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नागरिकता कानून: मुस्लिम-दलित गठजोड़ तोड़ने की कोशिश में जुटे बीजेपी और संघ!
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ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 7:23 PM IST
नागरिकता कानून: मुस्लिम-दलित गठजोड़ तोड़ने की कोशिश में जुटे बीजेपी और संघ!
CAA: मुस्लिमों के साथ कुछ दलितों के आने से क्या बदलेगा सियासी समीकरण?

सीएसडीएस के मुताबिक 2019 में करीब 34 फीसदी दलितों ने दिया भाजपा को वोट, संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के बहाने मुस्लिम-दलित गठजोड़ से यह वोटबैंक दरकने की है आशंका. दलित समाज को रिझाने की कोशिश में जुटी संघ और बीजेपी की ब्रिगेड

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  • Last Updated: January 3, 2020, 7:23 PM IST
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नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस कोशिश में जुट गए हैं कि संशोधित नागरिकता कानून (CAA) पर दलित वर्ग खिलाफ न हो. इस मामले में पिछले दिनों कई प्रदर्शनों में मुस्लिम-दलित गठजोड़ देखने को मिला है. इससे पार्टी में बेचैनी है. इसीलिए संगठन ने दिल्ली में दलित वर्ग का एक स्पेशल सम्मेलन करवाकर इस समाज से आने वाले नेताओं के जरिए बताने की कोशिश की है कि इस कानून से उन पर कोई आंच नहीं आने वाली है. बताया जा रहा है कि संघ ने इस कानून के बारे में दलित समुदाय के बीच जागरूकता फैलाने के लिए बीजेपी के अनुसूचित जाति से आने वाले नेताओं और मंत्रियों को जिम्मेदारी दी है.

जिसमें दलित समाज से आने वाले केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, रतनलाल कटारिया, बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दुष्यंत गौतम, सांसद विनोद सोनकर एवं राष्ट्रीय अनसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया, महासचिव भूपेंद्र यादव, सहित कई बीजेपी नेताओं ने अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों को समझाने की कोशिश की कि नागरिकता कानून से दलितों का कोई नुकसान नहीं है. इसमें संघ के सामाजिक समरसता मंच में काम करने वाले दलित नेता भी मौजूद रहे. बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद रहे. संघ का मानना है कि देश के दलितों में नागरिकता संशोधन कानून के बारे में जागरूकता फैलाने की ज्यादा जरूरत है. क्योंकि यदि मुस्लिम और दलित एक होकर विरोध करेंगे तो इसे लागू करना संभव नहीं होगा. 22 दिसंबर 2019 को पीएम मोदी ने भी रामलीला मैदान की रैली से सीएए के खिलाफ प्रदर्शन में दलितों के शामिल होने पर हैरानी जताई थी.

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दलितों को सीएए के बारे में समझाने के लिए आयाोजित एक कार्यक्रम में बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष


इस कार्यक्रम में शामिल हुए दलित एक्टिविस्ट ओपी धामा का कहना है कि इस कानून का दलितों के विरोध करने की कोई वजह नहीं दिखाई पड़ती. इससे सबसे ज्यादा फायदा दलित समाज को ही होने वाला है. पाकिस्तान और बांग्लादेश में ज्यादातर प्रताड़ित हिंदू दलित और गरीब लोग ही हैं.



आरएसएस का इमोशनल कार्ड
हाल ही में आरएसएस के सह सर कार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने भी बीजेपी से जुड़े अनुसूचित जाति के नेताओं के साथ बैठक की है, जिसमें संघ ने बीजेपी नेताओं से कहा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं में एक बड़ा तबका अनुसूचित जाति का है, जिसे वहां प्रताड़ना झेलकर रहना पड़ रहा है. ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से बना कानून अत्याचार के शिकार लोगों के जख्मों पर मरहम लगाएगा. इसलिए दलित वर्ग इसका समर्थन करे.

बीजेपी, संघ के लिए क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं दलित?
समाज में सबसे कमजोर माने जाने वाले दलितों की बड़ी सियासी ताकत है, इसके पीछे इनका संख्या बल है. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 16.63 फीसदी अनुसूचित जाति और 8.6 फीसदी अनुसूचित जनजाति हैं. 150 से ज्यादा संसदीय सीटों पर एससी/एसटी का प्रभाव माना जाता है. बीजेपी और संघ की रणनीति से यह वोटबैंक पिछले दो चुनावों में तेजी से बीजेपी की ओर खिसका है. लोकनीति-सीएसडीएस (Lokniti-Centre for the Study of Developing Societies) के मुताबिक 2019 के आम चुनाव में दलितों की निष्ठा भाजपा में बढ़ी है. 2014 में लगभग एक-चौथाई (24%) की तुलना में 2019 में एक तिहाई (34%) से अधिक दलितों ने भाजपा को वोट दिया.

दलित-मुस्लिम गठजोड़ से किसका नुकसान?
दलित चिंतक एवं दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रतनलाल का कहना है कि सीएए (CAA) के बहाने हो रहे दलित-मुस्लिम गठजोड़ से बीजेपी का नया नवेला दलित वोट बैंक दरक सकता है. यही डर संघ को सता रहा है. क्योंकि दलितों, पिछड़ों के वोट के सहारे ये लोग सत्ता में आए हैं. जब मुस्लिम-दलित गठजोड़ होगा तो फिर ये वोट किसके साथ होगा इसकी सबसे ज्यादा कसमसाहट इसीलिए बीजेपी और संघ में बताई जाती है. बेचैनी उन लोगों में भी है, जो अपने आपको अब तक दलितों का सबसे बड़ा खैरख्वाह मानते आए हैं. उन्हें चिंता है कि कहीं भीम आर्मी और दूसरे संगठन उनके विकल्प के तौर पर स्थापित न हो जाएं.

प्रो. रतनलाल सवाल करते हुए कहते हैं कि बीजेपी और संघ को दलितों की इतनी चिंता है तो वो पहले भारतीय दलितों पर होने वाले अत्याचार को क्यों नहीं रोकते? सरकारी क्षेत्र में उनकी नौकरियों को पूरा क्यों नहीं करते? उन्हें निजी क्षेत्र में आरक्षण क्यों नहीं देते. कहीं उन्हें घोड़ी नहीं चढ़ने दिया जा रहा है और कहीं पानी नहीं पीने दिया जा रहा. इस पर सरकार क्या कर रही है?

हालांकि, बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि लंबे समय से दलितों को ठगने का काम कर रहे कुछ लोग उन्हें अब सीएए के बहाने बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि पाकिस्तान में जो हिंदू पीड़ित हैं उनमें दलित सबसे अधिक हैं. हम उनकी पीड़ा को समझ रहे हैं. जबकि कुछ लोग दलितों को गुमराह करके दलित भाईयों का ही नुकसान कर रहे हैं.

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संघ का मानना है कि देश के दलितों में सीएए के बारे में जागरुकता फैलाने की ज्यादा जरूरत है


एंटी सीएए प्रदर्शन और दलित?
सीएए के खिलाफ मुस्लिम समाज ने जो प्रदर्शन किए उसमें दलित समाज की भी भागीदारी दिखाई दे रही है. खासतौर पर भीम आर्मी की. इसके प्रमुख चंद्रशेखर ने जामा मस्जिद पर प्रदर्शन किया था. उन्हें इस मामले में गिरफ्तार किया गया. इसके बाद बसपा प्रमुख मायावती भी इस कानून का विरोध करने पर मजबूर हुईं. फिलहाल भीम आर्मी ने एक बड़े दलित वर्ग में यह बात पहुंचाने की कोशिश की है कि सीएए और एनआरसी सिर्फ मुस्लिमों को ही नहीं बल्कि दलित और आदिवासी समुदाय को भी प्रभावित कर रहा है. दलित और आदिवासी के अधिकतर लोग गरीब और भूमिहीन हैं. ये दोनों समुदाय रोजगार के लिए एक शहर से दूसरे शहर में रोजी रोटी तलाश करते रहते हैं. ये कहां से अपने कागज दिखा पाएंगे?

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First published: January 3, 2020, 1:02 PM IST
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