उस देश की लड़की की कहानी जहां RAPE और इंसाफ के बीच रोड़ा है कानून

सांकेतिक चित्र

एक लड़की बलात्कार जैसे जुर्म की शिकार होती है लेकिन बजाय इंसाफ के तमाम आरोप लगाकर उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. यह कहानी एक लड़की की है लेकिन स्थिति कई लड़कियों की है जो पुरुषों को बचाने की नीयत से बने कानून की शिकार हैं.

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किम के साथ बलात्कार किया जाता है और जब इंसाफ के लिए किम पुलिस के पास जाकर केस दर्ज कराती है तो वह खुद ही फंस जाती है. किम के ही खिलाफ इतने मुकदमे दायर कर दिए जाते हैं कि उसे सफाई पेश करने के दौरान सालों तो लग ही जाते हैं, वह कई बार टूटती है, बिलखती है और पूरे समाज में बार बार उसके साथ बलात्कार होता रहता है. किम और इंसाफ के बीच रोड़ा बन जाता है उसी के देश का कानून लेकिन किम लड़ती है.

यह कहानी उस देश की है जहां एक कानून के हिसाब से सच बोलना गुनाह माना जा सकता है. इसी कानून से जूझना पड़ा किम को जब उसने अपने साथ हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई और इंसाफ पाने की ज़िद पकड़ ली. एक आॅफिस में काम करने वाली किम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी रही थी. एक दिन अचानक उसे पार्किंग में एक लड़का दिखाई दिया जिसे वह आॅफिस के कलीग के तौर पर पहचानती थी लेकिन उससे कोई ज़्यादा वास्ता नहीं था.

लिफ्ट मांगने के बहाने यह लड़का किम को एक सुनसान जगह पर ले गया और किम को अपनी मर्दाना ताकत से काबू करने के बाद इस लड़के ने किम के साथ बलात्कार किया. बलात्कार के दौरान किम चीखी भी लेकिन वहां उसकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं था. रेप के बाद किम ने रोते हुए चिल्लाकर कहा कि वह उसे छोड़ेगी नहीं, सलाखों के पीछे पहुंचाएगी तो बजाय डरने के उस लड़के के चेहरे पर एक हंसी थी और उसने किम को बेवकूफ करार देते हुए कहा कि वह जब कानून समझेगी तो खुद पछताएगी.

वह लड़का तो किम का मज़ाक उड़ाता हुआ चला गया लेकिन किम कुछ समझने की कोशिश करती हुई यह इरादा कर बैठी थी कि वह कमज़ोर लड़कियों की तरह खुद पर हुए ज़ुल्म के खिलाफ चुप नहीं रहेगी बल्कि लड़ेगी. किम पुलिस के पास पहुंची और उसने बाकायदा नामजद रिपोर्ट लिखवाने की बात की तो पुलिस ने उससे उल्टे सवाल करना शुरू कर दिए —

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पुलिस : तुम यह रिपोर्ट क्यों लिखवा रही हो?
किम : क्यों मतलब? मैं कह रही हूं कि मेरे साथ रेप किया गया है. आपको नहीं लगता कि यह अपराध है?
पुलिस : रेप सच में हुआ है या तुम्हारा मकसद कुछ और है?
किम : आप क्या कहना चाह रहे हैं, मैं नहीं समझ पा रही?
पुलिस : एक शरीफ नौजवान पर गलत केस फाइल कर रही हो तुम. तुम्हें पता है इस केस के बाद उसका भविष्य तबाह हो सकता है.
किम : आप कमाल की बात कर रहे हैं! गलत केस क्यों फाइल करूंगी? मैं मेडिकल टेस्ट के लिए तैयार हूं.
पुलिस : मेडिकल टेस्ट से पता चलेगा कि सेक्स हुआ या नहीं. रेप कैसे पता चलेगा?
किम : आप बताइए कि रेप हुआ या नहीं, यह कैसे पता चलता है?
पुलिस : देखो, मेरी बात मानो, जो हुआ भूल जाओ. इस तरह के केस से कुछ फायदा नहीं होगा.
किम : भूल जाओ मतलब? आप रिपोर्ट लिखिए.
पुलिस : तो तुम नहीं मानोगी? तुम साबित नहीं कर पाओगी कि रेप किया गया है.

पुलिस किम पर यही इल्ज़ाम लगाती रही कि वह गलत इल्ज़ाम लगा रही है लेकिन किसी तरह जद्दोजहद के बाद किम की तरफ से पुलिस को रिपोर्ट लिखना पड़ी. जैसे ही यह केस दर्ज हुआ तो कुछ ही समय में किम के बयान के आधार पर मीडिया में कुछ खबरें आ गईं. इसके बाद किम की मुश्किलें बढ़ना शुरू हुईं. एक दिन अचानक पुलिस किम के घर पहुंची और उसे गिरफ्तार कर ले गई.

किम के खिलाफ इल्ज़ामों की लंबी लिस्ट थी जिसमें मानहानि, झूठी गवाही देने, बेइज़्ज़ती करने, डराने और यौन उत्पीड़न करने के आरोप शामिल थे. किम को यकीन ही नहीं हुआ कि उसके खिलाफ लगे इन झूठे आरोपों को पुलिस इतनी तवज्जो कैसे दे सकती है. किम के खिलाफ ये तमाम आरोप उस लड़के ने ही लगाए थे जिसके खिलाफ रेप का केस किम ने दर्ज करवाया था.


किम ने अपने वकील को बुलाया तब वकील ने समझाया कि देश के क्रिमिनल डिफेमेशन लॉ यानी आपराधिक मानहानि कानून के हिसाब से ज़रूरी नहीं है कि सच बचाव की दलील हो ही. अगर आपके सच बोलने से किसी की शान में गुस्ताखी होती है तो इस कानून के हिसाब से आपका सच बोलना जायज़ नहीं है. यह सब सुनकर किम को यकीन ही नहीं हो रहा था कि बलात्कार की शिकार होने के बावजूद उसे मर्दों को बचाने के लिए बने इस कानून से लंबी लड़ाई लड़नी होगी.

नौकरी गई लेकिन जारी रही इंसाफ की जंग
किम की लड़ाई शुरू हो चुकी थी और इस कानून के तहत लगाए गए इल्ज़ामों के चक्कर में उसे आएदिन पूछताछ के लिए पुलिस ले जाती तो कभी कोर्ट में सुनवाई होती. किम को इंसाफ की इस जंग के लिए अपनी नौकरी छोड़ना पड़ी. एक तरह से न तो उस कंपनी के मालिक चाहते थे कि किम उस आॅफिस में रहे और न ही किम के लिए संभव रह गया था. किम ने पुलिस, कोर्ट और कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए बनी संस्थाओं में अर्ज़ियां दाखिल कर खुद पर लगे झूठे इल्ज़ाम वापस लिये जाने की दरख्वास्त की.

केस वापस लेने के लिए धमकियों का दौर
एक तरफ किम अपने अधिकार और इंसाफ के लिए लड़ रही थी और उधर, उसे लगातार धमकियां मिलने का सिलसिला शुरू हुआ. बलात्कारी और उसके दोस्तों की तरफ से किम और उसके परिवार को जान से मार दिए जाने की धमकियां मिलने लगीं. कभी उसके घर पर पत्थर फेंके जाते तो कभी फोन पर गालियों के साथ घर के किसी भी सदस्य को धमकाया जाता. कभी सड़क तो कभी किसी शॉपिंग मॉल में किम या उसके परिवार को निशाना बनाकर डराया जाता.

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एक दिन उस बलात्कारी लड़के ने किम के घर फोन किया और कहा —

अब तो तुम समझ गई होगी कि कानूनी लड़ाई कितनी मुश्किल है. तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी इसलिए बेहतर है कि केस वापस ले लो. मैं पूरी ईमानदारी से कह रहा हूं कि अगर तुम यौन शोषण और बलात्कार का केस वापस ले लोगी तो मैं भी तुम्हारे खिलाफ लगाए गए झूठे आरोपों और मानहानि का केस वापस ले लूंगा. फैसला तुम्हारे हाथ में है.


क्रूर हंसी हंसने के बाद रेपिस्ट ने फोन रख दिया लेकिन किम अपने फैसले पर अटल थी. उसे यह उम्मीद कहीं न कहीं थी कि उसे एक दिन न्याय ज़रूर मिलेगा. वह मन ही मन सोचती थी कि अगर न्याय मिलने की कोई उम्मीद न होती तो केस वापस लिये जाने के लिए इतनी धमकियां, इतनी यातना उसे नहीं दी जाती.

ब्लॉग के ज़रिये बदनाम करने की कवायद
रोज़ाना किम को धमकी भरे मैसेज मिलने का सिलसिला जारी ही था कि किम को बदनाम करने के लिए गुनहगारों ने एक और चाल चली. किम को समाज में कलंक बताने के लिए बलात्कार के आरोपी और उसके साथियों ने इंटरनेट का सहारा लिया. एक ब्लॉग और आॅनलाइन चैटरूम के ज़रिये किम को न सिर्फ बदनाम किया गया बल्कि उसके और उसके परिवार पर सीधा हमला बोलते हुए भद्दे कमेंट्स किए जाने लगे.

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इन तमाम हरकतों से किम और उसका परिवार घबरा तो रहा था लेकिन किम सब कुछ सहते हुए इन सारी धमकियों, उलाहनों और गालियों को सहेज रही थी क्योंकि उसे यकीन था कि एक न एक दिन किसी अदालत में सबूत के तौर पर ये सब कुछ सुना और देखा जाएगा.

और फिर किम जीत गई
इंसाफ की जंग लड़ते हुए किम ने महीनों यातना झेली थी. महीनों तक न तो वह ठीक से खाना खा पाती थी, न सो पाती थी और न ही एक पल को मुस्कुरा पाती थी. किम के आरोपों के कारण वह बलात्कारी लड़का जेल भी जा चुका था लेकिन जेल से निकलने के बाद भी उसने किम के खिलाफ आरोप और केस दायर करने का सिलसिला जारी रखा. आखिरकार किम उन गिनी चुनी लड़कियों में शुमार हुई जिन्हें इंसाफ मिला था.

चार सालों तक मुसीबतें झेलने के बाद साल 2014 में किम के हक में अदालत ने फैसला सुनाया और आरोपी लड़के को पीछा करने और डराने धमकाने के आरोप में दोषी करार देकर जेल भेज दिया. इसके बाद कानूनी कार्रवाई चलती रही और अरसे बाद इस आरोपी को रेप का दोषी करार देकर दो साल की कैद की सज़ा सुनाई गई. साथ ही, किम के खिलाफ लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज किया गया.

कहानी यहां खत्म नहीं हुई
मेरी तरह और भी लड़कियां और औरतें हैं जो बलात्कारियों द्वारा लगाए गए केसों की मार झेल रही हैं. बहुत गुस्सा आता है और बेचैनी रहती है कि हमें अपराधियों की तरह ट्रीट किया जाता है जबकि हम ही पीड़ित हैं. लेकिन अब हम सारी औरतें पलटकर नहीं देखेंगी और कभी अपनी लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगी.

यह कहना है किम का जो अपने हक में अदालत के फैसले के बाद से एक कार्यकर्ता बनकर पीड़ित महिलाओं की मदद कर रही है. इस कहानी में पीड़िता की पहचान छुपाने के लिए किम के वास्तविक नाम का ज़िक्र नहीं है.

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यह कहानी है दक्षिण कोरिया की जहां क्रिमिनल डिफेमेशन लॉ को रेप पीड़ितों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. रेपिस्ट पुरुषों को बचाने की नीयत वाले इस कानून के चलते यहां कई रेप पीड़ित महिलाएं इंसाफ की राह चुनने में ही हिचकिचाती हैं.


ऐसी स्थितियों के खिलाफ और महिलाओं के हक में लड़ने वाली कोरिया वीमन्स हॉटलाइन की चो जे यिओन का कहना है कि बदला लेने की नीयत से दायर किये जाने वाले केसों के डर से ही रेप पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं. ऐसी ही संस्थाओं की लड़ाई का नतीजा यह हुआ है कि इस साल जुलाई में सिओल के विधि मंत्रालय ने निर्देश जारी किया है कि यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के खिलाफ दायर किए गए आरोपों के केसों की जांच तब तक न की जाए जब तक यौन उत्पीड़न का केस किसी नतीजे पर न पहुंचे.

यह एक छोटी सी जीत है और कई महिलाओं का मानना है कि लड़ाई अभी बहुत लंबी है.

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