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सीएम विंडो पर भी नहीं हो रहा दलितों की समस्या का समाधान

सीएम विंडो पर भी नहीं हो रहा दलितों की समस्या का समाधान

ये रास्ता नाथूपुर गांव के दलित बस्ती को जाता है। लेकिन यहां से केवल पैदल या फिर दोपहिया वाहन ही गुजर सकता है। दरअसल साल 1977 में इस बस्ती को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला। शुरूआती दौर में यहां पक्का न सही कच्चा रास्ता ही था लेकिन बस्ती वालों का आरोप है कि दो साल पहले डीएलएफ बिल्डर ने ग्रीन बेल्ट में मकान बनवाया। उस वक्त डीएलएफ ने उनके रास्ते पर अतिक्रमण कर लिया। इसकी शिकायत गांव वालों ने पंचायत से लेकर निगम तक की। नियमों के मुताबिक पैसे भी भरे लेकिन आज भी वो इस संकरे रास्ते से आने जाने को मजबूर हैं।

ये रास्ता नाथूपुर गांव के दलित बस्ती को जाता है। लेकिन यहां से केवल पैदल या फिर दोपहिया वाहन ही गुजर सकता है। दरअसल साल 1977 में इस बस्ती को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला। शुरूआती दौर में यहां पक्का न सही कच्चा रास्ता ही था लेकिन बस्ती वालों का आरोप है कि दो साल पहले डीएलएफ बिल्डर ने ग्रीन बेल्ट में मकान बनवाया। उस वक्त डीएलएफ ने उनके रास्ते पर अतिक्रमण कर लिया। इसकी शिकायत गांव वालों ने पंचायत से लेकर निगम तक की। नियमों के मुताबिक पैसे भी भरे लेकिन आज भी वो इस संकरे रास्ते से आने जाने को मजबूर हैं।

ये रास्ता नाथूपुर गांव के दलित बस्ती को जाता है। लेकिन यहां से केवल पैदल या फिर दोपहिया वाहन ही गुजर सकता है। दरअसल साल 1977 में इस बस्ती को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला। शुरूआती दौर में यहां पक्का न सही कच्चा रास्ता ही था लेकिन बस्ती वालों का आरोप है कि दो साल पहले डीएलएफ बिल्डर ने ग्रीन बेल्ट में मकान बनवाया। उस वक्त डीएलएफ ने उनके रास्ते पर अतिक्रमण कर लिया। इसकी शिकायत गांव वालों ने पंचायत से लेकर निगम तक की। नियमों के मुताबिक पैसे भी भरे लेकिन आज भी वो इस संकरे रास्ते से आने जाने को मजबूर हैं।

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ये रास्ता नाथूपुर गांव के दलित बस्ती को जाता है। लेकिन यहां से केवल पैदल या फिर दोपहिया वाहन ही गुजर सकता है। दरअसल साल 1977 में इस बस्ती को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला। शुरूआती दौर में यहां पक्का न सही कच्चा रास्ता ही था लेकिन बस्ती वालों का आरोप है कि दो साल पहले डीएलएफ बिल्डर ने ग्रीन बेल्ट में मकान बनवाया। उस वक्त डीएलएफ ने उनके रास्ते पर अतिक्रमण कर लिया। इसकी शिकायत गांव वालों ने पंचायत से लेकर निगम तक की। नियमों के मुताबिक पैसे भी भरे लेकिन आज भी वो इस संकरे रास्ते से आने जाने को मजबूर हैं।

हरियाणा की नई सरकार जो सीएम विंडो के जरिए जनता का हर दुख-दर्द हर लेने का दावा करती है उसके पास इन ग्रामीणों की समस्या का कोई समाधान नहीं है। इनके शिकायत की सुनवाई करने न तो संबंधित कोई अधिकारी मौके पर आया और न ही इनकी समस्या का कुछ निदान ही हुआ। कहने को तो गुड़गांव में सरकारी अधिकारी नियमों के मुताबिक रोजाना दो घंटे आम जनता की समस्या से रूबरु होते हैं पर फिर भी जनता की समस्या का हल निकालने में यह नाकामयाब रहे हैं।

ऐसे में इन ग्रामीणों के इल्जाम के दायरे में न केवल डीएलएफ बिल्डर बल्कि सरकारी तंत्र भी आ रहा है। साथ ही भाजपा सरकार की ओर से बढ़िया काम करने का दंभ भरने की हवा भी निकल रही हैं। जिसका सबूत ये है कि सीएम विंडो के रास्ते भी इस दलित बस्ती की समस्या का हल होता नहीं दिखाई दे रहा है।

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