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इस ‘शिकारी’ वायरस से खौफजदा हैं गिर के शेर, अब तक 37 ने जान गंवाई

फाइल फोटो क्रेडिट- डॉ. जल्पन रूपापरो.

फाइल फोटो क्रेडिट- डॉ. जल्पन रूपापरो.

कुत्तों और बिल्लियों में पाए जाने वाले कैनाइन डिस्टेंपर वायरस को गुजरात के गिर के जंगलों में पाए जाने वाले एशियाई शेरों की मौत की वजह माना जा रहा है

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गुजरात में आजकल जंगल का राजा शेर खतरे में है. जंगल के राजा की लगातार मौत हो रही है. खास बात ये है कि एक दहाड़ से जंगल को हिला देने वाले शेर कुत्ते-बिल्ली की मौत मर रहे हैं. इसी साल अकेले सितंबर में 24 तो 10 दिसंबर तक 37 एशियाई शेरों की मौत हो चुकी है.

चौंकाने वाली बात यह है कि जिस बीमारी से शेरों की मौत होना बताया जा रहा है वह आमतौर पर कुत्तों और बिल्लियों में पाई जाती है. संसद में एक सवाल के जवाब में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने शेरों की मौत के ये आंकड़े जारी किए हैं.

जानकारों की मानें तो गिर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी (ईस्ट डिवीजन), गुजरात के जंगलों में अचानक से एक के बाद एक कई शेरों की मौत हो गई. मौतों का ये सिलसिला सितंबर 2018 में शुरू हुआ. देखते ही देखते अकेले सितंबर में 24 एशियाई शेर मौत की नींद सो गए.

आनन-फानन में देश के नामी रिसर्च इंस्टीट्यूट आईवीआरआई (इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट) और उत्तर प्रदेश के इटावा लायन सफारी के अधिकारियों और डॉक्टरों को गुजरात बुलाया गया.

इटावा लायन सफारी से गए अधिकारी आर बी उत्तम ने बताया, “जांच के बाद सामने आया कि गिर के जंगलों में शेरों की मौत कैनाइन डिस्‍टेंपर वायरस के अटैक से हुई है. कुछ समय पहले इटावा लायन सफारी में भी इसी वायरस के चलते कुछ शेरों की मौत हुई थी. इस वायरस के अटैक से शेर के शरीर का पीछे का हिस्सा काम करना बंद कर देता है. पीछे वाले पैरों से शेर चल-फिर भी नहीं सकता. ऐसी हालत में शेर या तो घिसटता रहता है या फिर एक ही जगह पर पड़े-पड़े दम तोड़ देता है.”

विदेशी वैक्सीन से बच सकती है शेरों की जिंदगी
कैनाइन डिस्‍टेंपर नाम की इस बीमारी से शेरों को एंटी-कैनाइन डिस्‍टेंपर नाम की वैक्सीन से बचाया जा सकता है. लेकिन जिस शेर पर ये वायरस अटैक कर देता है उसका बचना बहुत मुश्किल होता है. उत्तम बताते हैं, “जू और सफारी में रहने वाले शेरों को तो वैक्सीन लगाई जा सकती है, लेकिन जंगल में एक-एक शेर को वैक्सीन लगाना बहुत मुश्किल काम है. दूसरी बात ये कि जो प्राकृतिक वातावरण में जंगल की जिंदगी जी रहा है उसे वैक्सीन के सहारे जिंदा नहीं रखा जा सकता है.”

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40 किमी दूरी तक सफर करता है ये वायरस
उत्तम ने बताया, “खासतौर पर कुत्ते और बिल्ली में ये वायरस पाया जाता है. जंगल के आसपास गांव होते है. गांव में कुत्ते और बिल्ली भी पाए जाते हैं. तो संभव है कि किसी कुत्ते या बिल्ली को ये बीमारी लगी होगी और वहां से ये वायरस सफर करते हुए जंगल में पहुंच गया होगा. या फिर किसी एक-दो शेर ने इस वायरस से पीड़ित कुत्ते या बिल्ली को खा लिया होगा.”

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