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सूखे से लड़ने के लिए बुंदेलखंड वासियों ने कसी कमर

देश का बुंदेलखंड इन दिनों सूखे को लेकर चर्चा में है। सरकारें यह बताने में जुटी हैं कि वे समस्या के निदान के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और है।

देश का बुंदेलखंड इन दिनों सूखे को लेकर चर्चा में है। सरकारें यह बताने में जुटी हैं कि वे समस्या के निदान के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और है।

देश का बुंदेलखंड इन दिनों सूखे को लेकर चर्चा में है। सरकारें यह बताने में जुटी हैं कि वे समस्या के निदान के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और है।

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    भोपाल। देश का बुंदेलखंड इन दिनों सूखे को लेकर चर्चा में है। सरकारें यह बताने में जुटी हैं कि वे समस्या के निदान के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और है। सरकारी योजनाएं कागजों में हैं और जनता जमीन पर। लिहाजा मध्य प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड ने अब खुद सूखे से लड़ने की ठान ली है, और बारिश का पानी रोकने के इंतजाम शुरू कर दिए हैं।

    मध्य प्रदेश के छह जिलों और उत्तर प्रदेश के सात जिलों में फैले बुंदेलखंड को बीते तीन वर्षो से सूखा और प्राकृतिक आपदा से दो-चार होना पड़ रहा है। यहां किसानों की आत्महत्याएं, रोजगार के अभाव में पलायन, पानी के झगड़े आम बात हैं। मध्य प्रदेश के छह जिलों छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर, दमोह और दतिया के लोग राज्य और केंद्र सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, लेकिन सरकारें अब तक सरकार ही बनी हुई हैं। टीकमगढ़, छतरपुर और पन्ना के कई हिस्सों की स्थिति उत्तर प्रदेश के महोबा से भी खराब है।

    दिल्ली में पांच मई को संपन्न हुए जल सत्याग्रह में हिस्सा लेकर लौटे लोगों ने तय किया है कि वे गांव स्तर पर जल सत्याग्रह चलाएंगे और जल संरचनाओं को दुरुस्त कर बारिश की हर बूंद सहेजने का काम करेंगे।

    टीकमगढ़ जिले की बनगांय ग्राम पंचायत के धनीराम अहिरवार कहते हैं कि जल संकट सबसे अधिक टीकमगढ़ जिले में है और उनके गांव में लोग कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को विवश हैं। वास्तव में पानी की रेल की आवश्यकता तो टीकमगढ़ जिले को है, किन्तु राज्य और केन्द्र दोनों ही सरकारें यहां के जल संकट पर पर्दा डालने में लगी हैं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड में पानी की रेल भेजी थी, जिसे राज्य सरकार ने अस्वीकार कर दिया था।

    अहिरवार ने गांव वालों के साथ मिलकर तय किया है कि बारिश का पानी रोकने के लिए जल संरचनाएं दुरुस्त करने के साथ खराब हैंडपंपों को भी सुधारेंगे। टीकमगढ़ के ममना गांव की राजा बेटी आदिवासी कहती हैं कि पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर टैंकरों के उपयोग का दावा किया जा रहा है, मगर लोगों तक पानी नहीं पहुंच रहा है। दंबग और ठेकेदार खूब चांदी काट रहे हैं।

    जल जन जोड़ो अभियान के संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि जिस तरह से मप्र के बुन्देलखंड में पेयजल संकट बढ़ रहा है, आने वाले दिनों में स्थिति अधिक भयावह होगी। सरकारें इस भयावहता को छिपा रही हैं। दिल्ली में जल सत्याग्रह के दौरान किसानों ने जो बताया वह अंदर तक झकझोर देता है। लोग गंदा पानी पीने के लिए विवश हैं।

    छतरपुर के रामटोलिया गांव के मोहन कहते हैं कि पानी की समस्या के लिए सरकार और प्रशासन से कई बार गुहार लगाई जा चुकी है, मगर कोई सुनने तैयार नहीं है। लिहाजा अब उन्होंने अपने गांव में भी जल सत्याग्रह का फैसला किया है। इस बीच पन्ना जिले के ऐतिहासिक धरम सागर तालाब को बचाने के लिए लोगों ने कदम बढ़ाया है। लोगों ने लगभग 30 लाख रुपये तालाब के जीर्णोद्धार के लिए इकट्ठा किए हैं। बड़ी संख्या में लोग श्रमदान करने भी पहुंच रहे हैं। लोगों का जुनून सरकार को आईना दिखा रहा है।

    यहां बताना लाजिमी होगा कि वर्ष 2008 में बुंदेलखंड के लिए केंद्र सरकार ने विशेष पैकेज के तौर पर 7200 करोड़ की धनराशि मंजूर की थी, जिसमें लगभग 3600 करोड़ रुपये मध्य प्रदेश के हिस्से आई थी। लेकिन बड़े पैमाने पर घोटाले हुए और परिणाम सिफर रहा। यह बात राज्य के दो मंत्रियों गोपाल भार्गव और कुसुम महदेले भी स्वीकार कर चुके हैं। बुंदेलखंड पैकेज की वास्तविकता यह है कि मध्य प्रदेश के हिस्से में शायद ही कोई ऐसी जल संरचना है, जो बारिश के पानी का संग्रह कर सके।

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