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फांसी से पहले बैजू के आखिरी शब्द- साहब! हमार मुंह मत ढको, हम ऐसे ही चल देंगे
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Girija Shanker | News18Hindi
Updated: December 12, 2019, 5:25 PM IST
फांसी से पहले बैजू के आखिरी शब्द- साहब! हमार मुंह मत ढको, हम ऐसे ही चल देंगे
मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही थी. (Demo Pic)

पंडित जी ने बैजू से कहा, "अच्छा चलो, गंगाजल पीकर तुलसी पत्ती खा लो और राम का नाम लो." बैजू अपनी हथेली में चिपकी गंगाजल की बूंदों को तो गटक गया लेकिन राम का नाम नहीं लिया.

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  • Last Updated: December 12, 2019, 5:25 PM IST
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नई दिल्ली. 25 अक्टूबर 1978 की भोर यानी सूर्योदय के ठीक पहले का समय. रायपुर सेंट्रल जेल का 8 गुणे 10 फीट का वह बैरक, जिसमें कैद था हत्या का अपराधी बैजू. हम सभी उस बैरक के सामने. आम तौर पर सुनसान रहने वाली यह जगह भीड़भाड़ से भरी हुई थी. जेल अधीक्षक, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, पंडित सहित दर्जनों जेल कर्मचारी और हथियार बंद सिपाही मौजूद. अब से कुछ देर बाद बैजू को फांसी के फंदे पर लटकाया जाना था.

बैरक का दरवाजा खोला गया और हम सब उस बैरक में दाखिल हुए लेकिन बैजू जड़वत बैठा रहा, उसमें कोई हरकत नहीं हुई. मैं सोच रहा था कि बैजू को कैसे बताया जाएगा कि चलो तुम्हें फांसी पर चढ़ाना है? लेकिन ऐसा कुछ नहीं, बस सीधे प्रक्रिया शुरू हो गई.

बैजू की अंतिम इच्छा थी अपने बच्चों से मिलना
एक सिपाही के हाथ में बैजू के लिए नए कपड़े थे. दूसरे के पास नहाने के लिए साबुन, पानी, लोटा आदि और तीसरे के हाथ में मिठाई का पैकेट था. बैजू को नहलाकर नए कपड़े पहनाए गए. लेकिन उसने मिठाई को छुआ भी नहीं. अपने बच्चों से मिलना बैजू की अंतिम इच्छा थी. जेल अधीक्षक उससे मुखातिब हुए, "भई, तुमसे हफ्ते भर से पूछ रहे हैं कि तुम्हें किसी से मिलना है क्या? लेकिन तुमने तो कुछ बताया नहीं."

बिना नजरें उठाए ही बैजू बोला, "आप तो रिश्तेदार का पूछत रहेव, हम किसी रिश्तेदार से नहीं मिलब, सब दुश्मन हैं. हमार लड़कन को दिखवा देवे साहब."


बैजू के फांसी के फंदे के पास खड़े हम सभी असहाय थे और गुमसुम, क्योंकि बैजू की यह इच्छा पूरी करना किसी के वश में नहीं था. पंडित जी यंत्रवत मंत्र दोहराते रहे, जिसका बैजू पर कोई असर नहीं हो रहा था. पंडित जी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, "अच्छा चलो, गंगाजल पीकर तुलसी पत्ती खा लो और राम का नाम लो." बैजू अपनी हथेली में चिपकी गंगाजल की बूंदों को तो गटक गया लेकिन राम का नाम नहीं लिया.

अधिकारी ने कोर्ट के फैसले को संक्षिप्त में पढ़कर सुनायासमय सरकता जा रहा था. जेल के घंटे ने तभी 4 बजाए और जेल अधिकारी तथा मजिस्ट्रेट अचानक हरकत में आ गए. उन्होंने बैजू की पुकार को अनसुना करते हुए संवाद की प्रक्रिया को रोक दिया और सीधे अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी शुरू कर दीं. एक जेल अधिकारी ने न्यायालयों के फैसले को संक्षिप्त में पढ़कर सुनाया- "बैजू उर्फ रामभरोसा उर्फ रामभरोसे को अंबिकापुर के जिला सत्र न्यायाधीष ने 30 अप्रैल, 1976 को फांसी की सजा सुनाई. इसके विरुद्ध हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में अपील की गईं, लेकिन दोनों न्यायालयों ने अपील खारिज कर दी. उसकी दया याचिका को महामहिम राज्यपाल ने नामंजूर कर दिया और 19 अक्टूबर को महामहिम राष्ट्रपति ने भी जीवनदान देने में असहमति व्यक्त की. इसके बाद आज 25 अक्टूबर, 1978 को बैजू को फांसी की सजा दी जाती है."

सजा पढ़कर सुनाए जाने के दौरान सभी लोग खामोश थे और यही खामोशी फैसला पढ़कर सुनाने वाले अधिकारी के चुप हो जाने के बाद भी बनी रही. उस खामोशी को तोड़ते हुए सिटी मजिस्ट्रेट ने बिल्कुल मशीनी अंदाज में बैजू की वसीयत को पढ़कर उसे सुनाई.

चेहरे को ढकते समय लगभग रो पड़ा बैजू
बैजू के दोनों हाथ मोटी रस्सी से जकड़ लेने के बाद अब उसे बैरक से निकालने में एक कमी रह गई थी, उसके सिर पर काला कनटोप चढ़ाए जाने की. बता दें, काले कपड़े के इस कनटोप से कैदी का सिर एवं चेहरा ढक दिया जाता है, ताकि वह कुछ देख न सके कि उसे कहां ले जाया जा रहा है. दो जेल कर्मचारी कनटोप लेकर उसके सिर के ऊपर से चेहरे में फंसाने लगे तभी बैजू लगभग रो पड़ा, "साहब, हमार मुंह मत ढको, हम ऐसे ही चल देंगे तुम्हारे साथ, साहब हम हाथ जोड़ते हैं."

बैजू की मुंह न ढकने की मांग ऐसी मांग नहीं थी, जिसे मान लेने से न्यायालय के किसी आदेश की अवमानना होती या जेल नियमों का उल्लंघन होता या फांसी की सजा दिए जाने में कोई अवरोध पैदा होता. लिहाजा उसे बिना काला कनटोप लगाए ले जाने की इजाजत दे दी गई. दो सिपाहियों ने दोनों ओर से कसकर पकड़कर बैजू को बैरक से बाहर निकाला और पूरा काफिला फांसी के फंदे की ओर चल पड़ा. आगे-आगे 4 सिपाही पेट्रोमैक्स (लालटेन) लिए चल रहे थे.

मैदान के किनारे ऊंचे से स्थान पर फांसी देने के लिए दो प्लेटफार्म बने हुए थे, जिनमें लोहे की मजबूत रॉड वाला आर्च बना हुआ था. दो प्लेटफार्म की व्यवस्था इसलिए रखी जाती है कि अगर एक प्लेटफार्म ऐन वक्त किसी वजह से काम न करे या उसमें कोई खराबी आ जाए तो दूसरे को उपयोग में लिया जा सके. प्लेटफार्म पर खड़े लोहे के आर्च के सहारे मोटी रस्सी झूल रही थी.

बैजू के सिर पर जबरन डाला गया काला कपड़ा
काला कनटोप लिए एक जेल वार्डन वहीं पास घूम रहा था. उसने बैजू के सिर पर थैले के आकार के कनटोप को जबरन डाल दिया. बैजू के गले में प्लेटफार्म के ऊपर लटकती मोटी रस्सी का फंदा कस दिया गया. इस कसावट को पक्का करने के लिए रस्सी पर पीतल की कुंडी भी कस दी गई. इस रस्सी को कैदी के बायें कान के नीचे जबड़े को कसते हुए लगाया जाता है.

जेल अधीक्षक ने अपनी घड़ी की ओर देखा 4 बजकर 27 मिनट. उन्होंने हाथ ऊपर उठाकर इशारा किया. जल्लाद का काम करने वाले कैदी ने इशारा मिलते ही फांसी की सजा देने के लिए लोहे का लीवर खींच दिया और पलक झपकते ही झटके से बैजू का शरीर उस तलघरनुमा में लटक गया.

फांसी की सजा दिए जाने के बाद शव को तब तक लटकाए रखने का प्रावधान मैन्युअल में है, जब तक चिकित्सा अधिकारी यह घोषित न कर दें कि उस कैदी का जीवन समाप्त हो गया है. थोड़ी देर रुककर डॉक्टर ने फिर परीक्षण किया, अब धड़कन बंद हो गई थी. यानी बैजू पूरी तरह लाश बन चुका था.

(नोट- गिरिजा शंकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'आंखों देखी फांसी' नामक पुस्तक के लेखक भी हैं. गिरिजा शंकर, उन दो पत्रकारों में से एक हैं, जिन्होंने फांसी की आंखों देखी रिपोर्टिंग की थी.)

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First published: December 12, 2019, 5:20 PM IST
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