अगले पांच साल बाद दिल्‍ली में बढ़ जाएंगे बीमार!

प्रदूषण बढ़ने से आने वाले समय में दिल, फेफड़े, लिवर, ब्लैोडर, हड्डियों, त्वदचा की बीमारियां बढ़ने के साथ ही डायबिटीज टाइप टू, दिल संबंधी रोग, किडनी, आर्थराइटिस, गर्भ धारण करने की क्षमता का घटते जाना, भ्रूण, मेंटल डिसऑर्डर, तनाव-डिप्रेशन, अपराधीकरण की मानसिकता आदि तेजी से बढ़ेगी. दिल्लीय में बीमारों की संख्या बढ़ेगी.
प्रदूषण बढ़ने से आने वाले समय में दिल, फेफड़े, लिवर, ब्लैोडर, हड्डियों, त्वदचा की बीमारियां बढ़ने के साथ ही डायबिटीज टाइप टू, दिल संबंधी रोग, किडनी, आर्थराइटिस, गर्भ धारण करने की क्षमता का घटते जाना, भ्रूण, मेंटल डिसऑर्डर, तनाव-डिप्रेशन, अपराधीकरण की मानसिकता आदि तेजी से बढ़ेगी. दिल्लीय में बीमारों की संख्या बढ़ेगी.

दिल्‍ली (Delhi) में कुल आबादी का 55 प्रतिशत हिस्‍सा सड़क के 300 से 400 मीटर के दायरे में रहता है. ऐसे में वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण (Pollution) के सीधे प्रभाव में वही आते हैं. जिसका प्रभाव यह होता है कि वे इस प्रदूषण को सीधे सांस के माध्‍यम से खींचते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्‍ली में बीमारों की संख्या बढ़ेगी. गर्भावस्‍था पर पड़ने वाले प्रभाव के चलते जन्‍म दर पर भी असर पड़ेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 29, 2020, 5:37 PM IST
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नई दिल्‍ली. दिल्‍ली-एनसीआर में प्रदूषण खतरनाक स्‍तर पर पहुंच चुका है. स्‍मॉग की शुरुआत के साथ ही यहां की हवा में घुला जहर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने के साथ ही तमाम बीमारियों को जन्‍म दे रहा है. इतना ही नहीं कोरोना महामारी के दौरान यह प्रदूषण और भी ज्‍यादा जानलेवा साबित हो रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण का स्‍तर लगातार बढ़ने के साथ ही इसे रोकने के लिए केंद्र और राज्‍य सरकारों के प्रयास भी नाकाफी साबित हो रहे हैं. ऐसे में अगर यही हाल रहा तो अगले पांच साल बाद दिल्‍ली में लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के वायु प्रदूषण विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्‍याय का कहना है कि 2006 के बाद से दिल्‍ली-एनसीआर में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है. इस महीने में सेंट्रल पॉल्‍यूशन कंट्रोल बोर्ड का एयर कवालिटी इंडेक्‍स देखें तो दिल्‍ली की हवा लगातार बहुत खराब या खराब स्थिति में बनी हुई है. सीपीसीबी की टीमों का दिल्‍ली-एनसीआर में उतरना, दिल्‍ली सरकार का रेड लाइट ऑन व्‍हीकल ऑफ करना और केंद्र सरकार का टार्गेट नाकाफी हैं.

जबकि सीपीसीबी की ओर से वायु प्रदूषण पर काम कर रहे अधिकारी का कहना है कि केंद्रीय मंत्रालय और सीपीसीबी की टीमें दिल्‍ली एनसीआर में एयर क्‍वालिटी को मॉनिटर कर रही हैं. इतना ही नहीं वायु प्रदूषण को कम करने और नियंत्रित करने के लिए योजनाएं भी तैयार की जा रही है. हाल ही में सीपीसीबी की ओर से मेम्‍बर सेक्रेटरी की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया था कि दिल्‍ली एनसीआर में 2019 में अच्‍छा संकेत है.



हालांकि विवेक कहते हैं कि वायु प्रदूषण से बढ़ती मौतें और इसके प्रभाव को देखते हुए इसे प्राथमिकता पर लाना जरूरी है. अगर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे. वे कहते हैं कि हर पॉलिसी का एक प्रभाव होता है. अब वाहनों में बीएस-6 ईधन लाया गया है. यह नई गाड़ि‍यों में निश्चित रूप से प्रदूषण कम करेगा लेकिन पुरानी गाड़ि‍यों का क्‍या होगा, पुरानी जो भी गाड़ि‍यां सड़क पर दौडेंगी वे तो प्रदूषण बढ़ाएंगी. उन्‍हें नियंत्रित करने के लिए भी अभी तक कोई योजना तैयार नहीं की गई है.
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जब सीएनजी आई थी तो 199८ से 2006 तक प्रदूषण का स्‍तर कम हुआ था लेकिन उसके बाद फिर प्रदूषण बढ़ने लगा था. इसकी वजह थीं दिल्‍ली–एनसीआर में कंस्‍ट्रक्‍शन का तेजी से बढ़ना. यहां वाहनों की संख्‍या बढ़ना. फैक्‍ट्री और प्‍लांट्स का बढ़ना. ऐसे में सरकारें इस ग्रोथ को कैसे नियंत्रित करेंगी. ये भी एक बड़ा सवाल है.

सड़क से 400 मीटर तक रहने वालों में बढ़ेंगी बीमारियां

विवेक कहते हैं कि दिल्‍ली में कुल आबादी का 55 प्रतिशत हिस्‍सा सड़क के 300 से 400 मीटर के दायरे में रहता है. ऐसे में वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के सीधे प्रभाव में वही आते हैं. जिसका प्रभाव यह होता है कि वे इस प्रदूषण को सीधे सांस के माध्‍यम से खींचते हैं. इस वजह से उनमें रेस्पिरेटरी की समस्‍याएं सबसे ज्‍यादा सामने आती हैं. वहीं डब्‍ल्‍यूएचओ मानता है कि भारत में 100 फीसदी आबादी जिन इलाकों में रहती है वहां पीएम 2.5 का स्‍तर डब्‍ल्‍यूएचओ की गाइडलाइंस को पूरा नहीं करता है.

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ये रोग बढ़ाएंगे परेशानी 

विवेक बताते हैं कि प्रदूषण बढ़ने से आने वाले समय में दिल, फेफड़े, लिवर, ब्‍लैडर, हड्डियों, त्‍वचा की बीमारियां बढ़ने के साथ ही डायबिटीज टाइप टू, दिल संबंधी रोग, किडनी, आर्थराइटिस, गर्भ धारण करने की क्षमता का घटते जाना, भ्रूण, मेंटल डिसऑर्डर, तनाव-डिप्रेशन, अपराधीकरण की मानसिकता आदि तेजी से बढ़ेगी. दिल्‍ली में बीमारों की संख्या बढ़ेगी. गर्भावस्‍था पर पड़ने वाले प्रभाव के चलते जन्‍म दर पर भी असर पड़ेगा.

वे कहते हैं कि पिछले साल ही द फॉरम ऑफ इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसायटीज के वैज्ञानिकों की ओर से द जर्नल चेस्‍ट में दो रिव्‍यू पेपर्स प्रकाशित किए गए थे. जिनमें वायु प्रदूषण से शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बहुत बारीकी से बताया गया था. पेपर्स में कहा गया था कि वायु प्रदूषण हमारे शरीर के हर एक अंग को प्रभावित करता है. यहां तक कि यह मानव शरीर की सभी सेल्‍स को नुकसान पहुंचाता है. रिसर्च बताता है कि जहरीली हवा शरीर के अंदर पहुंचकर सर से लेकर पैर के अंगूठे तक, दिल, फेफड़े, लिवर, ब्‍लैडर, हड्डियों, त्‍वचा डैमेज तक कर सकती है. ऐसे में प्रदूषण की बढ़ती गति चिंता का विषय है.

सरकार का कमजोर टार्गेट बढ़ाएगा मुश्किल

चट्टोपाध्‍याय कहते हैं कि दिल्‍ली में पीएम 2.5 के स्‍तर को 70 फीसदी तक कम करने की जरूरत है. जबकि केंद्र सरकार ने इसका टार्गेट 25-30 फीसदी रखा है. जो बहुत ही कमजोर लक्ष्‍य है. टार्गेट बहुत मजबूत बनाना होगा. तभी दिल्‍ली को प्रदूषण से राहत मिल सकेगी. वरना इन प्रयासों से दिल्‍ली की हवा साफ नहीं हो पाएगी और यहां का जनजीवन प्रभावित होगा.
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