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2632 दिन पुरानी आम आदमी पार्टी ने कैसे लगाई जीत की हैट्रिक?
Delhi-Ncr News in Hindi

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: February 11, 2020, 1:18 PM IST
2632 दिन पुरानी आम आदमी पार्टी ने कैसे लगाई जीत की हैट्रिक?
पॉलिटिक्स परसेप्शन यानी अवधारणा की लड़ाई है और इसमें 'आप' सफल रही है

Delhi polls result 2020: दिल्ली की सियासत की डोर संभालने के लिए जो रणनीति आम आदमी पार्टी के पास थी, उसकी नब्ज न तो कांग्रेस पकड़ पाई और न ही बीजेपी. अरविंद केजरीवाल ने पहली बार बिजली के खंभों पर चढ़ कर जो कनेक्शन जोड़ा उसका करंट अब तक बरकरार है. जानिए किस रणनीति से झाड़ू ने दिल्ली की राजनीति में विरोधियों को एक बार फिर किनारे कर दिया.

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  • Last Updated: February 11, 2020, 1:18 PM IST
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नई दिल्ली. आम आदमी पार्टी (AAP) का स्ट्राइक रेट बहुत शानदार है. नवंबर 2012 में जनांदोलन के गर्भ से निकली इस पार्टी की सफलता के आसपास भी कोई और दल नहीं ठहरता. पहले कार्यकाल में 49 दिन ही सरकार चली. लेकिन दूसरे में 67 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत मिला. अभी तक के रुझानों को देखकर लगता है कि लगातार तीसरी बार भी वे सरकार बनाने जा रहे हैं. कहा जा सकता है कि इस नई नवेली पार्टी ने पॉलिटिकल बाधा दौड़ में लगातार कामयाबी का रिकॉर्ड बनाया. दरअसल, बड़े-बड़े मुद्दों और विचारधारा वाली पार्टियों की चुनौती के बीच केजरीवाल ने वो रास्ता चुना, जिससे आम आदमी का सीधा सरोकार है. उन्होंने आम लोगों के बीच, आम लोगों की भाषा में, आम लोगों की समस्याएं उठाईं, उन पर काम शुरू किया.

वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया का कहना है कि पॉलिटिक्स परसेप्शन यानी अवधारणा की लड़ाई है और इसे बनाने में आम आदमी पार्टी जैसी नई पार्टी सफल रही है. ध्रुवीकरण के एजेंडे से दूर रहकर उन्होंने उस बड़े वर्ग को साध लिया, जो बुनियादी समस्याओं का हल चाहता है.

झाड़ू ने बुहार दिया
दिल्ली के राजनीतिक गलियारे के हर विपक्षी किरदार को झाड़ू ने बुहारकर किनारे लगा दिया है. दिल्ली की सियासत की डोर संभालने के लिए जो रणनीति आम आदमी पार्टी के पास थी, उसकी नब्ज न तो कांग्रेस पकड़ पाई और न ही बीजेपी.

केजरीवाल के कामयाबी के मंत्र
>> आप के अगुआ केजरीवाल ने राजनीति की शुरुआत में ही बिजली के खंभों पर चढ़कर लोगों के कटे हुए कनेक्शन जोड़े. इससे उन्हें समझ में आया कि बिजली को लेकर फैली अव्यवस्था का करंट बहुत तेज है. इसे अपनी ताकत बनाया.

>>पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ही फोकस किया. इन मुद्दों पर दिल्ली वाले सबसे ज्यादा परेशान रहते आए हैं. फ्री स्वास्थ्य सुविधाओं से लोगों का आकर्षण बढ़ा. कहा जा सकता है कि केजरीवाल इन मसलों को उठाते हुए जनता के नेता बन गए.>> मोटे तौर पर माना जाता है कि आम आदमी पार्टी का मतदाता किसी जमाने में कांग्रेस का वोटर हुआ करता था. आम आदमी पार्टी ने 15 से 20 हजार प्रतिमाह के इनकम ग्रुप वालों की समस्याओं को टारगेट किया, जो दिल्ली में अपनी जिंदगी चलाने के लिए रोज संघर्ष करता है.

>> आम आदमी पार्टी ने अपने पहले दो कार्यकाल में खुद को पीड़ित दिखाया. संघर्ष भी किए लेकिन 2017 के बाद से उन्होंने पीएम मोदी से सीधा टकराव टाल दिया. सीसीटीवी कैमरों की फाइल नहीं पास हुई तो एलजी ऑफिस में ही धरने पर बैठ गए. इससे उनकी छवि एक संघर्षशील नेता की बनी.

>> कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी और सपा, बसपा, आरजेडी, जेडीयू जैसे क्षेत्रीय दलों के मुकाबले उनकी सोशल मीडिया टीम बहुत अच्छी है. इसलिए अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाने में सफल रहे.

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केजरीवाल ने राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर दिल्ली पर ध्यान लगाया.


>> जिन्होंने चुनाव में पूरा देश जीत लिया था, दिल्ली जीतने के लिए उनका भी कोई फॉर्मूला काम नहीं आया. उस पर केजरीवाल का बिजली, पानी ही खरा उतरा.

>> केजरीवाल हमेशा कहते रहे कि मैं बहुत छोटा आदमी हूं, कभी कपड़ों को लेकर तड़क-भड़क नहीं. आम आदमी के मुद्दों का साथ नहीं छोड़ा. लाइफ स्टाइल नहीं बदली, पैंट शर्ट वैसे की वैसी ही है.

>> दूसरे कार्यकाल जब 70 में से 67 सीटें आईं तो कहा कि दिल्ली की जनता ने जितना बड़ा बहुमत दिया है जरा सा भी अहंकार मत करना. इसी पर वो कायम रहे.

>> केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा हार चुकी थी. वह मई 2014 में बनारस में मोदी से परास्त हो चुके थे. आए दिन कोई न कोई पार्टी छोड़कर जा रहा था. पार्टी टूट के कगार पर पहुंच गई थी. लेकिन केजरीवाल डिगे नहीं. लिहाजा 2015 के चुनाव में एक नायक के तौर पर जोरदार वापसी की.

>> कांग्रेस हो या बीजेपी नेता लगातार उन पर जहर बुझे तीर चला रहे थे, लेकिन उसे वो नजरंदाज करते रहे. चाहे अनचाहे बीजेपी ने चुनाव को केजरीवाल सेंट्रिक बनाया. बीजेपी के इस नकारात्मक प्रचार से भी उन्हें फायदा मिला.

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First published: February 11, 2020, 12:23 PM IST
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