लाइव टीवी

छलनी हो गया दिल्ली का सुरक्षा 'कवच', खत्म हो रहे जंगल, कैसे कम होगा प्रदूषण?
Delhi-Ncr News in Hindi

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 15, 2019, 2:34 PM IST
छलनी हो गया दिल्ली का सुरक्षा 'कवच', खत्म हो रहे जंगल, कैसे कम होगा प्रदूषण?
पेड़ों के कटने से अरावली की हरियाली खत्म हो रही है (Photo-जयंत वर्मा)

दिल्ली के लिए सुरक्षा 'कवच' का काम करने वाली अरावली (Aravali) के जंगल को हम सबकी लालच निगल गई है. इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में अब नाम मात्र का ही फॉरेस्ट कवर बचा है. दिल्ली की बात करें तो मात्र 11.88 फीसदी ही फॉरेस्ट कवर बचा हुआ है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 15, 2019, 2:34 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली (Delhi) का वायु प्रदूषण (Air Pollution) साल भर कभी सामान्य नहीं रहता. अब पराली (Stubble) जलाने से यहां की हवा और जहरीली हो गई है. पर्यावरण वैज्ञानिक बता रहे हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह हम खुद हैं. पिछले एक दशक में हुए अंधाधुंध निर्माण ने दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के लिए फिल्टर का काम करने वाली अरावली (Aravali) को तहस-नहस कर दिया है. जब हमने फेफड़े (Lungs) को ही खत्म कर दिया तो फिर प्रदूषण कैसे रुकेगा? सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की रोक के बावजूद सरकारी संरक्षण में यहां इमारतें खड़ी होती रहीं. कंस्ट्रक्शन बढ़ता रहा, गाड़ियां बढ़ती रहीं जबकि फॉरेस्ट कवर (Forest cover) कम होता रहा. ऐसे में क्या हमें साफ हवा मिलेगी?

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (World Wildlife Fund) के लाइफ टाइम मेंबर एन. शिवकुमार कहते हैं कि साल 1952 में बनी फॉरेस्ट पॉलिसी के मुताबिक 33 फीसदी फॉरेस्ट कवर का प्रावधान किया गया था. ताकि लोगों को अच्छी हवा मिले. पर्यावरण संतुलन बना रहे. तब न इतनी गाड़ियां थीं और न इतना कंस्ट्रक्शन. 21वीं सदी की शुरुआत से अब तक अंधाधुंध निर्माण और वाहनों की भीड़ में फॉरेस्ट कवर बढ़ने की बजाय और कम होता गया.

शिवकुमार के मुताबिक फॉरेस्ट कवर में सभी बड़े पेड़ गिने जाते हैं. जैसे दिल्ली का नोटिफाइड वन क्षेत्र और लुटियन जोन के पेड़ सब मिलाकर फॉरेस्ट कवर माना जाएगा.

air quality index, एयर क्वालिटी इंडेक्स, Air Pollution in Delhi, दिल्ली में वायु प्रदूषण, stubble burning, Aravali forest, अरावली के वन, Forest cover, फॉरेस्ट कवर, पराली, Stubble, एनसीआर, NCR, फेफड़े, Lungs, सुप्रीम कोर्ट, Supreme Court
फॉरेस्ट कवर बढ़ने की जगह कम हो गया




दिल्ली-एनसीआर में फॉरेस्ट कवर

इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में नाम मात्र का ही फॉरेस्ट कवर बचा है. गाजियाबाद में यह 33 की जगह सिर्फ 1.89 फीसदी है. गौतमबुद्ध नगर में 2.43, फरीदाबाद में 4.32, गुरुग्राम (गुड़गांव) में 8.35 और दिल्ली में 11.88 फीसदी ही फॉरेस्ट कवर बचा हुआ है. हमने खुद ही उस डाल को काट डाला है जिस पर बैठे हुए हैं.

फेफड़े का काम करती है अरावली

पर्यावरणविद एन. शिवकुमार कहते हैं कि अरावली पर्वत श्रृंखला (Aravalli Mountain Range) दिल्ली के लिए फिल्टर या फेफड़े की तरह काम करती है. जब हम इसे ही छलनी करेंगे तो हमारे हिस्से में जहरीली हवा ही आएगी. विकास के नाम पर पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं, लेकिन उसके बदले क्या कोई नया वन लगा रहा है. अगर अरावली को इसी तरह तहस-नहस किया जाता रहा तो आने वाले वर्षों में दिल्ली के हालात और खराब हो सकते हैं.

33 फीसदी वन क्षेत्र होता तो नहीं होते ऐसे हालात

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सदस्य कुमार कहते हैं कि दिल्‍ली के इस फेफड़े को बचाने के लिए इसमें 'एरियल सीडिंग' (हेलीकॉप्‍टर से बीज बोना) करनी चाहिए ताकि नए पेड़-पौधे तैयार हों. ऐसा होगा तभी हम ऐसे प्रदूषण से बच सकते हैं. अगर दिल्ली, गाजियाबाद, रेवाड़ी, अलवर, महेंद्रगढ़ और गुरुग्राम और मेवात में 33 फीसदी वन क्षेत्र होता तो प्रदूषण का असर दिल्‍ली पर इतना नहीं होता, जितना कि अब दिख रहा है.

अरावली को किसने खोखला किया

'सेव अरावली' के संस्थापक जितेंद्र भड़ाना कहते हैं अरावली को बचाने के लिए हर रविवार 'सेव अरावली' यात्रा निकालते हैं. वो कहते हैं, 'अरावली को खोखला करने के काम में हर पार्टी के नेता, ब्यूरोक्रेट, कुछ बाबा और बिल्डर शामिल हैं.'

भड़ाना कहते हैं, 'सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद अवैध खनन जारी है. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है. जंगल पर कब्जे के लिए इसके अंदर रहने वाले जीवों को मारा जा रहा है. पहाड़ तोड़े जा रहे हैं, जंगल काटे जा रहे हैं. ऐसे में जब प्रदूषण की मार पड़ रही है तो हमें हाय-तौबा मचाने का हक नहीं है.'

air quality index, एयर क्वालिटी इंडेक्स, Air Pollution in Delhi, दिल्ली में वायु प्रदूषण, stubble burning, Aravali forest, अरावली के वन, Forest cover, फॉरेस्ट कवर, पराली, Stubble, एनसीआर, NCR, फेफड़े, Lungs, सुप्रीम कोर्ट, Supreme Court
दिल्ली के लिए फेफड़े का काम करती है अरावली


...वरना और बुरे होते हालात

- हरियाणा सरकार ने एनसीआर प्लानिंग बोर्ड में फरीदाबाद क्षेत्र की 17,000 एकड़ भूमि को 'वन भूमि' के दायरे से बाहर निकालने का प्रस्ताव दे दिया था. जिसे बोर्ड ने दिसंबर 2017 के पहले सप्ताह में रद्द कर दिया. साथ ही कहा कि अरावली का दायरा हरियाणा के गुरुग्राम और राजस्थान के अलवर तक ही सीमित नहीं होगा. इसका दायरा पूरे एनसीआर में माना जाएगा. अरावली वन भूमि का सीमांकन बोर्ड के फैसले और पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक होगा. बोर्ड के इस निर्णय से अरावली और छलनी होने से बच गई. वरना इस जमीन पर और हाईराइज बिल्‍डिंगें तैयार होतीं.

>> अरावली के रेवेन्यू लैंड को हरियाणा सरकार ने वन क्षेत्र मानने से एक बार इनकार कर दिया था. पर्यावरणविदों ने आवाज उठाई तो फैसला वापस लेना पड़ा. अगर सरकार की चलती तो पूरे अरावली में बिल्‍डिंगें खड़ी हो जातीं.

>> फरीदाबाद नगर निगम ने डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) को अरावली में 407 एकड़ जमीन बेच दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की एंपावरमेंट कमेटी और पर्यावरण मंत्रालय ने निर्माण की कसेंट नहीं दी. वरना इसमें बड़ा निर्माण खड़ा होता.

>> मांगर (फरीदाबाद-गुरुग्राम के बीच) के आसपास 23 गांवों की 10,426 हेक्टेयर जमीन पर हुड्डा सरकार ने मांगर डेवलपमेंट प्लान-2031 बनाया था, लेकिन वन क्षेत्र को बचाने के लिए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने इसकी मंजूरी देने से मना किया.

>> हरियाणा सरकार ने मांगर क्षेत्र में एक डच कंपनी को 500 एकड़ भूमि पर यूरोपियन टेक्नॉलोजी पार्क बनाने की मंजूरी दे दी थी. इस पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने रोक लगाई.

ये भी पढ़ें:

दिल्ली को गैस चैंबर बनने से बचाना है तो करें ये 10 काम

पराली जलाने पर क्यों मजबूर हैं किसान? 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए दिल्ली-एनसीआर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: October 15, 2019, 1:19 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर