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क्‍या आयुर्वेद में है वेंटिलेटर और ऑक्‍सीजन आईसीयू का‍ विकल्‍प, बता रहे हैं विशेषज्ञ

क्‍या आयुर्वेद में है ऑक्‍सीजन या वेंटिलेटर की सुविधा. (सांकेतिक फोटो)

आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी: सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगहों पर ऐलोपैथी और आयुर्वेद को समर्थन देने वाले लोग अपने-अपने हिसाब से तरफदारी कर रहे हैं. वहीं यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि ऐलोपैथी में इस्‍तेमाल किए जा रहे वेंटिलेटर या ऑक्‍सीजन आईसीयू का विकल्‍प आयुर्वेद में है या नहीं.

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नई दिल्‍ली. भारत में कोरोना महामारी आने के साथ ही कई बहस भी साथ ले आई. कोरोना की दूसरी लहर के हाहाकार के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) बनाम बाबा रामदेव (Baba Ramdev) आपसी बयानबाजी के बाद ऐलोपैथी (Allopathy) बनाम आयुर्वेद (Ayurveda) को लेकर भी बहस छिड़ गई है. कोरोना की (Corona) पहली लहर में ही आयुर्वेद के देसी नुस्‍खे, काढ़ा, गरारा और आयुर्वेदिक दवाएं बाजार से आउट ऑफ स्‍टॉक हो गईं, वहीं दूसरी ओर ऐलोपैथी की अपनी इलाज पद्धति से निकली दवाओं की किल्‍लत ने भी लोगों के दम फुला दिए.

हालांकि इन सबके बीच सोशल मीडिया (Social Media) से लेकर तमाम जगहों पर ऐलोपैथी और आयुर्वेद को समर्थन देने वाले लोग अपने-अपने हिसाब से तरफदारी कर रहे हैं. जबकि विशेषज्ञ इस मामले में कुछ और ही मत रखते हैं. हाल ही में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देशभर में आई ऑक्‍सीजन, ऑक्‍सीजन आईसीयू बेड (Oxygen ICU) और वेंटिलेटर (Ventilator) की कमी से हुई मौतों ने कई सवाल खड़े किए.

ऐसे में यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि ऐलोपैथी में इस्‍तेमाल किए जा रहे वेंटिलेटर या ऑक्‍सीजन आईसीयू का विकल्‍प आयुर्वेद में है या नहीं. अगर शरीर में ऑक्‍सीजन (Oxygen) की कमी होती है तो क्‍या आयुर्वेद में कोई इलाज है कि मरीज को वेंटिलेटर न लगाना पड़े. इस संबंध में न्‍यूज 18 हिंदी ने कई आयुर्वेदिक विशेषज्ञों से बात की है.

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) वाराणसी के आयुर्वेद इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के शल्‍य तंत्र विभाग में प्रोफेसर डॉ. लक्ष्‍मण सिंह कहते हैं कि कोरोना महामारी के बाद हाइपोक्सिया के रूप में पैदा हो रही ऑक्‍सीजन की कमी के दौरान ऑक्‍सीजन आईसीयू या गंभीर मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही है. अगर आयुर्वेद में देखें तो एसपीओटू (SPo2) यानी ऑक्‍सीजन सेचुरेशन घटता है तो शरीर में ऑक्‍सीजन पहुंचाने का कोई विकल्‍प मौजूद नहीं है.

वहीं कई मामलों में मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है, जब‍ ऑक्‍सीजन को कृत्रिम यंत्रों के माध्‍यम से शरीर में पहुंचाया जाता है. जहां तक आयुर्वेद की बात है तो यह अलग चिकित्‍सा पद्धति है. यहां वेंटिलेटर का भी कोई विकल्‍प नहीं है. हालांकि आयुर्वेद शरीर में ऑक्‍सीजन स्‍तर को बेहतर करने के तरीके जरूर बता सकता है.

भारत में आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी की बहस चल रही है. shutterstock.com
भारत में आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी की बहस चल रही है. shutterstock.com


आयुर्वेदा गुरुग्राम में सीनियर कंसल्‍टेंट और आयुर्वेद में एमडी डॉ. सुनील आर्य कहते हैं कि आयुर्वेद और ऐलोपैथी में सबसे पहले अंतर जानना जरूरी है. आयुर्वेद इमरजेंसी के लिए नहीं है. यह सतत प्रकिया है जिसमें शरीर को इस तरह तैयार किया जाता है कि खतरनाक स्थिति पैदा न हो या फिर जिससे बचा जाए. जबकि ऐलोपैथी इमरजैंसी में काम आने वाली चिकित्‍सा पद्धति है.

डॉ. आर्य कहते हैं कि आयुर्वेद और ऐलोपैथी की तुलना करना गलत है. इन दोनों पैथियों की ही अपनी सीमाएं हैं. इन दोनों की ही विशेषताएं हैं. अब जैसे ऑक्‍सीजन या वेंटिलेटर की बात है तो वह आयुर्वेद में नहीं है लेकिन इसे ऐलोपैथी में कहना भी पूरी तरह सही नहीं है. बल्कि यह एक तकनीक है, जिसके माध्‍यम से ऑक्‍सीजन शरीर में पहुंचती है. इसके अलावा जिन बीमारियों का इलाज आयुर्वेद में है उनका इलाज ऐलोपैथी में नहीं है. कोरोना बीमारी के इलाज में भी यही स्थिति है.

डॉ. सुनील कहते हैं कि 92 तक भी अगर ऑक्‍सीजन लेवल जाता है तो चिंता की बात नहीं है लेकिन इसके बाद जाने वाले हैप्‍पी हाइपोक्सिया में अगर शरीर की भंगिमाएं बदली जाएं तो ऑक्‍सीजन स्‍तर बेहतर होता है. प्रोनिंग वही है. ऐलोपैथी की ही बात करें तो मॉडर्न साइंस के पास कोरोना के पहले सात दिन तक करने के लिए कुछ है नहीं. मसलन विटामिन, जिंक या पोषणयुक्‍त खाना ले लीजिए आदि. आठवें दिन के बाद रिएक्‍शन शुरू होता है और इमरजेंसी पैदा हो जाती है.

जबकि आयुर्वेद को देखें तो वह कोरोना में भी पहले ही दिन से काढ़ा या अन्‍य चीजों के उपयोग की सलाह देता है ताकि अधिकांश मामलों में इमरजेंसी या वेंटिलेटर की जरूरत ही न पड़े. ये सवाल बेमानी है कि ऐलोपैथी में क्रोसिन है तो आपके पास क्‍या है. इसलिए दोनों पैथी का अपना-अपना हिसाब है.