दिल्ली में फर्जी फॉगिंग का पर्दाफाश, स्टिंग ऑपरेशन में हुआ खुलासा

दिल्ली में रहने वाले हर शख्स के जेहन में आज ये सवाल है, आखिर क्यों मच्छर से मुक्ति पाने की सभी कोशिशें नाकाम साबित हो रही है? क्या ये फॉगिंग एक धोखा है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए आईबीएन7 की टीम ने एक ऑपरेशन शुरू किया।

  • News18India
  • Last Updated: October 4, 2016, 6:55 PM IST
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नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों मच्छर के डंक से बेहाल है। सरकार लाचार है तो सुप्रीम कोर्ट नाराज है। अस्पताल मरीजों से भरे हुए हैं। मच्छरों का हमला बेअसर करने के लिए जगह-जगह फॉगिंग हो रही है। लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हो रहा। दिल्ली में रहने वाले हर शख्स के जेहन में आज ये सवाल है, आखिर क्यों मच्छर से मुक्ति पाने की सभी कोशिशों नाकाम साबित हो रही है? क्या ये फॉगिंग एक धोखा है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए आईबीएन7 की टीम ने एक ऑपरेशन शुरू किया। इसके बाद आईबीएन7 के खुफिया कैमरे में फॉगिंग का वो फर्जीवाड़ा कैद हुआ है जो आपके होश उड़ा देगा।



दिल्ली पर जबसे डेंगू और चिकनगुनिया का हमला हुआ है। दिल्ली सरकार और एमसीडी एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। यही नहीं दोनों में फॉगिंग को लेकर होड़ लगी है, जबकि जनता अस्पताल के सामने कतार में खड़ी है। बीमार दिल्ली को ठीक करने की कोशिशों और दावों की जब आईबीएन7 ने पड़ताल की तो फॉगिंग के फर्जीवाड़े की एक नई कहानी सामने आई। दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया के मामले क्यों बढ़ रहे हैं, इसकी पड़ताल करने के लिए आईबीएन7 की टीम खुफिया कैमरे के साथ निकली। सबसे पहले आईबीएन7 ने एमसीडी की कोशिशों का सच जानने का फैसला किया क्योंकि दिल्ली में फॉगिंग की जिम्मेदारी इसी एजेंसी की है।



एमसीडी के वार्ड नंबर 82 में मच्छरों के खात्मे की जिम्मेदारी इसी दफ्तर की है। पूरे इलाके में फॉगिंग की दवा यहीं से जाती है। आईबीएन7 की टीम ने यहां पर मौजूद स्टोरकीपर से बातचीत शुरू की। थोड़ी देर की बातचीत के बाद स्टोरकीपर ने हमें समझाना शुरू किया कि यहां कौन सी दवा का छिड़काव हो रहा और कैसे, लेकिन जब उसने हमें दवाएं दिखाईं तो फॉगिंग के फर्जीवाड़े का सच सामने आ गया।





रिपोर्टर- इन दोनों की एक्सपायरी डेट निकल चुकी है।
स्टोरकीपर- एक्सपायरी डेट का है।



रिपोर्टर- आज क्या तारीख है। 27 सितंबर है आज। इसकी एक्सपायरी डेट 21 सिंतबर 2016 है। ये तो एक्सपायर हो गई।



स्टोरकीपर- ये रैपर दूसरा लगाया है इन्होंने।



रिपोर्टर- नीचे का रैपर ओरिजनल है सर।



स्टोरकीपर- 21-9-2016, इसी महीने चलेगा बस ये।



रिपोर्टर- सर, एक्सपायर हो गई है।



स्टोरकीपर- 30 सितंबर को एक्सपायर हो जाएगी ये।



रिपोर्टर- 21 सितंबर सर।



स्टोरकीपर- ओह हां।



रिपोर्टर- अभी तो आप इसे यूज कर रहे हैं न सर?



स्टोरकीपर- हां, यूज कर रहे हैं।



रिपोर्टर- वो डिब्बा निकालिए, देखिए वो भी एक्सपायर हो चुका है। ये यूज कर रहे हैं, ये भी एक्सपायर हो चुका है देखिए 5-9-16......5 सिंतबर का है। क्या सीन है सर, ऊपर से ऐसा ही माल मिल रहा क्या?



स्टोरकीपर- जैसा आ रहा है हमारे पास वैसा ही है। हम तो इसे नहीं खरीद रहे।



रिपोर्टर- यहीं से सब जगह जाता है?



स्टोरकीपर- हां, और यहां भी दूसरी जगह से आता है। मेन स्टोर से आता है।



एक्सपाइरी डेट की बात सुनते ही स्टोरकीपर के होश उड़ गए। पहले तो उसने हमें घुमाने की कोशिश की लेकिन बाद में मान लिया कि हां जो दवा मिल रही हैं वो एक्सपायर हो चुकी हैं। ये बेहद चौंकाने वाली बात थी, एक तरफ दिल्ली की जनता चिकनगुनिया और डेंगू के डंक से बेहाल है तो दूसरी तरफ एमसीडी आंख मूंद कर ऐसी दवाओं से फॉगिंग करा रही है जिनका कोई असर ही नहीं होगा। साफ है ये सब जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए किया जा रहा है। लेकिन हमने ये माना कि हो सकता है यहां एक्सपायरी दवाएं गलती से आ गई होंगी। इसलिए हमने  एमसीडी के मेन स्टोर में जाकर पड़ताल करने की सोची।



वार्ड नंबर 82 के इस ऑफिस से निकलने के बाद हमारी टीम पहुंची एमसीडी के मेन स्टोर में। हमने सोचा कि शायद यहां सही दवाएं होंगी। लेकिन ये हमारा भ्रम था। यहां हमने बात की है एमसीडी के सहायक इंस्पेक्टर आर एस आर्य से। जब इन्होंने हमें दवाएं दिखाई तो हम एक बार फिर चौंके, क्योंकि यहां पर भी एक्सपायर दवाओं का ही इस्तेमाल किया जा रहा था। लेकिन इससे भी चौंकाने वाली बात ये थी कि दवाएं एमसीडी के स्टोर में काफी दिनों से रखी थीं।



स्टोर इंचार्ज- ये हमारे पास 04-04 को आया।



रिपोर्टर- चार चार को। क्या नाम है दवा का सर।



स्टोर इंचार्ज- अबेट।



रिपोर्टर- अबेट है ना, पीला वाला डिब्बा।



स्टोर इंचार्ज- हां, 22 लीटर, 5 लीटर का एक डिब्बा, जैसा आपको दिखाया है ना।



रिपोर्ट- और एक डिब्बा है 01-04 का।



स्टोर इंचार्ज- हां जी, 01-04 को..ये तो पिछला बैलेंस है। मैंने रिसीव किया था, टोटल 42 हो गया।



रजिस्टर में हर दवा का हिसाब किताब होता है। रजिस्टर के मुताबिक साल में दो बार दवाएं खरीदी गईं। लेकिन जब फॉगिंग शुरू की गई तो सब दवाएं एक्सपायर हो गईं थी। जानकार बताते हैं कि इस तरह की दवाओं के छिड़काव का कोई मतलब नहीं होता है। इस बारे में डॉक्टर अनिल बंसल (ज्वाइंट सेक्रेटरी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) का कहना है कि अगर दवाइयां एक्पायर हो चुकी हैं तो उनका असर बेहद कम होगा।



फॉगिंग की दवाएं अप्रैल में खरीदी गईं और ये दवाएं सिंतबर में एक्सपायर होनी थी। जबकि हर कोई जानता है कि डेंगू और चिकनगुनिया का हमला सिंतबर में ही सबसे ज्यादा होता है। तो सवाल ये है कि उन दवाओं को क्यों खरीदा गया जो उस वक्त एक्सपायर होने वाली थी जब इनका इस्तेमाल किया जाना था।



(इस स्टिंग ऑपरेशन पर बात करने के लिए आईबीएन7 के साथ जुड़ी दिल्ली बीजेपी की प्रवक्ता डॉ. दीपिका शर्मा,  कांग्रेस की तरफ से अमन पवार, आम आदमा पार्टी की प्रवक्ता रिचा पांडे मिश्रा। वीडियो देखें।)
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