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ऐसे होती है एक दारुल क़ज़ा की स्थापना, निकाह और तलाक पर करती है सुनवाई

फाइल फोटो.

फाइल फोटो.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देश में दारुल क़ज़ा (शरियत कोर्ट) की संख्या बढ़ाए जाने का प्रस्ताव रखा है.

    तुरंत वाला तीन तलाक का मामला विवादों में घिरा हुआ है. एक ओर केन्द्र सरकार इसे जहां कोर्ट में लाकर कोई हल निकालना चाहती है तो दूसरी ओर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) इसे शरियत का मामला बताकर शरियत के हिसाब से इसका हल निकालने की वकालत कर रहा है. इसी कड़ी में बोर्ड ने देश में दारुल क़ज़ा (शरियत कोर्ट) की संख्या बढ़ाए जाने का प्रस्ताव रखा है. 15 जुलाई को दिल्ली में होने वाली बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर भी लग सकती है.

    दारुल क़ज़ा किसे कहते हैं. कैसे दारुल क़ज़ा की स्थापना की जाती है. कौन दारुल क़ज़ा का मुखिया होता है. और किस तरह से दारुल क़ज़ा किसी मामले में अपना फैसला सुनाती है, इसी बारे में आपको बता रही है न्यूज 18 हिन्दी की ये खास रिपोर्ट.

    दारुल क़ज़ा या शरिया कोर्ट  

    दारुल क़ज़ा की स्थापना जिलास्तर पर की जाती है.

    यूपी में इस वक्त 40 दारुल क़ज़ा चल रहे हैं.

    एक दारुल क़ज़ा में 5 सदस्य होते हैं.

    5 सदस्यों के बीच एक अध्यक्ष होता है.

    दारुल क़ज़ा के अध्यक्ष को क़ाजी कहा जाता है.

    दारुल क़ज़ा का सदस्य बनने के लिए धर्म का जानकार होना चाहिए.

    शहर के बुद्धजीवियों की आम राय से अध्यक्ष और सदस्य बनाए जाते हैं.

    कहीं-कहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी दारुल क़ज़ा की स्थापना करता है.

    दारुल क़ज़ा में खासतौर से निकाह और तलाक के मामलों की सुनवाई होती है.

    कभी-कभी विरासत के जायदाद संबंधी मामले भी सुने जाते हैं.

    कभी एक तो कभी-कभी दोनों पक्ष दारुल क़ज़ा में अर्जी देते हैं.

    मामला दर्ज होने पर दारुल क़ज़ा दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाती है.

    मामलों की संख्या के हिसाब से कभी रोज तो कभी दो-चार दिन बाद सुनवाई होती है.

    दारुल क़ज़ा अपने फैसले मनवाने के लिए किसी भी पक्ष को बाध्य नहीं कर सकता है.

    सुनवाई के दौरान एक पक्ष नहीं आता है तो एक तरफा फैसला सुना दिया जाता है.

    दारुल क़ज़ा शरियत (धर्म) के हवाले से फैसला सुनाती है.

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