अटल बिहारी वाजपेयी के इस कदम से बौखला गया था पाकिस्तान!
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अटल बिहारी वाजपेयी के इस कदम से बौखला गया था पाकिस्तान!
फाइल फोटो.

अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण के बाद कहा था ‘मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सदैव शांति का पुजारी था, है और रहेगा.’

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  • Last Updated: August 17, 2018, 12:29 PM IST
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अटल बिहारी वाजपेयी ने जापान के हिरोशिमा, नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम की त्रासदी पर 'हिरोशिमा की पीड़ा' नामक कविता लिखी थी. वह कविता इस तरह से है-

किसी रात को/मेरी नींद चानक उचट जाती है/आँख खुल जाती है/

मैं सोचने लगता हूँ कि/ जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का/ आविष्कार किया था/



वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण/नरसंहार के समाचार सुनकर/ रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही/ये अनुभूति नहीं हुई कि/ उनके हाथों जो कुछ हुआ/अच्छा नहीं हुआ!

इन लाइनों को लिखने वाले कवि और राजनेता वाजपेयी जब मई 1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद 21 फरवरी 1999 को पाकिस्तान यात्रा पर गए तो लाहौर में उनकी कविता की याद दिलाई गई. पाकिस्तान के लोगों ने बौखलाहट में सवाल किए. इस पर उन्होंने भारत के परमाणु परीक्षण पर पाकिस्तानियों को जवाब देकर उनके मुंह बंद करा दिए थे.

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वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अटल पर लिखी गई अपनी किताब 'हार नहीं मानूंगा' में लिखा है कि पाकिस्तान यात्रा के दौरान अपने नागरिक अभिनंदन में वाजपेयी ने इस कविता का जिक्र करते हुए अपना रुख साफ किया.

वाजपेयी ने कहा ‘जब पोखरण में एटमी विस्फोट करने का फैसला हुआ तो लोगों ने मुझे मेरी ही कविता की याद दिलाई थी. मैं हिराशिमा गया था, मैंने नागसाकी का दृश्य देखा था. वहां बम चलाया गया, उसकी जरूरत नहीं थी. वहां लड़ाई खत्म हो गई थी. मित्र देश जीत गए थे. वह आत्मरक्षा के लिए चलाया गया एटमी हथियार नहीं था. आज भी ले लोग भुगत रहे हैं.’

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अटल ने कहा ‘मेरी कविता का शीर्षक था हिरोशिमा की पीड़ा. एक शायर के दिल की पीड़ा थी. इसलिए जब एक गंभीर फैसला किया गया तब भी मेरा दिमाग साफ था और आज भी साफ है. हमें मिलकर एटमी वेपंस फ्री वर्ल्ड का निर्माण करना है. हम एटमी हथियारों को काम में लाएं इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन इसके लिए दोस्ती का माहौल चाहिए.’

वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण के बाद कहा था ‘मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सदैव शांति का पुजारी था, है और रहेगा.’

मेरी इक्यावन कविताएं में उन्होंने ‘जंग न होने देंगे’ शीर्षक से एक कविता लिखी है-

भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है/प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है।

तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा/रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है।

जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे, जंग न होने देंगे...।।

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अटल बिहारी वाजपेयी ने लालबहादुर शास्त्री की तरफ से दिए गए नारे ‘जय जवान जय किसान’ में अलग से ‘जय विज्ञान’ भी जोड़ा. देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था. इसीलिए उन्होंने दुनिया की परवाह किए बिना राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण (1998) किया.

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इस परीक्षण के बाद अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए. लेकिन उनकी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें ‘अटल’ बनाए रखा. पोखरण का परीक्षण वाजपेयी के सबसे बड़े फैसलों में से एक था.

कैसे करवाया परमाणु परीक्षण?
दरअसल, पाकिस्तान ने जब गौरी मिसाइल छोड़ी तो तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने वाजपेयी को परमाणु परीक्षण पर आगे बढ़ने की सलाह दी थी. ‘9 अप्रैल 1998 को वाजपेयी ने पूछा- कलाम साहब टेस्ट की तैयारी में आपको कितना वक्त लगेगा?,  उस वक्त कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार थे.’ इस पर कलाम ने कहा ‘यदि आप आज आदेश देते हैं तो हम 30वें दिन टेस्ट कर सकते हैं.’ इस पर वाजपेयी बोले ‘तो आप लोग विचार-विमर्श कर लीजिए और ब्रजेश मिश्र से संपर्क में रहकर टेस्ट की तारीख फाइनल कर लीजिए.’

इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिश्र के साथ वैज्ञानिकों की मीटिंग हुई. 10 मई को टेस्ट करने की बात हुई थी लेकिन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन 26 अप्रैल से 10 मई तक लैटिन अमेरिका की यात्रा पर थे. इसलिए 11 मई की तारीख तय हुई. परमाणु परीक्षण के बारे में वाजपेयी और ब्रजेश मिश्र के अलावा सिर्फ तीन वैज्ञानिकों को इसकी जानकारी थी. उन्होंने अपनी सरकार के मंत्रियों को भी इस बारे में कोई खबर नहीं होने दी. पीएम ने 9 मई को तीनों सेना प्रमुखों को अपने आवास पर बुलाकर इसके बारे में जानकारी दी. सिर्फ एक दिन पहले ही कुछ कैबिनेट मंत्रियों को इसकी जानकारी दी गई.

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कलाम के साथ वाजपेयी का एक दिलचस्प वाकया जुड़ा है. 18 मार्च 1998 को वाजपेयी जब दूसरी बार पीएम बने तो शपथ लेने से पहले उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम से उन्हें मंत्री बनाने के लिए मुलाकात की थी. लेकिन कलाम ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. फिर कलाम की अगुवाई में उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देशों की सूची में खड़ा कर दिया.

 
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