किस्‍सागोई : एक बड़ा बिजनेसमैन, जिसने ज्‍योतिषी की सलाह पर चौंकाने वाला अपराध किया

 यह मामला जुड़ा है पी राजगोपाल से, जिन्‍हें भारत का डोसा किंग कहा जाता रहा है.

यह मामला जुड़ा है पी राजगोपाल से, जिन्‍हें भारत का डोसा किंग कहा जाता रहा है.

कई सालों तक राजगोपाल की छवि एक नियोक्ता/मालिक की थी, जो अपने कर्मचारियों का बेहद ध्यान रखते थे और उन्‍हें अच्‍छा वेतन देने के साथ ही उनके और उनके परिवारों की अच्‍छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित करते थे. फिर अचानक से चीजें गलत हो गईं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2021, 12:03 PM IST
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आमतौर पर अपराध करने की प्रवृति होती है, या तो वह जानबूझकर यानि सोची समझी साजिश के तहत किया जाता है या गुस्‍से में आकर.. लेकिन भारत के इतिहास में एक ऐसा ही वाकया दर्ज है, जिसमें देश के एक बड़े बिजनेसमैन ने महज ज्‍योतिषी की सलाह पर अंधविश्‍वास में एक चौंकाने वाला अपराध किया. अंधविश्‍वास की बिनाह पर हुए इस क्राइम ने इस बड़े बिजनेसमैन को अर्श से फर्श तक पहुंचा द‍िया.

दरअसल, यह मामला जुड़ा है पी राजगोपाल से, जिन्‍हें भारत का डोसा किंग कहा जाता था. पी राजगोपाल मशहूर साउथ इंडियन फूड रेस्तरां चेन सवर्णा भवन के मालिक थे. ग्रामीण तमिलनाडु में एक किसान परिवार में जन्मे और बेहद कम शिक्षित राजगोपाल ने एक वैश्विक रेस्तरां चेन खड़ी की.

राजगोपाल ने अपनी आत्‍मकथा ‘I set my heart on victory’ में अपनी सफलता की कहानी को दुनिया से रूबरू कराते हुए बताया कि उन्होंने एक "चाय बनाने" वाले से लेकर एक किराने की दुकान में सहायक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की. उन्होंने 1981 में चेन्नई के केके नगर में पहला सरवना भवन खोलने से पहले एक प्रोविजन स्टोर खरीदा. यह रेस्तरां लोकप्रिय हो गया और इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने सिंगापुर से कनाडा तक देश-विदेश में फ्रेंचाइजी खोलीं.

कई सालों तक राजगोपाल की छवि एक नियोक्ता/मालिक की थी, जो अपने कर्मचारियों का बेहद ध्यान रखते थे और उन्‍हें अच्‍छा वेतन देने के साथ ही उनके और उनके परिवारों की अच्‍छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित करते थे. फिर अचानक से चीजें गलत हो गईं.
इंडियन एक्‍सप्रेस का एक लेख सीनियर पुलिस ऑफि‍सर के हवाले से बताता है कि अत्यंत धार्मिक व्यक्ति राजगोपाल को ज्योतिषी ने सरवना भवन की चेन्‍नई ब्रांच में काम करने वाले एक सहायक प्रबंधक की बेटी जीवजोती से शादी करने की सलाह दी. ज्‍योतिषी ने उनसे कहा कि ऐसा करने पर राजगोपाल के जीवन में सौभाग्‍य आएगा. यानि वे सफलता की नई सीढि़यां छू लेंगे.

लेख बताता है कि राजगोपाल का पतन साल 2001 से शुरू हुआ, जब उन पर अपने कर्मचारी प्रिंस संतकुमार को धमकाने, अपहरण करने और उनकी हत्या करने का आरोप लगा, ताकि वह संतकुमार की पत्नी जीवजोती से शादी कर सकें. उस वक्‍त, राजगोपाल की पहले से दो पत्नियां थीं, जिनमें से दूसरी एक पूर्व कर्मचारी की पत्नी थी. जीवनजोती भी राजगोपाल के पूर्व सहायक प्रबंधक, रामासामी की बेटी थी.

इस केस के अभियोजकों का कहना है कि राजगोपाल जीवजोती और उनके परिवार की आर्थिक मदद करते. वह अक्सर टेलीफोन पर उससे बात करते. उसे गहने और महंगी साड़ियों के उपहार देते और उसके उपचार के लिए भुगतान तक करते थे.



इस मामले के जांचकर्ताओं का कहना था कि 'एक बार जब वह बीमार थी, तो एक अन्य चिकित्सक की सलाह पर बेहतर इलाज के बहाने, अभियुक्त नंबर 1 (राजगोपाल) ने उसे जबरन दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया. यहां उसने जीवजोती को अपने पति के साथ यौन संबंध नहीं बनाने की सलाह दी और उसे कई सारे टेस्‍ट कराने को कहा. उन्‍होंने संतकुमार को भी निर्देश दिया गया था कि वह खुद एड्स और ऐसी अन्य बीमारियों के लिए जांच करवाएं, जिससे संतकुमार ने साफ इनकार कर जिन्हें दिया.'

बताते हैं कि जीवजोती ने राजगोपाल से शादी करने से इनकार कर द‍िया था. लेख में बताया गया है कि अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि राजगोपाल ने दंपति को अलग होने के लिए कहा. जब उन्होंने इनकार कर दिया, तो राजगोपाल ने उनसे बदला लेना शुरू किया. 1 अक्टूबर, 2001 को दंपति ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया.

राजगोपाल के खिलाफ मामले के अनुसार, कुछ दिनों बाद, संतकुमार का चेन्नई से अपहरण कर लिया गया और कोडाइकनाल ले जाया गया, जहां उसकी हत्या कर दी गई. शव टाइगर चोल जंगल से बरामद किया गया और पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि उसक गला घोंटा गया था.

इंडियन एक्‍सप्रेस के अनुसार, 23 नवंबर, 2001 को, राजगोपाल ने सरेंडर कर द‍िया. उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन दो साल से भी कम समय के बाद 15 जुलाई 2003 को उन पर जीवाजोथी को 6 लाख रुपये की रिश्वत देने की कोशिश करने, उसे डराने और उसके भाई रामकुमार पर हमला करने का आरोप लगा. चेन्नई के एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें गैर इरादतन हत्या का दोषी दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 55 लाख रुपये जुर्माने की की सजा सुनाई. उन्हें जीवजोती के मुआवजे के रूप में 50 लाख रुपये देने को कहा गया.

मार्च 2009 में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने उसे और उसके सह-अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के लिए दोषी नहीं मानते हुए एक गलती की थी और उन्‍हें उम्रकैद की सजा सुनाई. राजगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया.

एक द‍िन राजगोपाल ने हृदय संबंधी समस्याओं की शिकायत की. उनकी स्थिति के कारण मद्रास उच्च न्यायालय ने उन्हें स्टेनली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के जेल वार्ड से चेन्नई के विजया अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति दी, जहां उन्होंने 18 जुलाई 2019 की सुबह अंतिम सांस ली.
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