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बल्लीमारान की गलियां गालिब के अलावा हारुन युसूफ की सियासत का भी पता देती हैं

News18Hindi
Updated: January 15, 2020, 4:59 PM IST
बल्लीमारान की गलियां गालिब के अलावा हारुन युसूफ की सियासत का भी पता देती हैं
हारून यूसुफ दिल्ली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं.

चांदनीचौक की बल्लीमारान सीट से हारुन युसूफ अबतक 5 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं जो ये साबित करता है कि इलाके के लोगों की पहली पसंद 'हरून भाई' ही हैं

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  • Last Updated: January 15, 2020, 4:59 PM IST
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हारुन युसूफ कांग्रेस पार्टी के वो वफादार सिपाही हैं जो साल 1988 से लगातार कांग्रेस पार्टी में बने हुए हैं. चांदनीचौक की बल्लीमारान सीट से हारुन युसूफ अबतक 5 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. ये साबित करता है कि इलाके के लोगों की पहली पसंद 'हरून भाई' ही हैं. अगर इलाके की  जनता से कांग्रेस पूछे कि इस बार वो किसे टिकट दिलाना चाहेंगे तो जनता का जवाब होगा - हारून प्लीज़.

हारून युसूफ की जीत के सिलसिले  उनकी लोकप्रियता और उन पर जनता का भरोसा तस्दीक करने के लिए काफी है. पिछले 25 साल से जनता का विश्वास जीतते आ रहे हारुन युसूफ वर्तमान में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और ऐसी उम्मीद है कि  पार्टी अध्यक्ष पद पर उनकी ताजपोशी पर आलाकमान की मुहर भी लग सकती है.

वैसे कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के इरादे से जब शीला दीक्षित के हाथ दिल्ली कांग्रेस की बागडोर सौंपी गई थी तब हारुन युसूफ और देवेंद्र यादव सरीखे नेता कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए ताकि शीला दीक्षित को पार्टी मजबूत बनाने में खासी मदद मिल सके. लेकिन शीला दीक्षित के जुलाई में निधन हो जाने के बाद से पार्टी अध्यक्ष पद खाली पड़ा है और कई दिग्गज इस रेस में हैं. साल 1958 में जन्में हारुन युसूफ उम्र और तर्जुबे से पूरी तरह फिट हैं कि वो इस जिम्मेदारी को बखूबी संभाल सके.

राजनीतिक जीवन

छात्र जीवन से ही हारुन युसूफ राजनीति में रूचि रखते थे और पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1988 में ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस के सेक्रेट्री चुने गए. साल 1989 में हारुन युसूफ को ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस का ज्वाइंट सेक्रेट्री बनाया गया. युवावस्था से ही हारून युसूफ को कांग्रेस में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रहीं और वो बखूबी निर्वाह करते रहे.

हारुन पहले वो शख्स हैं जो वक्फ बोर्ड के चेयरमैन के तौर पर साल 1999 में चुने गए और साल 2004 तक इस पद पर बने रहे. साल 2001 में उनकी प्रतिभा और लोकप्रियता को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें दिल्ली सरकार में सिंचाई,रेवेन्यू और फ्लड कंट्रोल जैसे विभाग की जिम्मेदारी सौंपी.

हारुन युसूफ पहली बार बल्लीमारान से साल 1993 में चुनाव जीते. इसके बाद 1998 और फिर 2003 में विधायक चुने गए. साल 2003 में जब हारुन युसूफ ने शीला सरकार में परिवहन मंत्रालय संभाला तो उस वक्त दिल्ली की सड़कों पर ब्लू लाइन का कहर टूटा करता था. ब्लू लाइन बसों से होने वाले हादसों से दिल्ली हर रोज़ दहला करती थी. ऐसे में हारुन युसूफ हमेशा विपक्ष के निशाने पर होते थे और उन पर ब्लू लाइन बसों को सड़कों से हटाने का दबाव रहता था.साल 2008 में बल्लीमारान से चौथी बार से जीतने के बाद हारुन युसूफ को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग और उद्योग विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई. साल 2013 में दिल्ली की सत्ता पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दोबारा काबिज़ नहीं हो सकी. लेकिन हारुन युसूफ इस बार भी जीतकर पांचवीं बार विधानसभा पहुंचे. दिल्ली में सियासत के समीकरण बदल चुके थे. आम आदमी पार्टी राजनीतिक परिदृश्य मे आ चुकी थी. कांग्रेस ने दिल्ली में आप की सरकार को समर्थन दिया.

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आप ने दिल्ली में बीजेपी-कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया. 70 में से 67 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बना दिया. बीजेपी को 3 जबकि कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली. ऐसे में अब 5 साल बाद दिल्ली चुनाव को लेकर कांग्रेस का बहुत कुछ दांव पर है. इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी खोई हुई ज़मीन को तलाशने के लिए हाथ-पैर मार रही है और उसे जनता के बीच एक भरोसेमंद चेहरे की दरकार है जिसे हारून युसूफ अपने व्यवहार, प्रबंधन, रणनीति और तज़ुर्बे से पूरा करते दिखाई दे रहे हैं. 61 वर्षीय हारुन युसूफ नई चुनौतियां लेने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. पार्टी उन्हें विश्वसनीय मुस्लिम चेहरे के तौर पर पेश करती रही है और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की बेहतर परफॉरमेंस में उनकी भूमिका अहम रहने वाली है जिससे उनके विरोधी भी इनकार नहीं करते हैं.

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First published: January 15, 2020, 4:59 PM IST
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