कविता : नागराज मंजुले - धूप की साज़िश के खिलाफ़

मराठी फिल्‍म 'सैराट'की सफलता से लोकप्रिय हुए निर्देशक नागराज मंजुले बेहद संवेदनशील कवि भी हैं। प्रस्‍तुत है मराठी से अनुदित उनकी कुछ कविताएं..!

टीकम शेखावत | News18India.com
Updated: June 22, 2016, 6:10 PM IST
कविता : नागराज मंजुले - धूप की साज़िश के खिलाफ़
मराठी फिल्‍म 'सैराट'की सफलता से लोकप्रिय हुए निर्देशक नागराज मंजुले बेहद संवेदनशील कवि भी हैं। प्रस्‍तुत है मराठी से अनुदित उनकी कुछ कविताएं..!
टीकम शेखावत
टीकम शेखावत | News18India.com
Updated: June 22, 2016, 6:10 PM IST

मराठी फिल्‍म निर्देशक नागराज मंजुले इन दिनों अपनी नई फिल्‍म 'सैराट' की सफलता से देश और दुनिया में चर्चा में बने हुए हैं। फिल्‍म न केवल इस वर्ष का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीत चुकी है, बल्‍कि समीक्षात्‍मक दृष्‍टि से समाज के बुद्धिजीवी तबके और विशेष रूप से बॉलीवुड को आकर्षित कर रही है। कमाई के लिहाज से किसी भी क्षेत्रीय फिल्‍म का बॉक्‍स ऑफिस पर 100 करोड़ के आंकड़े  के करीब  पहुंचना उपलब्‍धि है। फिल्‍म 'सैराट' के अलावा निर्देशक नागराज मंजुले अपनी एक और राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीत चुकी फिल्‍म  'फैंड्री पर श्रेष्‍ठ निर्देशन का इंदिरा गांधी अवॉर्ड भी जीत चुके हैं। फिल्‍म निर्देशक होने के साथ-साथ नागराज एक पटकथा लेखक, और संवेदनशील कवि भी हैं। प्रस्‍तुत है उनकी कुछ कविताएं, जिन्‍हें टाइम्‍स ऑफ इंडिया पुणे के पत्रकार और कवि टीकम शेखावत ने मराठी से हिंदी के पाठकों के लिए अनुवाद किया है।


कविता : नागराज मंजुले/ अनुवाद : टीकम शेखावत
धूप की साज़िश के खिलाफ़

इस सनातन

बेवफ़ा धूप
से घबराकर
क्यों हो जाती हो तुम

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एक सुरक्षित खिड़की की
सुशोभित बोन्साई!
और
बेबसी से... मांगती हो छाया..!


इस अनैतिक संस्कृति में
नैतिक होने की हठ की खातिर......
क्यों दे रही हो
एक आकाशमयी
मनस्वी विस्तार को
पूर्ण विराम...!


तुम क्यों
खिल नहीं जाती
आवेश से
गुलमोहर की तरह.....
धूप की साज़िश के ख़िलाफ़.. !


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दोस्त


एक ही स्वभाव के
हम दो दोस्त


एक दूसरे के अजीज़
एक ही ध्येय
एक ही स्वप्न लेकर जीने वाले


कालांतर में
उसने आत्महत्या की
और मैंने कविता लिखी..!


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 मेरे हाथों में न होती लेखनी


 मेरे हाथो में न होती लेखनी


तो....


तो होती छीनी


सितार...बांसुरी


या फ़िर कूंची


मैं किसी भी ज़रिये


उलीच रहा होता


मन के भीतर का


लबालब कोलाहल..!


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‘क’ और ‘ख’


क.


इश्तिहार में देने के लिए


खो गये व्यक्ति की


घर पर


नहीं होती


एक भी ढंग की तस्वीर.


ख.


जिनकी


घर पर


एक भी


ढंग की तस्वीर नहीं होती


ऐसे ही लोग


अक्सर खो जाते हैं..!
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जनगणना के लिए


जनगणना के लिए


‘स्त्री / पुरुष’


ऐसे वर्गीकरण युक्त
कागज़ लेकर
हम
घूमते रहे गांव भर
और गांव के एक असामान्य से मोड़ पर
मिला चार हिजड़ों का
एक घर..!

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