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दिल्ली विधानसभा चुनाव -आखिर इतना सन्नाटा क्यों है?

दिल्ली के चुनाव में इस बार वैसी सरगर्मियां नहीं हैं, जैसा कि पिछली बार थीं.

दिल्ली के चुनाव में इस बार वैसी सरगर्मियां नहीं हैं, जैसा कि पिछली बार थीं.

इस बार के दिल्ली के विधानसभा चुनाव में क्यों गायब हैं मुद्दे, चर्चाएं, बयान, नोक-झोंक और वो राजनितिक उठापटक जो हर बार द ...अधिक पढ़ें

नई दिल्ली. दिल्ली विधानसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. आम आदमी पार्टी ने तो सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान भी कर दिया, लेकिन दिल्ली विधानसभा के चुनाव में वो राजनीतिक सरगर्मी नहीं दिख रही है जिसके लिए दिल्ली जानी जाती है. पांच साल पहले 2015 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली की बयानबाजी देश में चर्चा का केन्द्र रहती थी और उस समय देश में बयानबाजी के लिए सबसे चर्चित नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का अब तक इस चुनाव में ऐसा कोई बयान नहीं आया जो चुनावी मुद्दा बन सके. बीजेपी नेता भले ही सीएए और एनपीआर पर लगातार बयान दे रहे हों लेकिन उनके बयान भी चुनावी मुद्दे नहीं बन पा रहे. बात करें कांग्रेस की तो कांग्रेस नेता इस चुनाव में अभी तक ऐसा कुछ नहीं कर पाए हैं जिसकी चर्चा में चुनाव में हो.

आंदोलन क्यों नहीं बन पा रहे हैं चुनावी मुद्दे?
दिल्ली में चुनाव के इस मौसम में कई आंदोलन चल रहे हैं. एक आंदोलन जेएनयू में जहां फीस बढ़ाये जाने और हॉस्टल में हुई हिंसा के खिलाफ चल रहा हैं, तो वहीं जामिया के छात्र विश्वविद्यालय परिसर में पुलिस के बिना इजाजत दाखिल होने के खिलाफ विरोध हो रहा है. सीएए के खिलाफ शहीनबाग में करीब एक महीने से विरोध प्रदर्शन चल रहा है जिससे पूरी दिल्ली के ट्रैफिक का बुरा हाल है. दिल्ली के कई और इलाकों में सीएए के खिलाफ और समर्थन में छिटपुट प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन इतने आंदोलनों के बाद भी इनमें से कोई मुद्दा चुनवी मुद्दा नहीं बन पा रहा है.

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CAA और NRC के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में प्रदर्शन करतीं महिलाएं.


आंदोलनों के मुद्दा न बनने की ये है वजह?
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर ये इतने सारे आंदोलनों के बाद बाद भी सीएए, एनपीआर और छात्रों के मुद्दा चुनावी मुद्दे क्यों नहीं बन पा रहे हैं. देश भर में पिछले एक साल में हुए अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों के देखें तो क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय मुद्दों से बचती रही हैं. जबकि राष्ट्रीय पार्टियां राष्ट्रीय मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहती हैं. चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे की बात वहीं होती है जहां बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हों लेकिन दिल्ली में कांग्रेस अब तक चुनाव से बाहर दिख रही है. ऐसे में आम आदमी पार्टी जहां बिजली बिल माफी, मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा जैसे स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहीं बीजेपी इन आंदोलनों के सहारे चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहती है. साफ है राज्य विधान सभा चुनाव में दोनों दलों के मुद्दे अलग-अलग हैं. यही वो कारण हैं जिसके नाते ये आंदोलन भले ही मीडिया और इससे जुड़े लोगों के लिए मायने रखते हों लेकिन चुनावी मुद्दा नहीं हैं.

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Tags: Arvind kejriwal, Delhi Assembly Election 2020, Manoj tiwari, Narendra modi, Sonia Gandhi

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