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court said yasin malik crimes were aimed at attacking heart of the country forcibly separating jammu and kashmir

यासीन के अपराधों का मकसद ‘देश के दिल पर हमला’ और जम्मू-कश्मीर को जबरदस्ती अलग करना था: कोर्ट

जज ने कहा कि इन अपराधों का उद्देश्य भारत के विचार की भावना पर प्रहार करना था.

जज ने कहा कि इन अपराधों का उद्देश्य भारत के विचार की भावना पर प्रहार करना था.

Terror Funding Case: जज ने कहा कि इन अपराधों का उद्देश्य भारत के विचार की भावना पर प्रहार करना था और इसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत संघ से जबरदस्ती अलग करना था. अपराध अधिक गंभीर हो जाता है क्योंकि यह विदेशी शक्तियों और नामित आतंकवादियों की सहायता से किया गया था. अपराध की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि यह एक कथित शांतिपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के पर्दे के पीछे किया गया था.

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नयी दिल्ली. दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर के सबसे अग्रणी अलगाववादी नेताओं में से एक यासीन मलिक को आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में उम्रकैद की सजा देते हुए कहा कि इन अपराधों का मकसद ‘देश के दिल पर हमला करना’ और भारत संघ से जम्मू-कश्मीर को जबरदस्ती अलग करने का था. विशेष न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने गैर-कानूनी गतिविधियां निरोधक अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत विभिन्न अपराधों के लिए अलग-अलग अवधि की सजा सुनाईं.

जज ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की तरफ से की गई मृत्युदंड की मांग को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि मलिक को जिन अपराधों के लिये दोषी ठहराया गया है वे गंभीर प्रकृति के हैं.

जज ने कहा, “इन अपराधों का उद्देश्य भारत के विचार की भावना पर प्रहार करना था और इसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत संघ से जबरदस्ती अलग करना था. अपराध अधिक गंभीर हो जाता है क्योंकि यह विदेशी शक्तियों और नामित आतंकवादियों की सहायता से किया गया था. अपराध की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि यह एक कथित शांतिपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के पर्दे के पीछे किया गया था.”

अपराधी के अपराध साजिश के रूप में 

जज ने कहा कि जिस तरह से अपराध किए गए थे, वह साजिश के रूप में थे, जिसमें उकसाने, पथराव और आगजनी करके विद्रोह का प्रयास किया गया था, और बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा के कारण सरकारी तंत्र बंद हो गया था.

हालांकि उन्होंने संज्ञान लिया कि अपराध करने का तरीका, जिस तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया गया था, उससे वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विचाराधीन अपराध सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दुर्लभतम मामले की कसौटी में विफल हो जाएगा. अदालत ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) नेता मलिक को दो अपराधों – आईपीसी की धारा 121 (भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना) और यूएपीए की धारा 17 (यूएपीए) (आतंकवादी गतिविधियों के लिए राशि जुटाना)- के लिए दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई गई.

मलिक की दलील- 1994 में हिंसा छोड़ दी थी

अदालत में मलिक द्वारा दाखिल जवाब में कहा गया, “1994 में संघर्षविराम के बाद, उसने घोषणा की थी कि वह महात्मा गांधी के शांतिपूर्ण मार्ग का अनुसरण करेगा और एक अहिंसक राजनीतिक संघर्ष में शामिल होगा. उसने आगे तर्क दिया है कि तब से उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है कि पिछले 28 वर्षों में उसने किसी भी आतंकवादी को कोई आश्रय प्रदान किया था या किसी आतंकवादी संगठन को कोई साजोसामान संबंधी सहायता प्रदान की थी.”

मलिक ने अदालत को बताया कि उसने वीपी सिंह के समय से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सभी प्रधानमंत्रियों से मुलाकात की, जिन्होंने उससे बातचीत की और उसे एक राजनीतिक मंच दिया.

बुरहान वानी की मौत के तुरंत बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया

जज ने कहा, “भारत सरकार ने उसे भारत के साथ-साथ बाहर भी अपनी राय व्यक्त करने के लिए सभी मंच प्रदान किए थे, और सरकार को एक ऐसे व्यक्ति को अवसर देने के लिए मूर्ख नहीं माना जा सकता जो आतंकवादी कृत्यों में लिप्त था. उसने आगे तर्क दिया है कि यह आरोप लगाया गया है कि वह बुरहान वानी की हत्या के बाद घाटी में हिंसा के कृत्यों में शामिल था.” जज ने कहा, “हालांकि, बुरहान वानी की मौत के तुरंत बाद, उसे गिरफ्तार कर लिया गया और नवंबर 2016 तक हिरासत में रहा. इसलिए, वह हिंसक विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकता था.”

मलिक कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उनके पलायन के लिए जिम्मेदार: एनआईए 

एनआईए के इस तर्क पर कि मलिक कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उनके पलायन के लिए जिम्मेदार था, न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि यह मुद्दा अदालत के समक्ष नहीं है और इस पर फैसला नहीं किया गया है, इसलिए वह खुद को तर्क से प्रभावित नहीं होने दे सकते.

मलिक को मौत की सजा देने के लिए एनआईए की याचिका को खारिज करते हुए जज ने कहा, “मैं तदनुसार पाता हूं कि यह मामला मौत की सजा देने लायक नहीं है.” जज ने मलिक की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उसने 1994 में बंदूक छोड़ दी थी और उसके बाद उसे एक वैध राजनीतिक व्यक्ति के रूप में मान्यता दी गई थी. जज ने कहा कि “मेरी राय में, इस दोषी का कोई सुधार नहीं था.”

अपराधी ने 1994 में बंदूक भले छोड़ दी हो, लेकिन उसे पहले की गई हिंसा पर कोई खेद नहीं  

जज ने कहा, “यह सही हो सकता है कि अपराधी ने वर्ष 1994 में बंदूक छोड़ दी हो, लेकिन उसने वर्ष 1994 से पहले की गई हिंसा के लिए कभी कोई खेद व्यक्त नहीं किया था. यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब उसने दावा किया था कि उसने 1994 के बाद हिंसा का रास्ता छोड़ दिया, भारत सरकार ने इस पर भरोसा किया और उसे सुधार करने का मौका दिया और अच्छे विश्वास में, उसके साथ एक सार्थक बातचीत में शामिल होने की कोशिश की और जैसा कि उसने स्वीकार किया, उसे अपनी राय व्यक्त करने के लिए हर मंच दिया.” उन्होंने कहा कि दोषी ने हालांकि हिंसा का त्याग नहीं किया.

जज ने कहा, “बल्कि, सरकार के अच्छे इरादों के साथ विश्वासघात करते हुए, उसने राजनीतिक संघर्ष की आड़ में हिंसा को अंजाम देने के लिए एक अलग रास्ता अपनाया. दोषी ने दावा किया कि उसने अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन किया था और शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था. हालांकि, सबूत जिसके आधार पर आरोप तय किए गए थे और जिसने उसे दोषी ठहराया है, कुछ और ही कहानी बयां करते हैं.” उन्होंने कहा कि पूरे आंदोलन को हिंसक बनाने की योजना बनाई गई थी.

अपराधी गांधी का अनुयायी होने का दावा नहीं कर सकता है: जज

जज ने कहा, “मुझे यहां ध्यान देना चाहिए कि अपराधी महात्मा का आह्वान नहीं कर सकता और उनके अनुयायी होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि महात्मा गांधी के सिद्धांतों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी, चाहे उद्देश्य कितना भी बड़ा हो. चौरी-चौरा में हुई हिंसा की एक छोटी सी घटना पर महात्मा गांधी ने पूरे असहयोग आंदोलन को बंद कर दिया था.”

उन्होंने कहा कि घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा होने के बावजूद मलिक ने न तो इसकी निंदा की और न ही विरोध का अपना कैलेंडर वापस लिया. जज ने कहा, वर्तमान मामले में, सजा देने के लिए प्राथमिक विचार यह होना चाहिए कि यह उन लोगों के लिए एक निवारक के रूप में काम करे जो समान मार्ग का अनुसरण करना चाहते हैं.

सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी 

अदालत ने मलिक को आईपीसी की धारा 120 बी (आपराधिक साजिश), 121-ए (भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश) और यूएपीए की धारा 15 (आतंकवाद), 18 (आतंकवाद की साजिश) और 20 (आतंकवादी संगठन का सदस्य होने) के तहत 10-10 साल की जेल की सजा सुनाई.

अदालत ने यूएपीए की धारा 13 (गैरकानूनी कृत्य), 38 (आतंकवाद की सदस्यता से संबंधित अपराध) और 39 (आतंकवाद को समर्थन) के तहत प्रत्येक के लिये पांच-पांच साल की जेल की सजा सुनाई. सभी सजा साथ-साथ चलेंगी.

Tags: Delhi Court, Terror Funding

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