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वेलेंटाइन डे पर बीवी को मारने, फिर दोस्त की पहचान चुराने वाले शातिर की कहानी

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: February 14, 2019, 4:58 PM IST
वेलेंटाइन डे पर बीवी को मारने, फिर दोस्त की पहचान चुराने वाले शातिर की कहानी
सांकेतिक चित्र

अहमदाबाद में एक कत्ल अनसुलझा रहा लेकिन कातिल को छोटी सी चूक महंगी पड़ी. पुलिस को 15 साल गुमराह करने के लिए कातिल ने कई हथकंडे अपनाए तो पुलिस 'तू डाल डाल मैं पात पात' की तरह पीछे पड़ी रही और बेंगलूरु में उसे धर दबोचा.

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  • Last Updated: February 14, 2019, 4:58 PM IST
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कत्ल जैसे जुर्म के बाद धोखा, डर, जालसाज़ी, झूठ, दूसरा प्यार और अतीत... इस कहानी में इतने पहलू और मोड़ हैं कि किसे छोड़ा जाए, किसे पकड़ा जाए. तुर्रा ये कि इतने पहलू तो कातिल की कहानी में हैं, 15 साल चली पुलिस की तहकीकात और कानूनी केस के पेंच तो और भी हैं. एक कत्ल होता है, कातिल 15 साल एक शानदार ज़िंदगी जीता चला जाता है और पुलिस क्या किसी को भनक नहीं लगती कि वो कातिल के साथ हैं. पहेलीनुमा कहानी शुरू से, यानी अहमदाबाद के क्राइम सीन से शुरू होती है.

मूल रूप से दक्षिण भारतीय तरुण की शादी साल 2002 की सर्दियों में सजनी से हुई थी. दोनों अहमदाबाद में रह रहे थे और शादी के बाद पहले वेलेंटाइन डे पर सजनी सुबह से ही इंतज़ार कर रही थी कि उसका साजन यानी तरुण उसके लिए शायद कुछ सरप्राइज़ प्लान कर रहा होगा. दोपहर में लंच टाइम के बाद घर की घंटी बजी. सजनी ने दरवाज़ा खोला तो एक गुलदस्ता लिये तरुण सामने खड़ा था. तरुण ने गले मिलकर उसे 'हैपी वेलेंटाइन्स डे' कहा और फिर दोनों बेडरूम में चले गए.

थोड़ी देर दोनों ने बातचीत की और शाम व रात का प्लान बनाया. इसके बाद तरुण कुछ देर के लिए कमरे से बाहर गया. सजनी बिस्तर ठीक करने लगी तभी पीछे से तरुण आया और सजनी के ही एक दुपट्टे से उसका गला घोंटने लगा. हैरान सजनी ने खुद को बचाने की कोशिश की लेकिन उसके गले पर कसाव बढ़ता ही चला गया और डेढ़-दो मिनट बाद सजनी का दम घुट गया. सजनी की लाश को चेक करने के बाद तरुण ने उसे बिस्तर पर पटक दिया.

इसके बाद तरुण ने घर में उठापटक शुरू की और कुछ देर बाद ठीक से तैयार होकर अपने भाई अरुण के घर गया. देर शाम पहुंचे तरुण ने अरुण और उसकी बीवी को शाम को घर आने की दावत दी और फिर वक्त तय करने के बाद आॅफिस जाने की बात कहकर चला गया. रात होते अरुण और उसकी बीवी तरुण के घर पहुंचे तो दरवाज़ा नहीं खुला. दरवाज़े पर खड़े दोनों इंतज़ार ही कर रहे थे कि तभी तरुण वहां पहुंचा. सबने घंटी बजाई लेकिन दरवाज़ा न खुलने पर तरुण ने अपनी चाबी से खोला.

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घर की हालत देखकर सभी हैरान थे. तरुण फौरन भीतर की तरफ दौड़ा और उसके पीछे पीछे अरुण भी. सजनी की लाश बिस्तर पर पड़ी देखकर तरुण ने बेहोश होकर गिर जाने का नाटक किया. थोड़ी देर में पुलिस वहां पहुंची और डॉग स्क्वॉड भी. घर में लुटेरे आए थे, घर लूटा और सजनी का गला घोंटकर चले गए, सबसे आसान था मौके को देखकर यही समझना. तरुण की हालत खराब नज़र आ रही थी. लेकिन खोजी कुत्ते ने जांच के दौरान तीन बार तरुण की तरफ इशारा किया.

जिसके लिए कत्ल किया, वो मिली ही नहीं
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तरुण को मन ही मन समझ आ गया था कि कुत्ते की वजह से वो फंस सकता है इसलिए उसने फिर बेहोशी का नाटक किया. तरुण को अस्पताल में दाखिल करवाया गया और पुलिस ने एक दो दिन बाद उसके ठीक होने पर उससे पूछताछ करने का फैसला किया. यही मौका था तरुण के लिए और इसी का फायदा उठाकर तरुण अस्पताल से भागकर सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचा. ट्रेन आने में वक्त था इसलिए तरुण ने पास ही एक हेयर सलून देखा तो उसे एक आइडिया सूझा.

उस सलून में जाकर उसने अपनी मूंछें और सिर के बाल मुंडवा दिये. उसे एकदम से पहचानना आसान नहीं था. अहमदाबाद से पहले उसने सूरत की ट्रेन पकड़ी. सूरत पहुंचने के बाद तरुण ने जया को फोन किया -

तरुण : वेलेंटाइन्स डे के गिफ्ट के तौर पर तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है स्वीटहार्ट..
जया : वाओ.. जल्दी बताओ फिर.
तरुण : अब हमारे एक होने के बीच कोई रोड़ा नहीं है. हम साथ रह सकते हैं, हमेशा के लिए.
जया : मतलब? तलाक दे दिया क्या अपनी सजनी को?
तरुण : तलाक वलाक क्या, उसे विदा ही दे दी. गई वो दुनिया छोड़कर. अब हमारे तो क्या किसी के बीच नहीं आएगी.
जया : मतलब तुमने खून कर दिया! शिट.. ये क्या कर दिया तरुण? तुम पागल हो गए हो क्या? मैंने ऐसा करने को तुमसे कभी नहीं कहा था. देखो मेरा इससे कोई लेना देना नहीं है और एक कातिल के साथ मुझे कोई रिश्ता नहीं रखना. आज के बाद मुझे फोन नहीं करना तरुण, प्लीज़.

सोचा क्या था और ये हो क्या गया? तरुण की समझ में कुछ नहीं आया. उसने तो जया को पाने के लिए ही ये सब कुछ किया था और अब जया ही उसे छोड़ रही थी. तरुण ने एक दो बार और उसे समझाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और जया ने कह दिया कि वह एक शरीफ आदमी की बीवी होकर ही खुश है, उसे कातिल की न तो मेहबूबा बनना है और न ही बीवी. दोनों के रास्ते यहां से अलग होते हैं. अब तरुण के पास नये सिरे से ज़िंदगी शुरू करने का ही रास्ता था.

भागने और कानून को चकमा देने की तरकीबें
जया को न पाने के दुख से जल्द ही तरुण उबरा और उसने तय किया कि पुलिस से बचने का रास्ता खोजकर वह दूसरी ज़िंदगी शुरू करेगा. तरुण ने एक अखबार में एक इश्तेहार देखा और आगे का प्लान बनाया. पहले उसने अरुण के एक दोस्त को फोन कर कहा कि उसके घर पर खबर कर दे कि वह ठीक है और बहुत दूर जा रहा है. इसके बाद तरुण ने सूरत में अपनी जुगाड़ के ज़रिये कुछ दस्तावेज़ तैयार करवाए.

वहां से तरुण बेंगलूरु गया और कुछ वक्त बाद एक कंपनी में नौकरी के सिलसिले में दिल्ली पहुंचा. दिल्ली में उसका इंटरव्यू हुआ तो उसने अपना नाम प्रवीण बताया और सारे सर्टिफिकेट और दस्तावेज़ प्रवीण के नाम से पेश किए. प्रवीण उसके कॉलेज के ज़माने में एक दोस्त हुआ करता था. तरुण को नौकरी मिल चुकी थी. उसकी पहचान और लुक अलग हो चुका था. दूसरी तरफ, पुलिस ने तरुण के फरार होने के बाद उसके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया था और सजनी की हत्या का केस चल रहा था.


पांच साल में केस में कई मोड़ आ चुके थे. हत्या का आरोप हटाकर दहेज प्रताड़ना का मुकदमा पुलिस ने बना दिया था. सजनी के माता पिता ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई थी लेकिन तरुण के परिवार को हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया गया था. तरुण का परिवार के साथ कोई संपर्क नहीं था. 2009 में कंपनी में अच्छी पोज़ीशन पर आ चुका तरुण पुणे शिफ्ट हो चुका था. पुणे में कंपनी में ही उसकी मुलाकात निशा से हुई.

दूसरा प्यार, दूसरी शादी और परिवार से फिर जुड़ाव
अब तरुण की ज़िंदगी में दूसरे प्यार ने दस्तक दी. उसने निशा को एक कहानी सुनाई. 'मैं जब बहुत छोटा था तभी एक कार एक्सीडेंट में मेरे मां, बाप की मौत हो गई थी. मुझ यतीम की परवरिश एक अंकल और आंटी ने की.' अपनी मेहनत के बल पर यहां तक पहुंचने की इस कहानी ने तरुण के लिए उसके दिल में जज़्बात पैदा किए और जल्द ही दोनों के बीच प्यार हो गया. फिर 2009 में ही दोनों ने शादी कर ली.

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पुणे और बेंगलुरु में नौकरियां करते हुए अच्छी तनख्वाह पाते रहे तरुण ने बेंगलुरु में एक आलीशान फ्लैट खरीदा. तरुण और निशा के दो बच्चे हुए. इस बीच, तरुण ने निशा को एक खास हिदायत ये दे रखी थी कि उसकी कोई तस्वीर किसी भी तरह सोशल मीडिया या इंटरनेट पर न डाली जाए. 2009 में शादी के बाद तरुण ने पहली बार अपनी मां अनम्मा से फोन पर बात की और उसे अपने जीवन के मोड़ के बारे में बताया और उसका हाल चाल पूछा.

दोनों ने अपने सुख दुख बांटे और मां की इच्छा पर तरुण ने एक बार मिलने का कार्यक्रम बनाया. तरुण की मां और पिता जिनाराज केरल में स्थित कुलदेवता के मंदिर पर पहुंचे. बहुत एहतियात के साथ तरुण वहां दोनों से मिलने पहुंचा. विस्तार से सबने बातचीत की और उसके बाद जिनाराज की मौत हो गई. तब, तरुण ने अपनी मां को एक सीक्रेट मोबाइल और नंबर दिया जिस पर केवल उन दोनों की बातचीत हो सके. तरुण ने यह भी समझा दिया कि इस फोन और उससे बातचीत को वह राज़ ही रखे.

यहां तरुण की ज़िंदगी पटरी पर चल रही थी और वहां, अहमदाबाद पुलिस ने 2011 में इस केस में जांच दोबारा शुरू की और तरुण के परिवार के लोगों पर निगरानी रखकर उस तक पहुंचने की कोशिश की. पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा क्योंकि तरुण किसी के संपर्क में था ही नहीं सिवाय गुपचुप ढंग से अपनी मां के. एक जांच अफसर ने महसूस किया कि अनम्मा से तरुण के बारे में कुछ सुराग मिल सकता था.

सेल्समैन के भेस में अफसर ने रखी नज़र
जांच अफसर ने अनम्मा की ही बिल्डिंग में एक सेल्समैन की पहचान बनाकर रहना शुरू किया. मान लीजिए कि जांच अफसर का नाम था विक्रम तो विक्रम ने देखा कि कुछ कुछ दिनों में अनम्मा केरल जाती थी. अनम्मा एक महिला के साथ करीबी थी इसलिए उस जांच अफसर ने उस महिला से पूछताछ की तो वह सिर्फ यही बता सकी कि अनम्मा का बड़ा बेटा दक्षिण भारत में कहीं और छोटा बेटा अहमदाबाद में काम करता था. उस वक्त तक तरुण पुणे से बेंगलुरु शिफ्ट हो गया था.

सालों तक यह जांच अफसर अनम्मा पर नज़र रखता रहा और उसके मोबाइल फोन के कॉल्स को ट्रेस करता रहा. जांच टीम और भी पहलुओं पर नज़र रखे रही लेकिन अनम्मा के नंबर पर कभी तरुण का कॉल नहीं आया क्योंकि जो नंबर जांच अफसर के हाथ लगा था, वह अनम्मा का था लेकिन तरुण से तो अनम्मा की बात सीक्रेट नंबर पर होती थी. तकरीबन एक लाख कॉल्स ट्रेस कर लिए गए थे लेकिन अनम्मा और तरुण के बीच संपर्क होने की बात साबित नहीं हो रही थी.

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सब ठीक चल रहा था और जांच टीम बुरी तरह परेशान हो चुकी थी कि इस केस में और कितना सिर खपाया जाए. तभी अचानक जांच टीम के लिए एक जादू हुआ. पिछले ही दिनों तरुण के दिए सीक्रेट नंबर पर अनम्मा पर बात नहीं कर रही थी. तरुण बार बार फोन लगाकर परेशान हो चुका था लेकिन किसी दिक्कत के कारण अनम्मा वह फोन नहीं उठा रही थी. तब परेशान होकर तरुण ने अनम्मा के पर्सनल नंबर पर फोन कर दिया. तरुण व अनम्मा को भनक नहीं थी कि पुलिस इस नंबर पर नज़र रखे हुए थी.

बस, यही चूक तरुण को भारी पड़ी. इस कॉल से तरुण का पता मिल गया क्योंकि उसने बेंगलुरु स्थित अपने आॅफिस के लैंडलाइन नंबर से वो कॉल किया था. जांच टीमें संयुक्त रूप से उस मल्टीनेशनल कंपनी के आॅफिस में पहुंचीं और नाइट शिफ्ट में वहां अफसर की हैसियत से काम कर रहे तरुण को बीते बुधवार यानी 24 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया. प्रवीण के नाम से जाने जा रहे तरुण को अहमदाबाद पुलिस अपने साथ ले गई. अब पुलिस ये जानने की कोशिश कर रही है कि तरुण ने जाली दस्तावेज़ कैसे बनवाए और कैसे सालों तक मल्टीनेशनल कंपनियों को इन दस्तावेज़ों से धोखे में रखने में कामयाबी पाई.

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First published: October 27, 2018, 8:09 AM IST
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