आपके जीवन में इन समस्‍याओं की वजह कहीं प्रदूषण तो नहीं! जानिए   

वायु प्रदूषण (Air Pollution) ने लोगों की पूरी लाइफस्‍टाइल ही बदल दी है. उनके रहने, खाने, पीने और पहनने का तरीका भी बदल दिया है.
वायु प्रदूषण (Air Pollution) ने लोगों की पूरी लाइफस्‍टाइल ही बदल दी है. उनके रहने, खाने, पीने और पहनने का तरीका भी बदल दिया है.

आज जितनी भी लाइफस्‍टाइल (Lifestyle) से जुड़ी बीमारियां हैं जैसे डायबिटीज टाइप टू, दिल संबंधी रोग (Heart Disease), किडनी, आर्थराइटिस, गर्भ धारण करने की क्षमता का घटते जाना, भ्रूण, मेंटल डिसऑर्डर (Mental Disorder), तनाव-डिप्रेशन (Stress-Depression), अपराधीकरण की मानसिकता का बढ़ना आदि के पीछे प्रदूषण (Pollution) ही एक बड़ा कारण है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 28, 2020, 4:51 PM IST
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नई दिल्‍ली. वायु प्रदूषण अपने खतरनाक स्‍तर पर पहुंचता जा रहा है. प्रदूषण लोगों के जीवन पर एक्‍यूट और क्रॉनिक दोनों ही प्रकार से असर डाल रहा है. अक्‍सर बिना जानकारी हुए ही या शुरुआत में खांसी, सांस लेने में परेशानी से शुरु होने वाली समस्‍या धीरे-धीरे फेफड़े और शरीर के अन्‍य अंगों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. इतना ही नहीं इससे न केवल लोगों की जीवनशैली बदल गई है बल्कि प्रदूषण ने मानव शरीर को बीमारियों का घर बना दिया है. ऐसे में रोजाना बीमारियों से जूझ रहे लोगों को संभलने की जरूरत है क्‍योंकि आपको होने वाली परेशानियों की वजह प्रदूषण हो सकता है.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के वायु प्रदूषण विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्‍याय बताते हैं कि प्रदूषण ने आज पूरे जनजीवन को सिर्फ प्रभावित ही नहीं किया बल्कि इसके भीषण दुष्‍परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं. आज जितनी भी लाइफस्‍टाइल से जुड़ी बीमारियां हैं जैसे डायबिटीज टाइप टू, दिल संबंधी रोग, किडनी, आर्थराइटिस, गर्भ धारण करने की क्षमता का घटते जाना, भ्रूण, मेंटल डिसऑर्डर, तनाव-डिप्रेशन, अपराधीकरण की मानसिकता का बढ़ना आदि के पीछे प्रदूषण ही एक बड़ा कारण है. प्रदूषित कण फेफड़ों में पहुंचकर शरीर की कोशिकाओं और फिर पूरे शरीर में पहुंच जाते हैं और मानव अंगों को डैमेज करने तक की क्षमता के साथ नुकसान पहुंचाते हैं.

प्रदूषित वायु में लगातार रहने से हमारा इम्‍यून सिस्‍टम बिना रुके लगातार काम करता है क्‍योंकि वह शरीर में प्रवेश करने वाले पार्टिकुलेट मैटर से लड़ने की कोशिश करता रहता है. इस वजह से हमारा शरीर तनाव में रहता है. यह तनाव आगे चलकर मेंटल डिसऑर्डर में तब्‍दील हो जाता है. जहां से स्‍ट्रोक जैसी बीमारियां जन्‍म लेती हैं. ऐसे में देखा जाए तो प्रदूषण बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है. गर्मियों में जहां ओजोन का मामला सामने आता है वहीं सर्दियों के मौसम में नाइट्रोजन ऑक्‍साइड, सल्‍फर डाई ऑक्‍साइड का बढ़ता स्‍तर, कार्बन डाई ऑक्‍साइड जैसी गैसें, पीएम 2.5 और पीएम10 प्रमुख समस्‍या बन गए हैं.



45 फीसदी बच्‍चों की सांस लेने की क्षमता हुई कमजोर
विवेक कहते हैं कि प्रदूषित शहरों में जो लोग रह रहे हैं उनके फेफड़े खासतौर पर प्रभावित हो रहे हैं. वहीं बच्‍चों की बात करें तो उनके लिए यह बहुत ही खतरनाक है. सेंट्रल पॉल्‍यूशन कंट्रोल बोर्ड ने एक सर्वे करवाया था. दिल्‍ली के 12 हजार स्‍कूली बच्‍चों पर हुए इस सर्वे में सामने आया था कि करीब 45 फीसदी बच्‍चों के फेफड़े उनकी सांस लेने और छोड़ने की क्षमता के हिसाब से कमजोर थे. प्रदूषण से बच्‍चों की फिजिकल एक्टिविटी पर असर पड़ रहा है. शारीरिक कमजोरी बढ़ रही है, उनकी ग्रोथ पर असर हो रहा है. इसके साथ ही बड़े होने पर उनमें रेस्पिरेटरी की समस्‍याएं होने की भी प्रबल संभावना होती है.

ज्‍यादातर पुलिसकर्मियों को हो रहीं रेस्पिरेटरी की परेशानियां

देशभर में पुलिसकर्मियों पर हुए अध्‍ययन में भी सामने आया है कि सड़कों पर काम करने वाले ज्‍यादातर पुलिसकर्मी अपने जीवन में रेस्पिरेटरी की समस्‍याओं से जूझ रहे हैं. इनमें अस्‍थमा, सांस संबंधी परेशानियां, लंग फंक्‍शन कमजोर होने जैसी समस्‍याएं पाई जा रही हैं. यही हाल कमोवेश टैक्‍सी ड्राइवर और हॉकर्स का है. लगातार सड़क पर रहने और वाहनों द्वारा पैदा होने वाले जहरीली गैसों और पार्टिकुलेट मैटर के प्रदूषण की चपेट में आने से ये लोग अक्‍सर बीमार रहते हैं. इनके फेफड़ों की स्थिति धूल भरे वातावरण में काम करने वाले मजदूर के फेफड़ों से भी ज्‍यादा खराब रहती है.

प्रदूषण से बढ़ रहा तनाव और घट रही लोगों की उम्र

विवेक कहते हैं कि पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर विदेशों में कई स्‍टडीज हुई हैं. वहीं डब्‍ल्‍यूएचओ भी लगातार इस पर रिसर्च और अध्‍ययन कर रहा है. जिनमें सामने आया है कि वायु प्रदूषण की जद में रहने वाले लोगों की उम्र लगातार घट रही है. दिल्‍ली-एनसीआर में 5-10 साल तक लोगों की उम्र कम हो रही है. रेस्पिरेटरी की समस्‍याओं के अलावा लोगों की किडनी, लीवर, हर्ट और फेफड़े में प्रदूषण की वजह से खराबी की समस्‍याएं आ रही हैं. इसके साथ ही इनमें तनाव की समस्‍या बढ़ती जा रही है. जिससे मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ने से जनजीवन प्रभावित हो रहा है. सोचने-समझने की क्षमता भी खत्‍म होती जा रही है.
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