क्या दलित वोटों पर है सिर्फ़ मायावती का हक़, इस ताक़त के पीछे कौन

मायावती (File Photo)
मायावती (File Photo)

बसपा का ज्यादातर वोटर गरीब और दबा-कुचला वर्ग है. उसका सबसे अहम सरोकार सम्मान से जुड़ा होता है. इसे बचाने के लिए जो नेता खड़ा होता है उसे वह दिल से समर्थन करता है....

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 16, 2018, 12:32 PM IST
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वो कौन सी ताकत है जिससे मायावती की एक आवाज पर दलित गोलबंद हो जाते हैं. वो कौन सा जादू है कि बसपा का वोटर हर हाल में मायावती के साथ रहता है? गोरखपुर और फूलपुर में मायावती के समर्थन से भाजपा पर सपा की जीत के बाद हर किसी के मन में कुछ ऐसे सवाल ही घूम रहे हैं. क्या सिर्फ मायावती का ही दलित वोटों पर एकाधिकार है या फिर कोई और ऐसा नहीं है जिस पर दलित भरोसा कर पाएं. मायावती के सियासी तिलिस्म के अगले एपिसोड में क्या होने वाला है, इसका सबको इंतजार है.

'कैंब्रिज एनालिटिका' से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक अंबरीश त्‍यागी कहते हैं " मायावती का ज्यादातर वोटर गरीब और दबा-कुचला वर्ग है. इस वर्ग की यूनिटी अलग सी होती है. उसका सबसे अहम सरोकार सम्मान से जुड़ा होता है. इसे बचाने के लिए जो नेता खड़ा होता है उसे वह दिल से समर्थन करता है. मायावती चार बार मुख्यमंत्री रही हैं. जाहिर है उन्होंने अपने शासनकाल में दलितों के उत्कर्ष के लिए कुछ काम किए होंगे."

त्यागी के मुताबिक "दलितों के लिए अपने काम की वजह से ही मायावती इस दबे-कुचले वर्ग में राजनीतिक उत्कर्ष का भी प्रतीक हैं. इस समाज के लोगों को जो सपना मायावती के जरिए साकार होता दिखता है वह अन्य दलित नेताओं में नहीं मिलता. इसलिए यह समाज उन्हें कभी निराश नहीं करता. उनके एक इशारे पर खड़ा हो जाता है."



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गोरखपुर और फूलपुर में आज समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार जीता है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान बहुजन समाज पार्टी का माना जा रहा है. जीतने के कुछ ही घंटे बाद अखिलेश यादव मायावती के घर यूं ही नहीं गए. वह जानते हैं कि बसपा का वोटर मन से उनके उम्मीदवारों के साथ खड़ा था.

मायावती ने नवंबर 2017 में ही कहा था "बीजेपी व अन्य सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए बीएसपी गठबंधन के बिल्कुल खिलाफ नहीं है. लेकिन पार्टी गठबंधन तभी करेगी जब बंटवारे में सम्मानजनक सीटें मिलेंगीं." इस बार भी सपा को समर्थन देते हुए उन्होंने साफ इशारा किया कि वो गठबंधन करने के लिए तैयार हैं लेकिन अपनी शर्तों पर.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती अपने कोर वोट बैंक की वजह से ही अपनी शर्तों पर अड़ती हैं. बसपा ने कांग्रेस को न सिर्फ यूपी में झटका दिया है बल्कि उससे पहले कर्नाटक में भी उसके लिए परेशानी खड़ी की है. एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) से हाथ मिलाकर बता दिया है कि गठबंधन के लिए ज्यादा चिंता कांग्रेस और दूसरे दलों को करनी है. सूत्रों का कहना है कि बसपा राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करना चाहती है. जबकि कांग्रेस जिन राज्यों में मजबूत है वहां उसे शेयर नहीं देना चाहती और यूपी जैसे राज्य जहां पर वह कमजोर है वहां उसका साथ चाहती है.

लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने में अभी एक वर्ष है लेकिन अपने प्रदर्शन को लेकर चिंतित राजनीतिक दलों ने गोटियां सजानी शुरू कर दी हैं. सियासी मेल-मिलाप भी शुरू हो गया है. मायावती ने शायद महसूस कर लिया है कि उनके पास मौजूद दलित वोट बैंक की वजह से सपा, कांग्रेस या कोई और दल गठबंधन के लिए मजबूर होंगे.

दूसरी तरफ कांग्रेस और बसपा दोनों को अच्छी तरह पता है कि भाजपा की जीत में गैर जाटव दलितों का भी समर्थन रहा है. इसलिए बसपा यह कोशिश करने में जुटी हुई है कि 2019 में पूरा दलित समाज उसके साथ खड़ा हो.

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यूपी से बाहर बसपा का प्रदर्शन
आइए जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बना चुकी बसपा की सियासी हैसियत आखिर यूपी से बाहर कितनी है? दलित अस्मिता के नाम पर उभरी बसपा ने अपना पूरा ध्यान यूपी की राजनीति में लगाया है. लेकिन जिन प्रदेशों में दलित वोट ज्यादा हैं वहां पर अपने प्रत्याशी जरूर उतारते रही है. हमने चुनाव आयोग के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में उसे न सिर्फ वोट मिले हैं बल्कि उसने विधानसभा में सीट पक्की करने में भी कामयाबी पाई है. यूपी से बाहर बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1 से लेकर 11 विधायकों तक रहा है.

एमपी, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली में मजबूत
दिल्ली जैसे राज्य जहां 16.75 फीसदी दलित हैं, वहां बसपा ने 2008 में 14.05 फीसदी तक वोट हासिल किया था, जबकि उसके वरिष्ठ नेताओं ने यहां उत्तर प्रदेश जैसी मेहनत नहीं की थी. बाद में दलित वोट कभी कांग्रेस तो कभी आम आदमी पार्टी के पास शिफ्ट होता रहा. सबसे ज्यादा दलित आबादी वाले राज्य पंजाब में जब 1992 में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था तो उसे 9 सीटों के साथ 16.32 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी के संस्थापक कांशीराम पंजाब के ही रहने वाले थे. मध्य प्रदेश और राजस्थान में वह समीकरण बिगाड़ने की हैसियत रखती है.

हमने जिन राज्यों में बसपा को मिले वोटों का विश्लेषण किया उनमें दलित 15 से लेकर 32 फीसदी तक है. दलितों की पार्टी माने जाने वाली बसपा इन वोटों का स्वाभाविक हकदार बताती है. हालांकि, 2014 के आम चुनावों में मोदी लहर की वजह से पंजाब में भी उसे सिर्फ 1.91 फीसदी ही वोट मिले. जबकि पूरे देश में उसे 4.14 फीसदी वोट हासिल हुआ था. वैसे बसपा नेता इसे खराब प्रदर्शन नहीं मानते. गैर हिंदी भाषी राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी बसपा का कभी एक-एक विधायक हुआ करता था. विपक्ष को दलित वोटों की दरकार है, इसलिए बसपा उससे अपनी शर्तों पर ही समझौता कराना चाहती है.

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चुनौतियां भी कम नहीं
मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं "बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए. जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई. यही वजह है कि चंद्रशेखर और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं का उभार हो रहा है जो मायावती की सियासी जमीन खा सकते हैं. हालांकि ये इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में कितने सफल होंगे यह नहीं कहा जा सकता."

बोस के मुताबिक "जमीनी स्तर पर सपा-बसपा के कार्यकर्ता मिल रहे हैं यह गोरखपुर, फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के परिणाम से साबित हो गया है. सपा-बसपा के साथ आने से मुस्लिम वोट का विभाजन नहीं होगा. इसका फायदा इस गठबंधन को मिलेगा. जाटव वोट बीएसपी के साथ है. अन्य दलितों की बात नहीं की जा सकती. इस जीत से यह उम्मीद की जा सकती है कि सपा और बसपा 2019 आम चुनाव के लिए साथ आ सकते हैं."


बोस के अनुसार "मायावती को जनता ने 2014 के लोकसभा चुनाव में नकार दिया था. फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में इसका बहुत खराब प्रदर्शन देखने को मिला. इसलिए बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए सपा-बसपा-कांग्रेस के गठबंधन की जरूरत है. साथ में राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह को लेना चाहिए."

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कांशीराम और मायावती के काम में अंतर
कांशीराम की जीवनी कांशीराम 'द लीडर ऑफ द दलित्स' लिखने वाले बद्रीनारायण कहते हैं " कांशीराम का विजन छोटा नहीं था. वह राष्ट्रीय स्तर की बात करते थे जबकि मायावती सिर्फ यूपी में सिमट गई हैं. हालांकि उनके पास संभावना बहुत है. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के फॉलोअर हैं. वहां बसपा के बेस वोट का ध्रुवीकरण हो सकता है. बसपा जिन राज्यों में खुद अच्छा नहीं कर सकती वहां अपना वोटबैंक शिफ्ट करवाकर गठबंधन के दूसरे दलों के लिए अच्छा कर सकती है."

नारायण के अनुसार " दलित कभी कांग्रेस का कोर वोटबैंक हुआ करता था, लेकिन बाद में यह बसपा में शिफ्ट हो गया. माना जा सकता है कि कांग्रेस को बसपा ने खत्म किया. इसलिए बसपा से कांग्रेस को थोड़ा डर तो है."

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गुजरात-हिमाचल: गफलत में थी कांग्रेस!
सियासी जानकारों का कहना है कि दलित वोट हर राज्य में हैं. इसलिए अगर मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनता है तो ही विपक्ष बीजेपी को चुनौती दे पाएगा. इस बात को बसपा के वरिष्ठ नेता उम्मेद सिंह भी मानते हैं. सिंह के मुताबिक "पार्टी ने अपने लिए गुजरात में 25 और हिमाचल में कांग्रेस की हारी हुई 10 सीटें मांगी थीं. लेकिन उसने नहीं दिया. कांग्रेस को भ्रम था कि वह गुजरात चुनाव जीत जाएगी. उसका बसपा से गठबंधन होता तो वहां बीजेपी की सरकार नहीं बनती. कांग्रेस को यह सच्चाई समझनी चाहिए. गठबंधन न होने से नुकसान कांग्रेस को हुआ है. बसपा ने गोरखपुर और फूलपुर में बता दिया है कि उसके बिना कोई भी विपक्षी पार्टी बीजेपी को टक्कर नहीं दे पाएगी."
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