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बुक फेयर: पुस्तक मेला या विमोचन मेला?

बुक फेयर: पुस्तक मेला या विमोचन मेला?

इन दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा है। पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों से ज्यादा भीड़ प्रोफेशनल साहित्यकारों की है।

इन दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा है। पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों से ज्यादा भीड़ प्रोफेशनल साहित्यकारों की है।

इन दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा है। पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों से ज्यादा भीड़ प्रोफेशनल साहित्यकारों की है।

    श्रवण शुक्ल, नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले से।

    नई दिल्ली। इन दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा है। पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों से ज्यादा भीड़ प्रोफेशनल साहित्यकारों की है। जी हां! प्रोफेशनल साहित्यकारों की। ऐसे साहित्यकार, जिन्होंने भले ही जीवन भर साहित्य को गरियाया हो और बुढ़ौती में एक किताब लिख दी हो, वो हर दिन किसी न किसी साहित्यकार को पकड़कर लाते हैं और अपनी पुस्तक का विमोचन कराते हैं। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान भीड़ के रूप में साहित्यप्रेमी नहीं, बल्कि लेखक के आत्मीय व्यक्ति होते हैं। भले ही कड़वी बात हो, पर सच यही है।

    पुस्तक मेले की बात करें तो हर दिन यहां दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों का लोकार्पण नामी-गिरामी साहित्यकार करते हैं। वो साहित्यकार, जो अपना लिखा कभी दूसरी बार न पढ़ पाते हों और न ही विमोचित हो रही पुस्तक को पढ़ा हो। लेकिन लेखक मंच पर शान से पुस्तकों को हाथ में लेकर फोटो खिंचवाने की प्रक्रिया लगातार चलती रही है। एक पुस्तक के बाद दूसरी पुस्तक और उस पर लंबी-लंबी निरर्थक चर्चाएं। जिनका वाकई कोई मतलब नहीं निकलता। ये चर्चाएं न तो आम साहित्यप्रेमियों तक पहुंचती हैं, और न ही उन्हें याद रहती हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले ही उस किताब के बारे में ‘बहुत अच्छी-अच्छी’ बातें की होती हैं।

    पुस्तक विमोचन के इस कार्यक्रम को करने कराने में न तो बड़े प्रकाशक पीछे हैं और न ही छोटे प्रकाशक। पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित तो होती है, लेकिन महज मंचीय हसी-मजाक से आगे कोई बात बढ़ ही नहीं पाती। परिणति होती है चाय-पान से। और फिर परिचितों के हाथ में पुस्तकें थमाकर विदा कर दिया जाता है। यहां पुस्तकों और उनके लेखकों के बारे में इसलिए नहीं लिखा जा रहा, क्योंकि उन्हें बुरा लग सकता है। अब बुरा लगे भी तो क्या कर सकते हैं, क्योंकि जन्नत की हकीकत उन्हें भी मालूम है। और हां, इन लोकार्पण कार्यक्रमों की इतनी बाढ़ है कि सोशल मीडिया पर ऐसे साहित्यकारों की ओर से तस्वीरों के लगाए जाने का जो सिलसिला 15 फरवरी से शुरू हुआ है, वो महीनों चलने वाला है।

    वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय का कहना है कि पुस्तक मेले का नाम बदलकर विमोचन मेला कर देना चाहिए। कम से कम हिंदी के हॉल का नाम तो विमोचन हॉल कर ही देना चाहिए। यहां विमोचनों का रेला चल रहा है। कुछ ऐसा ही हाल मयंक सक्सेना का है। मयंक कहते हैं कि पुस्तक मेले में पुस्तक विमोचन की तस्वीरें देखकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि किसे पढ़ा जाए। आज हर लेखक को विमोचन की पड़ी है। मयंक का कहना है कि इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि आप इस मौके पर दोस्तों से मिलें, लेकिन जो लोग लेखक और कवि होने का दावा करते हैं। क्या वो सिर्फ इसीलिए पुस्तक मेले जाते हैं? क्या विमर्श और साहित्य के लिए पुस्तक मेले में कोई जगह नहीं।

    पुस्तक मेले में मॉडल टॉउन से लगभग हर रोज अच्छी पुस्तकों की तलाश में आ रहे राहुल खन्ना का कहना है कि वो पुस्तकों की तलाश में आते हैं। पुस्तकें लेते हैं और तमाम तस्वीरें खींचकर उल्टे पांव वापस लौट जाते हैं। राहुल की उम्र लगभग 35 साल है, लेकिन इस बार उन्हें पुस्तक मेले में वो रस नहीं दिख रहा, जो अबतक दिखा करता था। ऐसे ही पुस्तक विमोचनों से परेशान गिरीश शर्मा का कहना है कि वो पुस्तक मेले का नाम विमोचन मेला करने की गुहार लगाने वाले हैं।

    Tags: New Delhi, Pragati maidan

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