...तो इसलिए यहां लोग बेसब्री से करते हैं किसी कत्ल का इंतज़ार

एक ऐसा शहर, जिसके बारे में WHO को कहना पड़ा कि यहां 'अपराध महामारी' बन चुका है. गरीबी और अपराध के कुचक्र में फंसे नारकीय जीवन जीने वाले लोगों ने लाशों के बीच जीने के लिए लाशों के सहारे एक उद्योग खड़ा कर लिया है.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: May 8, 2019, 10:13 PM IST
...तो इसलिए यहां लोग बेसब्री से करते हैं किसी कत्ल का इंतज़ार
प्रतीकात्मक तस्वीर.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: May 8, 2019, 10:13 PM IST
'मुर्दों की बस्ती बन चुका है शहर. कभी भी गोलियां चलने लगती हैं. चीख-पुकार उठती है और लाशों के साथ ज़मीन पर गिरकर दम तोड़ देती है. अगले दिन का कोई भरोसा नहीं कि किसकी मौत आने वाली है. ऐसे में रोटी का धंधा कोई अक़्लमंदी की बात नहीं है.' उस नौजवान की बात का जवाब किसी के पास नहीं था इसलिए एक खामोशी छाई हुई थी.

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कुछ देर को सन्नाटे को चीरते हुए उस नौजवान ने फिर कहा 'हम कब तक इन गुंडों को अपनी खून पसीने की कमाई देते रहेंगे. हमारे खाने के लिए तो चार पैसे बचते नहीं लेकिन इन्हें हफ्ता पूरा चाहिए. जिस दिन हमने ना-नुकुर की, उस दिन हमारे घर को कब्रिस्तान बनाने में इन्हें एक मिनट नहीं लगेगा. हमारे चार कर्मचारी भी तो इन्हीं गुंडों की गोलीबारी में मारे जा चुके हैं. इसलिए मैं कहता हूं कि ये धंधा बंद करो. वैसे भी कौन सा फायदे का धंधा रह गया है'.

शहर के एक नहीं बल्कि तमाम घरों में यही हालात हैं. रोज़ यही तनाव और बहस छिड़ी रहती और यही जुगत कि आज और कल भूख का क्या इंतज़ाम किया जाए. इसी फिक्र में अगर गोलियों की आवाज़ सुनाई देती है, तो सब अपने अपने दड़बों में दुबक जाते और कुछ देर ताबड़तोड़ तड़तड़ाहट के बाद ऐसा सन्नाटा पसर जाता, जैसे पूरी बस्ती को सांप सूंघ गया हो.

ये काल्पनिक कहानी नहीं, हकीकत है. मध्य अमेरिका के एल सल्वाडोर प्रांत के हालात बदतर हैं. पूरी धरती पर हत्या की सबसे ज़्यादा दर इस प्रांत में है. डब्ल्यूएचओ को इन हालात के मद्देनज़र कहना पड़ा है कि अपराध यहां महामारी की तरह फैल चुका है. अंधाधुंध और बेमतलब के कत्लों के हालात में यहां के लोगों ने एक फायदे का सौदा खोज निकाला है और अब वो अपने पुश्तैनी धंधे छोड़कर करने लगे हैं 'लाशों का धंधा'.

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नक्शे पर अमेरिकी प्रांत एल सल्वाडोर.


ऐसे शुरू होता है लाशों में मुनाफे का धंधा
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सल्वाडोर के करीब 18 हज़ार आबादी वाले एक छोटे से कस्बे जुक्वापा के रहने वाला पचेको परिवार बरसों से बसा हुआ था. यहां पचेको परिवार के मुखिया कार्लोस ने बरसों पहले ब्रेड बेचने का धंधा शुरू किया था और एक बेकरी बना ली थी. धीरे धीरे यहां के हालात बिगड़ना शुरू हुए. 21वीं सदी में तो यहां जीना दूभर होने लगा.

'माराज़' यानी 'मारा सल्वात्रुचा' नाम के गैंग के कई धड़े बन चुके थे. इनमें से सबसे ताकतवर बनकर उभरने लगा था 'एमएस 13'. इसकी दुश्मनी दूसरे गैंग्स के साथ थी और प्रमुख दुश्मन बना 'बारियो 18' नाम का गैंग. इन दो के अलावा भी और तमाम गैंग्स के बीच गैंग वॉर आए दिन की बात होने लगी थी. गरीबी, अशिक्षा, परिवारों का बिखरना या परिवार में किसी का गैंग के साथ जुड़ाव रहना, बेरोज़गारी और सामाजिक असुरक्षा जैसे कारणों से ऐसे आपराधिक गैंग्स के सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि यहां के नौजवानों के पास अपराधी बनना सबसे आसान और फायदे का काम है.

पचेको परिवार ने इन हालात में गैंग वॉर में बचे रहने के लिए अपराधियों को हफ्ता देना शुरू किया और फिर आपराधिक गतिविधियों के कारण बेकरी का धंधा मंदा होने लगा. साल 2010 में, ऐसे में पचेको परिवार के एक नौजवान लड़के ने आइडिया दिया कि 'इतने कत्ल होते हैं यहां, सबका अंतिम संस्कार तो देर सबेर होता ही है. क्यों न हम ताबूत का धंधा शुरू करें. पास में ही जंगल है तो लकड़ियां आसानी से मिलेंगी और कॉफिन का धंधा यहां चल जाएगा. कम से कम हमारा पेट भरने का इंतज़ाम तो होगा'.

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एल सल्वाडोर में कॉफिन के कारोबार में संलिप्त एक युवक.


सिर्फ पचेको ही नहीं कई परिवार हैं इस प्रांत में, जो अपने बेकरी, कसाईखाने या खेती किसानी के जमे जमाए धंधे छोड़ रहे हैं. ये सब अंतिम संस्कार की इंडस्ट्री से जुड़े धंधों में शामिल हो रहे हैं. कोई ताबूत तो कोई कब्र, कोई लकड़ी के पाजामे तो कोई लाश को देर तक सड़ने से बचाने के लिए सुगंधित औषधियों के धंधों में शामिल हो रहा है. इस छोटे से कस्बे में कॉफिन की करीब 30 फैक्ट्रियां चल रही हैं.

पेट भर रही हैं लाशें लेकिन गरीबी बरकरार है
लाशों को सड़ने से बचाने के लिए लेप लगाना. कटे फटे अंगों के टुकड़ों वाली इन लाशों की सिलाई करना. इन लाशों के फटे हुए सिरों को प्लास्टिक की गेंदें डालकर जोड़ना ताकि लाश एक इंसान की लग सके. लाश के गलते और लटकते हुए मांस को लेप और धागों से बांधना. एक छोटी कॉफिन फक्ट्री चलाने वाला पचेको परिवार दो साल में 500 लाशों के लिए अपने सहयोगियों के साथ ये काम कर चुका है. और कई परिवार भी ऐसे काम कर चुके हैं.

अपने धंधे छोड़कर कॉफिन या अंतिम संस्कार से जुड़े और धंधों में उतरे इन परिवारों के सामने पेट भरने का संकट तो तकरीबन नहीं है लेकिन इतना मुनाफा भी नहीं है कि ये एक सम्मानजनक जीवन जी सकें. जुक्वापा की एक कॉफिन फैक्ट्री के संचालक कार्डिनैस की मानें तो इस इंडस्ट्री में भी कई लोग आ गए हैं तो मुनाफा कम हो गया है. एक इकाई के हिस्से में रोज़ाना 10 से 20 डॉलर का मुनाफा आ रहा है.

'किसी दिन अचानक अगर गैंग वॉर बंद हो गई तो? गैंग्स ने लोगों का कत्ल करना बंद कर दिया तो? हम लोग क्या करेंगे? भूखे मरने की नौबत आ जाएगी.' कार्डिनैस का ये डर पूरी मानवता को आतंकित करने के लिए काफी है.


ऐसे हालात में जीने की कल्पना कीजिए
भले ही कितना लेप लगा दिया जाए लेकिन लाशें सड़ती हैं तो बदबू से बचना मुमकिन नहीं. फिर जो परिवार अपने छोटे से घरों या जगहों में ये काम कर रहे हैं, उनकी मानसिक हालत बिगड़ रही है. पचेको परिवार के कार्लोस का कहना है कि उन्हें लेप करने के बावजूद अक्सर लगता है कि मांस के वो लोथड़े, वो ​हड्डियां ज़िंदा हैं और कंकाल चलते दिखते हैं.

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हर तरह के डर के साये में ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं. नाश्ता करते हैं. बदबू से घुटकर उल्टियां करते हैं. यहीं प्यार और सेक्स करते हैं. अपने बच्चों को हंसाते हैं. सड़ती हुई लाशों, लाशों की हड्डियों और राख तक के बीच रहने वाले ये इन्हीं लाशों से अपनी ज़िंदगी चलाने का ज़रिया खोजते हैं. 'ये जीना एक सड़े हुए बदबूदार तंदूर में जीने जैसा है, लेकिन हम इसके आदी भी हैं और मजबूर भी'.

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