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लॉकडाउन में क‍िरायेदारों से वादा करके CM केजरीवाल पलटे: जानिए, हाईकोर्ट ने कैसे की द‍िल्‍ली सरकार की खिंचाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने वादा पूरा करने के बगैर इरादे के केवल जुबानी जुमला देने के लिए केजरीवाल सरकार पर सवाल खड़े किए

दिल्ली हाईकोर्ट ने वादा पूरा करने के बगैर इरादे के केवल जुबानी जुमला देने के लिए केजरीवाल सरकार पर सवाल खड़े किए

Delhi News: मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की एकल बेंच के जुलाई के एक फैसले के खिलाफ सरकार द्वारा दायर अपील की सुनवाई के दौरान सरकार से कहा, 'यदि आप कह सकते हैं, तो साहसपूर्वक कहें कि (वादा पूरा करने का) मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन मैंने बयान दिया था.'

  • News18Hindi
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    दिल्ली हाईकोर्ट ने वादा पूरा करने के बगैर इरादे के केवल जुबानी जुमला देने के लिए केजरीवाल सरकार पर सोमवार को सवाल खड़े किए, हालांकि इसने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मार्च 2020 के उस बयान पर अमल के लिए नीति बनाने के अपने पूर्व के आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि कोई किरायेदार किराया देने में असमर्थ था तो अधिकारी इसका भुगतान करेंगे.

    इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की एकल बेंच के जुलाई के एक फैसले के खिलाफ सरकार द्वारा दायर अपील की सुनवाई के दौरान सरकार से कहा, ‘यदि आप कह सकते हैं, तो साहसपूर्वक कहें कि (वादा पूरा करने का) मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन मैंने बयान दिया था.’ जस्टिस प्रतिभा सिंह का आदेश पिछले साल मुख्यमंत्री द्वारा दिए महामारी और देशव्यापी तालाबंदी के दौरान दिए गए एक बयान के बीच पांच दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों और एक मकान मालिक द्वारा दायर एक याचिका पर आया था.

    याचिका के अनुसार, पिछले साल 29 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, सीएम केजरीवाल ने सभी जमींदारों से ‘गरीब और गरीबी से त्रस्त’ उन किरायेदारों से किराया वसूली की मांग को स्थगित करने का अनुरोध किया था और यह भी वादा किया था कि यदि कोई किरायेदार गरीबी के कारण किराया भुगतान करने में असमर्थ है तो सरकार उनकी ओर से भुगतान करेगी. न्यायमूर्ति सिंह ने फैसला सुनाया था कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया एक वादा या आश्वासन ‘स्पष्ट रूप से लागू करने योग्य वादे के बराबर है’, जिसके कार्यान्वयन पर राज्य द्वारा विचार किया जाना चाहिए. हालांकि, राज्य ने अपनी अपील में कहा है कि बयान को गलत तरीके से संदर्भ से बाहर करके देखा गया है और इसकी ‘व्यापक और बिना शर्त वादे / प्रतिनिधित्व’ के तौर पर गलत व्याख्या की गई है.

    सोमवार को, दिल्ली सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष वशिष्ठ ने दलील दी कि इस तरह का कोई कोई वादा नहीं था और सरकार ने केवल मकान मालिकों से किराए के भुगतान पर किरायेदारों को मजबूर नहीं करने और इसे कुछ महीनों के लिए स्थगित करने के लिए कहा था. वशिष्ट ने कहा क‍ि यह एक पंक्ति कि ‘यदि एक अत्यंत गरीब व्यक्ति के पास भुगमान के पैसे नहीं होंगे तो सरकार इसका भुगतान करेगी’ बिना शर्त बयान था, कोई वादा नहीं था.

    अदालत ने वशिष्ठ को मार्च 2020 में दिए गए सीएम के बयान को पढ़ने के लिए कहा और इसे सुनने के बाद कहा, ‘इस तरह के कई लोग होंगे जिन्होंने किराया नहीं दिया होगा. आप बोलते हो कि सरकार इसका भुगतान करेगी. क्या 5 प्रतिशत राशि राशि के भुगतान का इरादा रखते हैं. क्या आप 1 प्रतिशत भी भुगतान करने के लिए तैयार हैं?’ कार्यवाही के दौरान सरकारी वकील ने केजरीवाल के बयान की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी चलाई. जब सरकार की ओर से दलील दी गई कि उसके सामने ऐसा कोई पीड़ित व्यक्ति नहीं था, तो अदालत ने कहा, ‘आप नीति का मसौदा तैयार करें. एक हजार लोग आपके पास आ जाएंगे.’

    कोर्ट ने कहा, ‘यानी आपका भुगतान करने का कोई इरादा नहीं है, आपने केवल एक बयान दे दिया है? क्या हमें इसे अपने आदेश में दर्ज करना चाहिए कि यद्यपि आप भुगतान नहीं करना चाहते हैं, फिर भी आपने बयान दिया है?’ हालांकि, खंडपीठ ने बाद में कहा कि एकल पीठ के फैसले के अमल पर सुनवाई की अगली तारीख 29 नवंबर तक रोक रहेगी. याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता गौरव जैन ने स्थगनादेश का विरोध करते हुए कहा कि राज्य को केजरीवाल द्वारा दिए गए बयान के आलोक में एक नीति बनाने के लिए कहा जाना चाहिए.

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