'मैं ज़िंदा हूं तो मेरी हत्या के इल्ज़ाम में मेरा पति जेल में क्यों?'

एक लड़की के कत्ल के इल्ज़ाम में उसके पति और ससुर को जेल भेजा गया लेकिन महीनों बाद वह लौटी. बिहार की इस कहानी में पेंच आया और सवाल खड़ा हुआ कि पुलिस ने किसकी लाश को जलाकर सारे सबूत खत्म कर दिए?

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 7:46 PM IST
'मैं ज़िंदा हूं तो मेरी हत्या के इल्ज़ाम में मेरा पति जेल में क्यों?'
सांकेतिक चित्र
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 7:46 PM IST
इसी साल 26 मई को सोनिया घर से गायब होती है. कुछ ही देर बाद कोसी नदी किनारे एक लाश मिलती है. लाश की शिनाख़्त सोनिया के तौर पर की जाती है. सोनिया के कत्ल के इल्ज़ाम में उसके पति और ससुराल वालों को पकड़कर पुलिस जेल भेज देती है. लाश किसकी थी? ये सवाल तब खड़ा होता है, जब 5 महीने बाद सोनिया थाने पहुंचकर कहती है 'मेरे पति को छोड़ो'!

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रंजीत बिहार के सुपौल ज़िले के एक थाने में पहुंचा और उसने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाते हुए गुहार लगाई कि उसकी बीवी सोनिया गायब हो गई. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज की और रंजीत को दिलासा देकर रवाना कर दिया. रंजीत और उसका परिवार कई ठिकानों पर सोनिया को तलाशता रहा. शाम होने को थी और रंजीत को पुलिस ने तलब किया. रंजीत को कतई उम्मीद नहीं थी कि बजाय सोनिया की खबर मिलने के उसे ऐसा झटका मिलेगा.

पुलिस ने कुछ ही देर पहले कोसी नदी के किनारे से एक लड़की की लाश बरामद की थी. रंजीत जब थाने पहुंचा तो पुलिस अफसर फोन पर कुछ बात कर रहा था. 'हो जाएगा, आप सब्र रखो. अब काम हमारा है, हमें करने दो. टेंशन न लो आप. पुलिस की पावर देखते जाओ.' यह कहकर उस अफसर ने जैसे ही फोन रखा. रंजीत ने अपनी बीवी के बारे में पूछा और बहस शुरू हुई.

पुलिसमैन : क्यों बे? पुलिस वालों को बेवकूफ समझता है तू? फटाफट बता, तेरे साथ कौन-कौन शामिल था सोनिया के कत्ल में?
रंजीत : सोनिया का कत्ल? क्या रहे हो आप? ज़रूर कोई गलतफहमी हुई है सर...
पुलिसमैन : चुप बे. सीधे सीधे बताएगा कि अपनी पर उतरें हम?
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इसके बाद शुरू हुआ एक ऐसा एपिसोड जो रंजीत और उसके परिवार को हैरान करने वाला था. रंजीत के पिता विसुन को भी थाने बुलाया गया. दोनों से कड़ी पूछताछ होती रही और दोनों को मजबूर किया जाता रहा कि सोनिया की हत्या कबूल करें. दोनों ने जब कबूलनामे से इनकार किया तो थोड़ी ही देर में गांव के मुखिया को बुलाया गया. मुखिया के बयानों का सहारा लेकर पुलिस ने अपनी थ्योरी मज़बूत कर और सख़्ती से दोनों पर दबाव बनाया.

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बहुत देर बाद नदी किनारे मिली लाश की तस्वीर रंजीत और विसुन को दिखाई गई. रंजीत ने तस्वीर देखते ही कहा 'आपसे भूल हो गई सर, ये सोनिया नहीं है. ये कोई और लड़की है.' रंजीत की बात सुनकर पुलिस और तैश में आ गई.

पुलिसमैन : केस बनाओ इन दोनों पर मर्डर का. और लेकर चलो, खातिर करना पड़ेगी इनकी.
रंजीत : ये आप क्या कर रहे हो सर? सोनिया लापता है, उसे खोजना चाहिए आपको.
पुलिसमैन : तू बताएगा हमें क्या करना चाहिए? अभी बताते हैं बेटा कि कैसे लाइन पर लाया जाता है तुम जैसों को.

कुछ पुलिसकर्मी रंजीत और विसुन को एक बंद कमरे में ले गए. दोनों वहां बंधे हुए बैठे एक दूसरे को देखते रहे और अंदाज़ा लगाते रहे कि चक्कर क्या है? लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उधर, पुलिस ने सोनिया की लाश रंजीत की मां गीता को सौंपकर लाश का अंतिम संस्कार करने को कहा. गीता ने काफी नानुकुर की लेकिन मुखिया और पुलिस के दबाव में वह कुछ न कर सकी. लाश का क्रियाकर्म हो रहा था और एक पुलिसकर्मी अपने अफसर से पूछ रहा था -

पुलिसमैन : सर लेकिन अभी स्टेटमेंट नहीं है अपने पास. अगर कुछ लफड़ा हो गया तो?
अफसर : हम मर गए हैं क्या? स्टेटमेंट मिल जाएगा. पुलिस का पावर भूल गए हो क्या बाबू?

अब पुलिस की टीम रंजीत और विसुन के पास लौटी. दोनों से हत्या कबूलने को कहा गया और ये स्टेटमेंट लेने के लिए पुलिस ने मारपीट और टॉर्चर शुरू किया.

पुलिसमैन : नहीं किया मर्डर, नहीं किया? नंगा करो इसको. खाल खिंचेगी तब सच बाहर आएगा.
रंजीत : छोड़ दो सर. हमें छोड़ दो, हम बेकसूर हैं.
पुलिसमैन : हां साले, कसूर तो हमारा है. तू देखता जा. अभी तेरे बाप का नंबर भी आएगा.

काफी देर टॉर्चर सहन करने के बाद रंजीत और विसुन बेहोश हो गए. एक बयान तैयार कर लिया गया था जिसमें लिखा था कि दोनों ने सोनिया का कत्ल किया और गीता ने कत्ल में साथ दिया. पानी के छींटों से दोनों की बेहोशी तोड़ी गई और अधमरी हालत में दोनों के साइन इस बयान पर ले लिये गए. इसके बाद परिवार के बाकी लोगों की जान को लेकर दोनों को बुरी तरह धमकाया गया.

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किसी तरह कोर्ट में पेशी हुई और रंजीत व विसुन को जेल भेज दिया गया. जेल ले जाते वक्त फिर एक पुलिसमैन फोन पर बात कर रहा था - 'मिठाई खिलवाइए अब तो. हम न कहे थे, पुलिस का पावर देखिए. देख लिये? अब ज़रा हमारी पसंद की मिठाई का इंतज़ाम कीजिए.' रंजीत और विसुन ठहाकों के साथ हो रही इस बातचीत को सुनकर बेसुध से कैदी वाहन में बैठे रहे. जेल जाकर भी दोनों ये नहीं समझ पा रहे थे कि ये सब आखिर हुआ क्या? और अब क्या होने वाला था?

केस बंद हो गया. पुलिस ने खुद अपनी पीठ थपथपा ली. रंजीत की मां गीता को भी गिरफ्तार किया गया लेकिन उसे ज़मानत पर रिहाई मिली. पूरा परिवार बिखर और टूट चुका था. सोनिया की हत्या की बात किसी को पच नहीं रही थी लेकिन गांव के चौक-चौपालों पर कई तरह की चर्चाएं जारी थीं.

एक : ज़माना बड़ा खराब है भैया, किसी पर भरोसा करने का टाइम नहीं रहा.
दो : लेकिन, उनकी फैमिली में ऐसा कोई कांड चल रहा था, ऐसा सुना तो कभी नहीं!
तीन : भैया अंदर की खबर तो ये भी मिली है कि इस कांड में पुलिस ने कोई चाल चली है!
एक : लेकिन, हमारे जिले और प्रदेश में ऐसी खबरें आम हैं कि बहुओं पर अत्याचार होते हैं तो इस परिवार में भी हो सकता है, इसमें अचरज क्या है? अब किसी के माथे पर तो नहीं लिखा होता कि उसका कैरेक्टर क्या है!
तीन : लेकिन चाचा, सोचने वाली बात तो ये है कि लाश मिली तो उसका पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? अपन को तो शक है भैया...

दिन बीतते गए और मामला ठंडा पड़ता गया. चर्चाएं थम गईं लेकिन जेल में रंजीत और विसुन के मन से एक पल को कोई याद भूली नहीं. उनके बस में यादों के अलावा कुछ था भी नहीं. फिर करीब पांच महीने बाद अचानक वो मोड़ आया जिसने पुलिस को चौंका और भीतर से कहीं डरा भी दिया. सोनिया गांव आने के बाद थाने पहुंची तो हर तरफ सनसनी फैल गई.

मैं ज़िंदा हूं. मेरे कत्ल के इल्ज़ाम में मेरे पति और ससुर जेल में क्यों हैं? उस दिन मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था और मैं सिमराई गई थी. वहां से एक पहचान की लड़की मुझे दिल्ली ले गई. मैं अपनी फैमिली से कोई बात नहीं कर सकी क्योंकि मैं किसी बात से नाराज़ थी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मेरे कत्ल की कहानी गढ़कर मेरे घरवालों को जेल भेज दिया जाए...


सोनिया के इस बयान के बाद पुलिस पड़ताल करने पर मजबूर थी कि ये लड़की सोनिया ही है या कोई और. तमाम दस्तावेज़ों और गवाहियों से साबित हुआ कि यह सोनिया ही थी. अब पुलिस वाले अपनी बगलें झांकने पर मजबूर थे. इधर सोनिया ने मीडिया के सामने पूरी कहानी बयान की और कानूनी कार्यवाही शुरू हुई. नवंबर के आखिर तक रंजीत और विसुन जेल से छूटे तो दोनों ने बताया कि कैसे टॉर्चर करके उनसे झूठा बयान लिया गया था.

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इस परिवार के समर्थन में सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता भी उतर आए. सच जानने और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की लड़ाई छिड़ चुकी है लेकिन सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है कि वो लाश किसकी थी जिसका पोस्टमार्टम करवाए बगैर अंतिम संस्कार करवा दिया गया? क्या इसमें पुलिस की मिलीभगत थी? क्या कत्ल और किसी कातिल को बचाने की कोशिश में एक बेकसूर परिवार को फंसाया गया?

(यह कहानी सच्ची घटनाओं और पीड़ितों की आपबीती पर आधारित है.)

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