करोड़ों की ऑनलाइन ठगी का ये है ‘नाइजीरियन’ तरीका

फाइल फोटो.

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नाइजीरियन गिरोह के द्वारा ठगी का एक तरीका ये भी है कि गिरोह हजारों की संख्या में ईमेल आईडी खरीदता है. आईडी खरीदने के लिए बैंक के ही कर्मचारियों को फंसाया जाता है. ज्यादातर लोग लालच में आ जाते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2019, 8:39 PM IST
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करोड़ों की ऑनलाइन ठगी का नाइजीरियन तरीका. सुनने-सुनाने में ये जितना आसान है अपराधियों के लिए इस पर काम करना उतना ही मुश्किल. इस तरीके की खासियत ये है कि ठगे जाने से पहले शिकार को इसकी भनक तक नहीं लग पाती है. लेकिन जब तक भनक लगती है ठग अपना काम कर चुका होता है. पुलिस की भाषा में इसे नाइजीरियन तरीका इसलिए भी कहा जाता है कि इस तरह की ठगी को अंजाम देने वाला मास्टर माइंड कोई न कोई नाइजीरिया का युवक ही निकलता है. दूसरा ये कि देश के साइबर ठग इस तरीके पर काम नहीं करते हैं.

एक ईमेल आईडी से करते हैं ठगी

यूपी पुलिस में सर्विलांस सेल के एसआई शैलेश बताते हैं कि नाइजीरियन ठगी एक ईमेल आईडी से होती है. इस गिरोह का सरगना सबसे पहले किसी भी शहर में जाने-माने एक्सपोर्टर की लिस्ट तैयार करता है. उसके बाद गिरोह में शामिल स्थानीय युवक ये पता करते हैं कि किस एक्सपोर्टर की विदेश में अच्छी धाक है. किसका नाम सबसे ज्यादा चलता है.



इसके बाद उस एक्सपोर्टर की ईमेल आईडी हासिल की जाती है. एक्सपोर्टर की ईमेल आईडी में मामूली सा जल्द ही पकड़ में न आने वाला बदलाव किया जाता है. फिर उसी ईमेल आईडी से एक्सपोर्टर के विदेश में बैठे खरीदार को मेल भेजे जाते हैं. अगर ईमेल आईडी शू एक्सपोर्टर की है तो विदेशी खरीदार को शूज के नए-नए डिजाइन भेजे जाते हैं. मेल से ही ऑर्डर लिया जाता है. शैलेश बताते हैं कि क्योंकि एक्सपोर्टर नामी होता है और विदेश में व्यापारिक मामलों में ईमेल को खासा महत्व दिया जाता है, इसलिए खरीदार मेल पर ऑर्डर दे देता है.
कंपनी के किसी एक आदमी की लेते हैं मदद

हाल ही में पकड़े गए नाइजीरिया के एडवर्ड एंड्रयू ने पुलिस को बताया कि कंपनी किस देश में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट कर रही है. किस खरीदार से सबसे ज्यादा लेन-देन चल रहा है. इस वक्त किस देश के लिए किस कंपनी का माल बन रहा है या कहां से कंपनी माल मंगा रही है. इस तरह की जानकारी लेने के लिए हम निशाने पर ली गई कंपनी के किसी स्टाफ को रुपयों का लालच देकर अपनी ओर मिला लेते हैं. कंपनी का वो ही कर्मचारी गिरोह को कंपनी के खरीदार और उससे जुड़ी जानकारी देता है. आमतौर पर ये कर्मचारी कंपनी का कंप्यूटर ऑपरेटर होता है जो आसानी से मामूली रकम में जानकारी देते को तैयार हो जाता है.

यूपी के शू एक्सपोर्टर संग ऐसे हुई थी ठगी

यूपी में एक शू एक्सपोर्टर हैं. चीन से सिंथेटिक लैदर मंगाते हैं. कुछ समय पहले उन्होंने चीन की एक कंपनी को ऑर्डर दिया था. सब कुछ तय हो गया था. माल डिस्पेच होने से पहले कुछ रुपये एक्सपोर्टर को चीन की उस कंपनी को भेजने थे. लेकिन वो तब जब चीन की कंपनी कहती. एक्सपोर्टर चीन की कंपनी के ईमेल का इंतजार करने लगा.

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एक दिन एक्सपोर्टर के पास चीन की कंपनी का ईमेल आ गया. कंपनी ने 28 लाख रुपये की डिमांड की थी. एक्सपोर्टर ने बिना देर किए कंपनी के बताए अकाउंट नम्बर में 28 लाख रुपये जमा कर दिए. लेकिन दो-तीन दिन बाद भी माल डिस्पेच होने का ईमेल चीन की कंपनी ने नहीं किया. जिस पर एक्सपोर्टर ने चीन की कंपनी से संपर्क किया तो मालूम पड़ा कि उन्हें तो रुपये मिले ही नहीं हैं.

परेशान एक्सपोर्टर ने ईमेल आईडी चेक की तो मालूम हुआ कि चीनी कंपनी की ईमेल आईडी और ठग की ईमेल आईडी में मामूली सा ही अंतर था. जिसके चलते एक्सपोर्टर संग 28 लाख रुपये की ठगी हो गई.

7 दिन बाद लौट आए एक्सपोर्टर के 28 लाख रुपये

यूपी का ये एक्सपोर्टर कई मायनों में भाग्यशाली रहा कि उसके 28 लाख रुपये लौट आए. एसआई शैलेश ने बताया कि फ्रॉड होने के 4 दिन बाद एक्सपोर्टर को ठगी की जानकारी हो गई थी. उसने तुरंत ही पुलिस से संपर्क किया. केस हमारे पास आया था. हमने उस बैंक से संपर्क किया जिसके अकाउंट में 28 लाख रुपये मंगाए गए थे. वो बैंक यूके की थी. हमने ईमेल के जरिए बैंक से संपर्क किया.

उन्हें सारी घटना बताई. बैंक ने अकाउंट को सीज कर दिया. शैलेश बताते हैं कि इंटरनेशनल बैंक अंतरराष्ट्रीय लेने-देन को चार दिन बाद क्लीयर करती है. चार दिन उस रुपये को इसलिए रोककर चलती है कि अगर कोई आपत्ति आती है तो उस भुगतान को रोका जा सके. लेकिन 4 दिन बाद भी एक्सपोर्टर का रुपया इसलिए बैंक में ही रुका रहा कि बैंक में दो-तीन दिन की छुट्टियां हो गईं थी.

बैंक का नकली पेज बनाकर भेजते हैं ईमेल

नाइजीरियन गिरोह के द्वारा ठगी का एक तरीका ये भी है कि गिरोह हजारों की संख्या में ईमेल आईडी खरीदता है. आईडी खरीदने के लिए बैंक के ही कर्मचारियों को फंसाया जाता है. ज्यादातर लोग लालच में आ जाते हैं. इसके बाद बैंक के एकदम मिलते-जुलते बेव पेज तैयार किए जाते हैं. उस बेव पेज का इस्तेमाल करते हुए गिरोह हजारों ईमेल आईडी पर मैसेज भेजते हैं. जिसमें बताया जाता है कि आप अपना बैंक खाता अपडेट कर लें.

पकड़े गए आरोपियों ने बताया कि कुछ लोग इस झांसे में आ जाते हैं. अपने अकाउंट को अपडेट करने के लिए पेज पर क्लिक कर देते हैं. शुरुआती दौर में पूछे जाने पर महत्वपूर्ण जानकारी दे देते हैं. इसके बाद उनके अकाउंट तक पहुंचना कोई मुश्किल काम नहीं होता है.

ये भी है नाइजीरियन ठगी का एक तरीका

नाइजीरियन ठग गिरोह किसी बड़ी एफएमसीजी कंपनी के नाम का सहारा लेकर आपको मेल भेजता है. उस मेल को आगे 100 और लोगों को भेजने के लिए कहता है. इस तरह से ये संख्या आगे चलकर करोड़ों ईमेल आईडी तक पहुंच जाती है. साइबर एक्सपर्ट यश कुशवाह की मानें तो इस तरह के लोग ईमेल के साथ एक वॉयरस भी भेजते हैं.

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इसी वॉयरस के जरिए साइबर ठग इसके बाद हर एक उस ईमेल आईडी तक पहुंच जाता है जिस-जिसने उसके भेजे गए ईमेल को क्लिक किया. इससे होता ये है कि कोई भी ईमेल एक गेटवे से होकर गुजरता है. ठग का भेजा गया वॉयरस उस गेटवे से होकर जाने वाले हर एक ईमेल की कॉपी ठग के इनबॉक्स में भेजता रहता है. ठग फिल्टर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर कुछ खास ईमेल अपने इनबॉक्स में रिसीव करते रहते हैं. इसके बाद गिरोह उस कॉपी वाले मेल में से अपने काम के मेल को छांट लेते हैं.

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इसलिए मुश्किल है नाइजीरियन ठग से पूछताछ करना

एसआई शैलेश बताते हैं कि पकड़े जाने पर पूछताछ के दौरान नाइजीरियन ठग कुछ नहीं बोलते हैं. अगर आप कभी भूले से भी कड़ाई के साथ पूछताछ करने की जुर्रत करते हैं तो ये लोग इतने कठोर होते हैं कि बोलने के बजाए खुद को ही घायल कर लेते हैं. आपसे कुछ कहने के बजाए ये दीवार में सिर मारने लगते हैं. अपनी उंगली चबा लेते हैं. अपने दांतों से अपनी ही जीभ को काट लेते हैं.

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