#SerialKillers: उसे मंदिरों में मिलते थे शिकार और पूजापाठ था उसका हथियार

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: July 14, 2018, 9:12 AM IST

कर्नाटक के बेंगलूरु की जेल में बंद देश की पहली महिला सीरियल किलर की कहानी... लालच और दौलत की हवस के चलते यह औरत बन गई कातिल और औरतों को अपना निशाना बनाया जो जिंदगी में किसी न किसी समस्या से जूझ रही थीं...

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देश दुनिया के सीरियल किलर्स #SerialKillers पर आधारित इस विशेष वीकेंड सीरीज़ में आप पिछले चार हफ्तों में कई सनसनीखेज़ कहानियां पढ़ चुके हैं. इस हफ्ते पढ़िए देश की पहली महिला सीरियल किलर की कहानी जिसने उन संपन्न महिलाओं को अपना निशाना बनाया जो किसी न किसी तरह परेशान थीं.

एक औरत जिसे ज़िंदगी तो मिली थी बेहद औसत और घर मिला था गरीब, लेकिन उसे सपने मल्लिका बनने के मिले थे. वह सब कुछ चाहती थी और अपनी चाहत के लिए सब कुछ कर सकती थी. एक साधारण ज़िंदगी जीते हुए अपनी हसरतें पूरी करने के लिए उसने तरकीबें सीखीं और फिर क्रूर कहानियों को अंजाम देकर वह बन गई देश की पहली महिला सीरियल किलर...

#SerialKillers: खुद को 'सुपरमैन' और 'भगवान' समझने लगा था यह कातिल

उस दिन वह पूरा परिवार पूजा की तैयारियों में लगा हुआ था. थोड़ी ही देर में यह विशेष पूजा कराने के लिए आनंदी आने वाली थी. आनंदी के अनुसार सारी व्यवस्थाएं हो चुकी थीं और दंपति अपने परिवार की खुशहाली की पूजा के लिए तैयार थे. आनंदी आई और उसने घर में सब तैयारी देखने के बाद पूजा की विधि शुरू की तो घर में मौजूद कुछ लोगों ने विधि को लेकर टोकना शुरू किया. आनंदी ने उनसे चुप रहने को कहा और प्रसाद खाने को दिया. प्रसाद खाते ही एक सदस्य को चक्कर आने लगे तो कुछ और को शक हुआ.

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आनंदी से सवाल जवाब के बीच घर के कुछ लोगों को शक हुआ तो किसी ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस को बुलाए जाने के दौरान आनंदी ने पूजा में रखे गहने चुराकर वहां से जाने की कोशिश की, लेकिन वह पकड़ी गई और फिर पुलिस के हवाले कर दी गई. बेंगलुरू पुलिस ने उससे सवाल जवाब करना शुरू किया तो पता चला कि इस महिला का असली नाम केडी केमपम्मा था. इस महिला ने बड़ी चतुराई से जवाब दिए लेकिन साल 2001 में चोरी की कोशिश के इल्ज़ाम में इसे छह महीने की कैद की सज़ा हो गई.
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पहली बार जेल नहीं आई थी केमपम्मा. दूसरी बात यह कि जेल में आकर केमपम्मा को एक तसल्ली और मन ही मन खुशी थी कि उसे कम जेल हुई है और उस गुनाह का तो अब तक किसी को पता ही नहीं है जो वह दो साल पहले कर चुकी है. जेल में रहते हुए केमपम्मा खाली वक्त में अपनी पिछली ज़िंदगी के बारे में सोचा करती तो उसे सब याद आता. एक कहानी की तरह उसकी पूरी ज़िंदगी उसकी यादों में घूमती रहती. वह कहानी कुछ इस तरह थी.

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सालों पहले उसकी शादी देवराज नाम के एक दर्ज़ी के साथ हो गई थी. देवराज अपने काम से उतने ही पैसे कमा पाता था जितने में ज़रूरतें जैसे—तैसे पूरी हो सकती थीं, हसरतें तो दूर की बात थी. और केमपम्मा की हसरतें बहुत थीं. उसे खूब सारे गहने, पैसे, बड़ा घर और एक आलीशान ज़िंदगी चाहिए थी. वह देवराज के बच्चों की मां बनती रही लेकिन उसकी हसरतें उसके दिल में मचलती रहीं. देवराज को किसी तरह राज़ी कर उसने कमाने के लिए खुद भी कुछ काम करने शुरू किए थे.

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पहले पहल वह घरों में काम करती थी. फिर उसने चिट फंड का धंधा शुरू किया था. धंधा अच्छा चल रहा था लेकिन उसी वक्त केमपम्मा का लालच बीच में आ गया और उसने चिट फंड में निवेश करने वालों का पैसा हड़पना शुरू किया. इस बात को लेकर देवराज के साथ अक्सर उसका झगड़ा होता लेकिन केमपम्मा कह देती कि जो होगा, वह निपट लेगी. होता क्या, केमपम्मा की धोखाधड़ी ज़्यादा चली नहीं और एक दिन पुलिस उसे पकड़कर ले गई. उसे जेल हो गई.

जब केमपम्मा 1998 में जेल से छूटकर आई तो उसके पति और बच्चों के मन में उसके लिए कोई जगह नहीं रह गई थी. उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया. कुछ देर को केमपम्मा दुखी हुई लेकिन फिर उसने सोचा कि अब उसके पास मौका है कि वह अपनी ख्वाहिशों की ज़िंदगी खुद हासिल कर ले. उसने कुछ छोटे मोटे काम किए जैसे घरों में साफ सफाई या रसोई का काम या कुछ दुकानों पर इसी तरह का काम. फिर उसे एक ज्वैलरी स्टोर पर काम मिला.


यहां चमचमाते गहनों और सोने—चांदी की चीज़ों के बीच उसका मन रम गया. वह यहां रईस घरों की औरतों को आते देखती और उन्हें देखकर अपनी किस्मत को कोसती. लेकिन उन औरतों की बातें बड़े ध्यान से सुनती थी. केमपम्मा सोने—चांदी के कारीगरों के साथ भी खूब बातें करती थी और इस काम के बारे में जानने की कोशिश करती थी. यहां उसे बहुत सी बातें पता चली थीं जैसे सोने के काम में किन कैमिकल्स का इस्तेमाल होता है और इनका असर क्या होता है. रईस घरों की औरतों की बातों से उसे उनकी सोच का अंदाज़ा भी हुआ.

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मन ही मन केमपम्मा एक पूरी कहानी और अपनी आने वाली ज़िंदगी को अपनी ख्वाहिशों के सांचे में ढाल रही थी. उसे साल भर से ज़्यादा हो चुका था अपना घर छोड़कर इधर—उधर काम करते हुए. अब वह अपनी ज़िंदगी में एक ज़बरदस्त मोड़ के बारे में सोच रही थी जिससे उसके सारे सपने पूरे हो सकें. वह नियमित रूप से मंदिर जाया करती थी. एक दिन मंदिर में एक शादीशुदा औरत ममता से उसकी मुलाकात हुई.

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ममता ने बातों—बातों में बताया कि उसे संतान नहीं हो रही है इसलिए वह एक पंडित द्वारा बताए गए उपाय के मुताबिक रोज़ इस मंदिर में आकर पूजा—पाठ करती है. केमपम्मा कई दिनों तक ममता से मिलती रही और उसकी बातें सुनती रही. एक दिन ममता ने कहा कि लंबे समय से यह करने के बावजूद उसे कोई फायदा होता नज़र नहीं आ रहा. ममता दुखी थी और केमपम्मा ने उसे दिलासा देते हुए कहा -

अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं. मैं एक ऐसी विशेष पूजा के बारे में जानती हूं जिससे तुम्हें बच्चा हो सकता है. मैं पहले एक पुजारी के घर काम करती थी और उन्हीं से मैंने इस मंडल पूजा का विधि विधान सीखा था. मैं तुम्हारे काम आ सकती हूं लेकिन पूजा है बड़ी कठिन इसलिए तुम्हें कुछ नियमों का पालन करना पड़ेगा.


जैसे बीमार को दवा मिल गई थी, ममता के लिए केमपम्मा की यह बात जैसे दर्द का मरहम बन गई थी. वह हर बात के लिए खुशी खुशी राज़ी हो गई और जल्द उसने इस पूजा के लिए मिन्नत की. तब केमपम्मा ने मुहूर्त देखकर तारीख तय की. और फिर ममता को नियम बताए. पहला, इस बारे में तुम किसी को नहीं बताओगी. अपने पति को भी नहीं. अगर इस पूजा के बारे में किसी को पता चल जाए तो फल नहीं मिलता.

दूसरा नियम यह है कि इस पूजा का फल केवल शादीशुदा औरतों को मिलता है इसलिए भगवान को खुश करने के लिए खूब सारे सुंदर और कीमती कपड़े और ज़ेवर पहनकर आना है. बिल्कुल दुल्हन की तरह, तभी गोद हरी भरी होगी. और तीसरा नियम यह है कि पूजा की सामग्री और प्रसाद तुम्हीं बनाकर लाओगी जिसके बारे में किसी को पता नहीं होना चाहिए. मन से यह पूजा करोगी तो ठीक नौ महीने में तुम्हें बच्चा हो जाएगा.

ममता यह सब सुनकर हर बात मानने के लिए राज़ी हो गई. उसने जगह पूछी तो केमपम्मा ने कहा कि वह पहले इसी मंदिर में आए फिर इसी मंदिर के पास एक जगह वह उसे लेकर जाएगी जहां यह गुप्त पूजा होगी. और वहां उन दोनों के अलावा कोई और नहीं होगा. ममता तय तारीख यानी 19 अक्टूबर 1999 को होसकोट के उस मंदिर में पहुंची. वहां से कुछ दूर एक सुनसान जगह पर केमपम्मा उसे ले गई. यहां दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था और पहले से यहां पूजा की कुछ तैयारी थी.

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पूजा शुरू हुई और कुछ मंत्रोच्चार के बाद केमपम्मा ने ममता से आंखें बंद कर भगवान का ध्यान करने के लिए कहा. बीच—बीच में केमपम्मा उसे गंगाजल जैसा कुछ पीने के लिए दे रही थी. फिर केमपम्मा ने ममता से कहा कि अब वह उसे अपने हाथों से प्रसाद खिलाएगी. केमपम्मा उठी और उसने ममता के बाल पकड़कर उसकी गर्दन उठाई और उसके मुंह में एक कैप्सूल प्रसाद के साथ मिलाकर खिलाया. ममता का सिर चकराने लगा तो केमपम्मा ने उसे काबू किया और तीन से चार मिनट के अंदर ममता मर चुकी थी.

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केमपम्मा ने एक—एक कर ममता के सारे गहने उतारे, उसके बटुए से सारे पैसे निकाले और उसकी सारी कीमती चीज़ें अपने बैग में रखीं. केमपम्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था. वह खुद को किसी महारानी से कम नहीं समझ रही थी. ममता की मौत उसकी ज़िंदगी में वो खुशी लाई थी जिसकी उसे बरसों से चाह थी. फिर दो पल आसपास देखा और केमपम्मा वहां से गायब हो गई.

चैन से जीने का इंतज़ाम हो चुका था. अपनी पसंद के गहने बचाकर केमपम्मा ने कुछ गहने बेचकर अच्छी खासी रकम जुटा ली थी जो सारी सुविधाओं के साथ जीने के लिए काफी थी. ममता के कत्ल के बाद केमपम्मा ने सोचा कि गहने लूटने से ही काम बन सकता है और अब उसका आत्मविश्वास बढ़ चुका था. मंदिर जाती और कुछ औरतों के साथ घुलने मिलने की कोशिश करती फिर उनका शिकार करती और गहने लूट लेती.

ऐसे ही एक परिवार में पूजा के बहाने वह गहने लूटने की फिराक में थी लेकिन तभी पुलिस ने आकर उसे धर लिया. छह महीने बाद वह जेल से छूटी और उसने कुछ समय के लिए गुमनाम रहना तय किया. वह नहीं चाहती थी कि पुलिस को उस पर किसी किस्म का कोई शक हो. उसके पास इतनी दौलत थी कि वह अगला कुछ समय आराम से गुज़ार सके. कभी कोई मौका मिला तो केमपम्मा ने छोड़ा नहीं और चोरी व लूट कर ही डाली लेकिन उसने छुपकर रहने का सिलसिला बनाए रखा.

अब साल था 2007 और केमपम्मा की जमा पूंजी खत्म होने की कगार पर थी. किसी को 8 साल बाद भी कुछ नहीं पता था कि ममता का मर्डर किसने किया. केमपम्मा को यकीन था कि 8 साल पहले वाली उसकी तरकीब बेहद कारगर थी. इस साल उसने वही तरकीब अपनाकर कुछ और शिकार करने का मन बना लिया था. शहर के मंदिरों में उसने जाना शुरू किया और अपनी शातिर नज़र से अपने शिकारों की शिनाख्त शुरू की.


शहर में ऐसी संपन्न औरतों की कमी नहीं थी जो बच्चे न होने पर, बीमार होने पर या घर के किसी सदस्य से जुड़ी समस्या के हल के लिए मंदिरों और पूजाओं में कोई रास्ता खोजा करती थीं. यही औरतें केमपम्मा का शिकार थीं. उसने कुछ औरतों के साथ बातचीत और घुलना मिलना शुरू किया. दो हफ्ते से ज़्यादा नहीं लगते थे केमपम्मा को यह तय करने में कि वह औरत उसका सही शिकार है या नहीं यानी उसे अच्छा माल मिलेगा या नहीं.

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पुलिस गिरफ्त में सायनाइड मल्लिका. फाइल फोटो.


अब केमपम्मा ने इन औरतों के साथ वैसी ही पूजा करने की बात की और सबको कुछ कुछ दिनों के गैप से तारीखें देती गई. अलग-अलग मंदिरों के पास सुनसान जगहों पर या किसी को किसी सराय के एक एकांत वाले कमरे में बुलाकर पूजा रखी. अक्टूबर 2007 से दिसंबर 2007 के बीच करीब दो—ढाई महीनों में केमपम्मा ने आधा दर्जन औरतों को पूजा के दौरान वैसा ही कैप्सूल खिलाकर मौत के घाट उतारा और उनके ज़ेवरात व रुपये पैसे लेकर चंपत हो गई.

आखिरकार गिरफ्त में आई सीरियल किलर
साल 2007 में दो महीनों में एक के बाद एक औरत की लाश मिलने से जब सनसनी फैली तो पुलिस ने तफ्तीश शुरू की और अपने नेटवर्क से खबरें निकालने को कहा. सारी लाशें किसी न किसी मंदिर के पास पाई गई थीं और उनके गहने व कीमती चीज़ें लूटी गई थीं. लंबे समय तक चली तहकीकात के बाद पुलिस ने जब शक के आधार पर एक औरत को बैंगलोर के एक बस अड्डे से केमपम्मा को गिरफ्तार किया तो उसके पास काफी गहने बरामद हुए.

पूछताछ के बाद केमपम्मा ने कत्ल करना कबूल कर लिया. इसके बाद पूरे देश में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई क्योंकि केमपम्मा देश की पहली महिला सीरियल किलर के तौर पर पहचानी गई. इसे सायनाइड मल्लिका के नाम से जाना जाने लगा और कम से कम 7 औरतों के कत्ल का इल्ज़ाम इस पर लगा.

सिर्फ अपने लालच के लिए आधा दर्जन से ज़्यादा औरतों को मारने वाली सायनाइड मल्लिका कुछ समय पहले तब चर्चा में आई थी जब तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के मौत के मामले में शशिकला को जेल हुई थी और शशिकला जेल के उस बैरक में थी जिसके लगे बैरक में सायनाइड मल्लिका कैद में थी.

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First published: July 14, 2018, 7:57 AM IST
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