'जब तक लड़कियों को बात समझ आती, काफी देर हो चुकी होती थी...'

अपराध कथा पर आधारित उपन्यास सत्ता परिवर्तन हाल में प्रकाशित हुआ है. यह उपन्यास पत्रकार अमिताभ बुधौलिया ने लिखा है जो अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है. इस उपन्यास के कुछ अंश...

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Updated: January 10, 2019, 3:23 PM IST
'जब तक लड़कियों को बात समझ आती, काफी देर हो चुकी होती थी...'
सांकेतिक चित्र
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Updated: January 10, 2019, 3:23 PM IST
रात का पहर था. भर्रोली गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था. वैसे भी सूरज ढलते ही लोग गांव से बाहर निकलने से डरते रहे हैं. उनके मन में नक्सलियों का खौफ अंदर तक भरा हुआ है. उधर, गांव की सीमा से बाहर एक खेत में अजीब सी हलचल मची हुई थी. गेहूं की ताज़ी बालियों में सरसराहट हो रही थी. फसल के अंदर 4-5 लोगों की मौजूदगी नज़र आ रही थी. वहीं एक बच्ची के छटपटाने की आवाज़ भी.

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'मुझे जाने दो, छोड़ दो भैया?' लड़की के गिड़गिड़ाने की आवाज़ सुनाई पड़ी. 'अरे छोड़ देंगे, बस कुछ ही देर की तो बात है'. किसी व्यक्ति ने लड़की की बात पर जवाब दिया था.

लड़की दर्द से तड़पते हुए लगातार रोए जा रही थी. दरअसल, ये लोग उस लड़की का बलात्कार कर रहे थे. कुछ मिनटों तक यही सब कुछ चलता रहा, फिर अचानक खच्च... की आवाज़ के साथ लड़की की ज़ोर से चीख सुनाई पड़ी थी लेकिन यह चीख कुछेक सेकंड तक ही रही. इसके बाद वहां एकदम खामोशी छा जाती है.

फिर एक आवाज़ सुनाई पड़ी — 'चलो, चलते हैं यहां से...? और हां, तुमने उसे फोन कर दिया?' इसके जवाब में किसी दूसरे व्यक्ति का जवाब सुनाई पड़ा — 'हां, कुछ देर में वे लाश को यहां से उठा ले जाएंगे.'

कुछ देर बाद ये लोग खेत से बाहर निकलकर अंधेरे में दूर कहीं गुम हो गए थे. कुछ पलों तक वहां डरावना सन्नाटा पसरा रहा, फिर अचानक एक कार के जाने की आवाज़ आती थी. घर्र...घर्र...घर्र ठंड में सिमटी और कोहरे भरी रात में खेत से कहीं दूर जाती कार की एक हल्की झलग नज़र आती थी. तभी खेत से एक लड़की घिसटते हुए बाहर निकली थी. उसके कपड़े अस्त व्यस्त थे. हाथ—पैरों में खरोंच के निशान थे. उसका गला भी किसी तेज़ हथियार शायद चाकू से रेता गया था. इस वजह से उसकी आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी. कुछ पल वह तड़पती रही, फिर उसने दम तोड़ दिया था. यह लड़की और कोई नहीं पूजा थी. तभी मोटरसाइकिल से दो लोग वहां आते दिखाई दिए. ये लोग लड़की के साथ दुष्कर्म करने वाले लोगों के दूसरे अन्य साथी थे. उन्होंने पूजा की लाश को मोटरसाइकिल पर लादा और गांव की तरफ मुड़ गए थे.

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वे खेतों बीच उबड़ खाबड़ जंगली रास्ते से गांव की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन उनके दरमियान कोई बातचीत नहीं हो रही थी...

उपन्यास का एक और दृश्य
रामकुमारी के भागने से मुख्तार इस बदमाश से नाराज़ था. मुख्तार गुस्से में दहाड़ा — 'तो पैंट गीली कर लेता... पार्सल भाग निकला, उसकी भरपाई क्या तेरी बहन करेगी, या मां?'

'भाई, अगली बार ऐसा नहीं होगा.' मुख्तार की आंखों में खून सा उतराता देख बदमाश कांपने लगा था. लेकिन मुख्तार के चेहरे पर ज़रा सी भी शिकन नहीं आई.

'मुख्तार मालिक किसी को पहला चांस भी बड़ा सोच समझकर देता है, और तू दूसरा मांग रहा है?' मुख्तार का बोलना जारी था — 'बहुत सूसू लगती है न तेरे को... ले...?'

इतना कहते हुए मुख्तार ने तलवार से बदमाश के लिंग पर वार किया था. बदमाश की एक ज़ोरदार चीख निकल पड़ती है. वह तड़पने लगा था.

'न रहेगी पुंगी, न उठाना पड़ेगी, बार—बार लुंगी. और न करना पड़ेगा लुंगी डांस.' इतना कहने के साथ ही मुख्तार ने इस बार बदमाश की गर्दन पर तलवार से वार किया था. बदमाश कुछ देर फड़फड़ाता रहा, फिर वहीं दम तोड़ दिया था.

मुख्तार ने तलवार को अपनी जेब में रखे रूमाल से साफ करते हुए समीप खड़े एक अन्य बदमाश से चरस की पुड़िया ली. उसे सूंघा. फिर बाएं खड़े टुंडे की ओर पलटकर चरस की पेटियां की ओर इशारा किया — 'आज रात इस माल की डिलेवरी करनी है. और हां, भागी हुई लड़कियां हमें पसंद नहीं हैं.'

टुंडे ने ज़मीन पर पड़ी बदमाश की लाश को घूरते हुए जवाब दिया — 'भाई, टेंशन न लें, कब तक भागेंगी, कहां तक भागेंगी?'

तभी वहां एक अन्य बदमाश आया और बोला — 'मुख्तार भाई, तीन पार्सल तैयार हैं.'

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यह सुनकर मुख्तार के होंठों पर कुटिल मुस्कान दौड़ पड़ी — 'लेकर आओ.' यह सुनते ही उस बदमाश ने बाहर खड़े दो युवकों को अंदर आने का इशारा किया. दोनों युवक अंदर आए. उनके साथ दो लड़कियां भी थीं. इनमें से एक बदमाश रफीक था, जबकि दूसरा सामने खड़ी एक लड़की बिंदा का प्रेमी सतीश. बिंदा के साथ एक अन्य लड़की भी सहमी—सी खड़ी थी. वह गांव की भोली—भाली लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाता था और फिर मुख्तार को सौंप देता था. जब तक लड़कियों को यह बात समझ आती, तब तक काफी देर हो चुकी होती थी.

मुख्तार ने घूरते हुए लड़कियों को देखा — 'कहां से उठाया है?' रफीक ने मुस्कुराकर जवाब दिया — 'एक भांडेर से, दो बड़ोनी से.'

मुख्तार ने टुंडे को इशारा करते हुए कहा — 'ठीक है.' मुख्तार का इशारा पाकर टुंडे रफीक और सतीश को जाने को कहता है.

अचानक मुख्तार को कुछ याद आया. उसने टुंडे से कहा - 'कुछ दिल्ली से भी डिमांड आई है न... तुमने बताया था?'

यह सुनकर टुंडे ने झट से वहां से जाते हुए रफीक के कंधे पर हाथ रखकर उसे रोका. रफीक ने मुख्तार की ओर देखा और मुस्कुराया. 'ठीक है भाई करता हूं, जल्द.' इतना कहकर वह बाहर निकल गया था...

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