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भीख मांगना छोड़कर इनकी प्रेरणा से स्‍वावलंबी बने कुष्‍ठ रोगी

ओम प्रकाश | News18India.com
Updated: January 1, 2017, 11:23 AM IST

आम तौर पर कुष्‍ठ रोगी भीख मांगते हैं। बेबसी और लाचारी का जीवन जीते हैं, लेकिन एक शख्‍स ने सैकड़ों रोगियों का न सिर्फ जीवन बदला बल्‍कि उन्‍हें हुनरमंद बनाकर स्‍वावलंबी भी बनाया।

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नई दिल्‍ली।  आम तौर पर कुष्‍ठ रोगी भीख मांगते हैं। बेबसी और लाचारी का जीवन जीते हैं, लेकिन एक शख्‍स ने सैकड़ों रोगियों का न सिर्फ जीवन बदला बल्‍कि उन्‍हें हुनरमंद बनाकर स्‍वावलंबी भी बनाया। उनका नाम है ब्रह्मदत्‍त। सुप्रीम कोर्ट में वकालत के साथ कुष्‍ठ रोगियों की सेवा की। उन्‍हें भीख मांगना छुड़ाकर कपड़ा बुनाई का हुनर सिखाया। आज उनकी काउंसिलिंग की बदौलत कुष्‍ठ रोगियों ने मिसाल कायम की हुई है। सरकार ने उनकी सेवा को देखते हुए पद्मश्री से नवाजा है।

एडवोकेट ब्रह्मदत्‍त ने उनका जीवन बदलने की ठानी और उन्‍हें बहुत हद तक इसमें सफलता मिली। उनकी कोशिशों से कुष्‍ठ रोगियों ने ऐसी मिसाल रची है कि देखने और सुनने वाले भी हैरान होते हैं। उन्‍होंने स्‍वावलंबन के लिए करघा चलाना शुरू किया। आज स्‍विटजरलैंड, अमेरिका, न्‍यूजीलैंड, अस्‍ट्रेलिया, कनाडा और इंग्‍लैंड जैसे देशों के लोग भी उनके कपड़े के कायल हैं। अभिनेता नसीरूददीन भी इनकी हिम्‍मत और कारीगरी के मुरीद हैं। वह अपनी पत्‍नी रत्‍ना पाठक शाह के साथ यहां आ चुके हैं।

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ब्रह्मदत्‍त कहते हैं कि कुष्‍ठ रोगियों की सेवा का काम किसी प्‍लानिंग के तहत नहीं हुआ। वर्ष 1977 में एनएच पांच से दिल्‍ली आते-जाते एक आदमी रोजाना फुटपाथ पर भीख मांगने के लिए बैठा होता था। मैंने एक दिन उसे पूछा तो उसने बताया कि वह केंद्र सरकार में ग्रेड थ्री का कर्मचारी है लेकिन कुष्‍ठ रोग होने की वजह से उसे निकाल दिया गया है। यहीं मन द्रवित हो उठा और उसके बाद ठान लिया कि कुष्‍ठ रोगियों को भीख नहीं मांगने देना है। उन्‍हें स्‍वावलंबी बनाना है। फिर मैंने इनके लिए झोपड़ियां डलवानी शुरू कर दी।



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जर्मनी, पोलैंड, जापान और बैपिस्‍ट मिशन के जरिए करघा और लूम लगवाया। धीरे-धीरे दानी आते गए और कुष्‍ठ रोगियों का जीवन संवरता गया। इस समय यहां पर सौ से अधिक परिवार रहते हैं। कपड़े की बुनाई, बेडशीट, कुशन कवर, टी-टॉवल, नैपकिन एवं चादरें बनाकर वे जीवन गुजार रहे हैं। तब से अब तक यहां कोई कुष्ठ रोगी भीख नहीं मांगता है। सरकार बहुत कम 1000 रुपये महीने ही इन्‍हें सहयोग देती है। ब्रह्मदत्‍त का जीवन कुष्‍ठ रोगियों की सेवा और उनकी हर जगह वकालत करने के लिए समर्पित है।

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तब घर से निकाल दिए जाते थे कुष्‍ठ रोगी, पर ब्रह्मदत्‍त ने गले लगाया

भारत माता कुष्‍ठ आश्रम के प्रधान एम गुरुप्‍पा बताते हैं कि कुष्ठ रोग होने पर 20 साल की उम्र  में उन्‍हें घर से निकाल दिया गया था। क्योंकि 70 के दशक में इस संक्रामक रोग का कोई इलाज नहीं था। पत्नी व दुधमुंहे बच्चे को छोड़ कर्नाटक से भटकते-भटकते दिल्ली पहुंचा। यहां काफी दिन तक भिक्षा मांगकर जिंदगी चलाई। कुष्ठ रोगी उन दिनों भीख व शराब को ही किस्मत मान लेते थे। तब कुष्ठ रोगियों को रेलवे स्टेशन या बस अड्‌डे पर बैठने की भी इजाजत नहीं थी। पुलिस वाले मारकर भगाते थे। लेकिन ब्रहमदत्‍त ने उन लोगों को स्‍वावलंबन की प्रेरणा देकर जीवन बदलने की शुरुआत की। धीरे-धीरे सैकड़ों कुष्‍ठ रोगी भिक्षावृत्‍ति छोड़कर जिंदगी में हौसले के पंख लगाने शुरू कर दिए। अब यहां रहने वाले कई परिवारों व उनके बच्चे दूसरे काम कर रहे हैं। इन कुष्ठ रोगियों के बच्चे अब अच्छी पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसा वकील साहब के सहयोग से हुआ।

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आपस में ही करते हैं शादी-ब्याह

यहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हैं। कोई यूपी का यादव, भूमिहार है तो कोई दक्षिण का ईसाई, ब्राह्मण। कुष्ठ रोगियों ने एक अलग जाति बनाई। इसका नाम है कुष्ठ रोगी। इन्होंने आपस में शादी-ब्याह शुरू किया। हरियाणा में 20, पंजाब में 40 और यूपी में कुष्‍ठ रोगियों के 54 आश्रम हैं। देशभर में करीब 800 कुष्ठ आश्रम बताए गए हैं। सबकी भलाई के लिए ब्रह्मदत्‍त जुटे हुए हैं। उनका कहना है कि अगर कुष्‍ठ रोगी बदलने की कोशिश न करते तो मैं भी इनके लिए कुछ न कर पाता।

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First published: January 1, 2017, 11:23 AM IST
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स्रोत: स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार
अपडेटेड: April 09 (05:00 PM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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