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<font color=red>Exclusive:</font> रेडलाइट एरिया GB रोड से तो निकल आई जूली और लीना लेकिन...

लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी।

लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी।

लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी।

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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड पर आधारित हमारी इस खास सीरीज की पिछली खबर में आपने पढ़ा कि क्या सोचती हैं यहां देह व्यापार के दलदलमें फंसी महिलाएं और किन हालात में होता है उनका गुजर-बसर (देखें-  Exclusive: ‘साहब! हर कोई यही क्यों पूछता है कि तुम इस धंधे में क्यों आईं?’ )

आपने पढ़ा कि कैसे यहां काम कर रही कई महिलाएं अपने हालात से समझौता कर इसे ही अपना नसीब स्वीकार कर चुकी हैं। लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी। आईबीएनखबर ने ऐसी कुछ महिलाओं से बात की।

जीबी रोड से एक गैर-सरकारी संगठन की मदद से छुड़ाई गईं लीना (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि वह इस भरोसे वहां से निकलकर बाहर आईं कि बाकी की जिंदगी सम्मान और गरिमा के साथ जी सकें। अब उनकी जिंदगी पहले से काफी अच्छी है। उन्होंने अपनी आजीविका के लिए सिलाई मशीन का काम सीख लिया है और दिल्ली की ही एक कॉलोनी में अपनी दुकान चलाती हैं। वहां से निकलने के बाद उन्हें अपनी पहचान सबसे छुपानी पड़ी। छोटे बच्चों के साथ समाज की मुख्यधारा में जीना आसान नहीं था। लेकिन समय के साथ अब धीरे– धीरे सब ठीक हो रहा है।

सात साल तक इस धंधे में रहने के बाद समाज की मुख्यधारा में लौटीं जूली उन दिनों को याद कर अब भी सिहर जाती हैं। हालांकि बड़ी-बड़ी उम्मीदों और सपने लेकर इस धंधे से बाहर निकल कोलकाता पहुंचीं जूली को यह समाज उन्हीं भूखे भेड़ियों की तरह नजर आता है जो पहले जीबी रोड पर नजर आता था। जूली कहती हैं कि वह कोलकाता के एक कमरे में अकेले रहती हैं और इस बात के लिए रोज उनको लोगों के सवालों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने कल का भी कुछ पता नहीं है कि क्या होगा। परिवार के सवाल पर जूली भावुक हो जाती हैं और इस सवाल पर कुछ भी कहने से इनकार करती हैं।

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जूली के इस इनकार के पीछे के दर्द और टीस को साफ महसूस किया जा सकता है। जूली अपनी आजीविका के लिए कुछ घरों में काम करती हैं और भविष्य की चिंता किए बगैर आज में जी रही हैं। लीना और जूली की कहानी बताती है कि जीबी रोड की काली कोठरियों से यहां फंसी बदकिस्मत लड़कियों को निकालना भर काफी नहीं है। अगर उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था नहीं होगी तो उनके लिए बाहर की जिंदगी भी एक भंवर के निकलकर दूसरे भंवर में फंसने जैसी होगी।

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भारत में 25 लाख लोग लिप्त हैं देह व्यापार में

वर्तमान में भारत में इस व्यवसाय में संलग्न कुल लोगों की कुल संख्या 25 लाख के करीब है। इस बात का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है कि इनमें से कितनों ने स्वेच्छा से इस व्यवसाय को चुना और कितनों को मजबूरन इसमें धकेला गया। हालांकि जानकारों की मानें तो इस व्यवसाय में बीते कुछ सालों में अपेक्षाकृत गरीब पृष्ठभूमि और सस्ते श्रमिक व्यवसायों से आने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल महीने में भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर तैयार रिपोर्ट में भी यौन व्यापार में संलग्न महिलाओं की स्थिति को बेहद खराब बताया था। मानव तस्करी को रोकने के मामले में भारत संयुक्त राष्ट्र के दूसरी श्रेणी में है। दुनिया भर में 100 अरब डॉलर से अधिक के इस धंधे की कानूनी मान्यता अलग-अलग देशों में अलग-अलग है।

जानकारों की मानें तो इस व्यवसाय में बीते कुछ सालों में अल्पसंख्यक और अपेक्षाकृत गरीब पृष्ठभूमि और सस्ते श्रमिक व्यवसायों से आने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। जहां तक भारत की बात है तो ह्यूमन वॉच रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 20 लाख से अधिक महिलाएं देह व्यापार से किसी न किसी रूप से जुड़ीं हैं जिनमें 20 फीसदी से अधिक की उम्र 18 साल से कम है।

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महिला और बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत में करीब 1100 रेड लाइट क्षेत्रों में 3 लाख कोठों पर करीब 20 लाख से अधिक महिलाएं इस क्षेत्र से जुड़ी है जिनमें से90 फीसदी भारतीय और करीब 10 फीसदी विदेशी महिलाएं शामिल हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से बड़ी संख्या एचआईवी से संक्रमित हैं। मुंबई में 2 लाख से अधिक महिलाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और हर साल इस क्षेत्र में 40 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। दिल्ली पुलिस के अनुमान के मुताबिक राजधानी में देह व्यापार का सालाना टर्न ओवर 600 करोड़ रुपये के आसपास है।

एड्स के खतरे को बढ़ा रहा है पेड सेक्स

नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (नाको) की महानिदेशक रहीं के. सुजाता राव कहती हैं कि सरकारी सख्ती इस पेशे को रोक नहीं पाएगी और ये जहां गुपचुप तरीके से और ते़जी से होने लगेगा, वहीं एड्स संक्रमण रोक पाना भी सरकार के बूते से बाहर हो जाएगा। राय के अनुसार स्वीडन का उदाहरण प्रमाण है कि वहां रोक के बावजूद यह व्यवसाय रुका नहीं और जिन वेश्याओं को रोकने का प्रयास किया गया, वे नार्वे में जाकर पेशा करने लगीं। चूंकि पेड सेक्स की हमेशा मांग रहेगी, इसलिए सप्लाई का जरिया भी निकाल ही लिया जाएगा।

सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली कमेटी की एचआईवी पर स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि एशिया में एड्स का वायरस पुरुषों द्वारा सेक्स हेतु पैसा देने की प्रवृत्ति के चलते बड़ी ते़जी से फैल रहा है। आज हालत ये है कि साढ़े सात करोड़ के करीब पुरुष वेश्याओं से शारीरिक संबंध बनाते हैं और एक करोड़ से ज्यादा महिलाएं इस धंधे में शामिल हैं। एनजीओ शक्तिवाहिनी के संचालक ऋषिराज कहते हैं कि सेक्स के जरिए फैलने वाली बीमारियों को देखते हुए साफ-सफाई और बेहतर मेडिकल इलाज और सुविधाओं की जरूरत है।

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और भी क्राइम हैं इस रोड पर ‘धंधे’ के सिवा

जीबी रोड पर देह व्यापार, मानव तस्करी के अलावा भी क्राइम कम नहीं हैं। यहां स्थित एक निजी बैंक के कर्मचारी कहते हैं कि महिलाओं की इस कहानी के अलावा यहां पुरुष भी कम प्रताड़ित नहीं होते है। वहां पहली बार पहुंचने वाले ग्राहक कई बार लूट-पाट के शिकार होते हैं और वे इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते हैं। कहा जाता है कि यहां भी ठगी से बचने के लिए किसी पहुंच का इस्तेमाल करना पड़ता है। सेंट्रल दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त चिन्मय बिस्वाल कहते हैं कि पुलिस हमेशा मदद के लिए तैयार है और कोई सूचना मिलते ही कार्रवाई की जाती है। हालांकि एनजीओ शक्तिवाहिनी के संचालक ऋषिराज कहते हैं कि अगर वेश्याओं को गिरफ्तारी या हिंसा का डर रहेगा तो वे कैसे अपने साथ हुए किसी अपराध की रिपोर्ट पुलिस से कर सकेंगी?  दिल्ली पुलिस के ही एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यहां अधिकतर ग्राहक नशे की हालत में होते हैं और यही कारण है कि अपराधियों का काम आसान हो जाता है। इस तरह के अपराध को अंजाम नीचे सड़कों पर न देकर उपर कमरे में ही दिया जाता है। गैरकानूनी होने के कारण कोई भी पक्ष शिकायत करने के लिए तैयार नहीं होता जिस कारण छोटे मोटे अपराधों पर कारवाई काफी मुश्किल हो जाती है।

(आईबीएनखबर का यह सीरीज लगातार जारी है जिसमें हम देह व्यापार से जुड़ीं कई पहलुओं को आपके सामने लाएंगे। इस सिलसिले में हमारी  इस सीरीज में अगली कहानी देह व्यापार को कानूनी अधिकार देने के सवाल पर होगी।)

(शेष अगली किस्त में...)

 

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