पालन किया जा रहा है। उसने बताया कि पिछले साल इस पहाड़ी तालाब से करीब ढाई लाख रुपए की मछली निकाली गई थी।

    एक अन्य कामगार ने बताया कि मछली पालन का व्यवसाय पत्थर ठेकेदार और अन्य लोग बटाई (अधिया) पर कर रहे हैं। उसने बताया कि इस साल तालाब में करीब पैंतीस हजार बीज डाले गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि खनन कारोबारी जहां रवन्ना (राजस्व) की चोरी और अवैध खनन से सरकार को चूना लगा रहे हैं, वहीं बेतुकी खोदाई कर पहाड़ों का अस्तित्व भी खतरे में डाल रहे हैं।

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