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...तो इस वजह से BJP-अकाली के वर्षों पुराने रिश्तों में आई दरार, पढ़ें कलह की इनसाइड स्टोरी
Chandigarh-Punjab News in Hindi

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: January 24, 2020, 12:08 PM IST
...तो इस वजह से BJP-अकाली के वर्षों पुराने रिश्तों में आई दरार, पढ़ें कलह की इनसाइड स्टोरी
क्या अकाली दल और बीजेपी के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है?

दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly elections) को लेकर शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने बेशक बहाना बनाया है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के कारण अकाली दल दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ना चाहती है, लेकिन अकाली दल बीजेपी (BJP) के संबंधों के बीच आई दूरी को लेकर तमाम कयास दिल्ली चुनावों से पहले ही लगाए जा रहे थे.

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  • Last Updated: January 24, 2020, 12:08 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 (Delhi Assembly Election 2020) में कई राजनीतिक पार्टियां मैदान में ताल ठोक रही हैं. बीएसपी (BSP), एनसीपी (NCP) सहित कई क्षेत्रीय दल, दिल्ली में आप (AAP), कांग्रेस (Congress) और बीजेपी (BJP) से मुकाबला करने को तैयार हैं. बिहार की दो राजनीतिक पार्टियां आरजेडी (RJD) और जेडीयू (JDU) भी पहली बार दिल्ली में गठबंधन के साथ मैदान में उतरी हैं. कांग्रेस ने जहां आरजेडी को 4 सीटें दी हैं, तो वहीं बीजेपी ने भी अपनी सहयोगी दल जेडीयू को 2 और एलजेपी को एक सीट दी है. इस चुनाव में जो एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है, वह है शिरोमणि अकाली दल (SAD) का चुनाव न लड़ना और न ही अपने सहयोगी बीजेपी को समर्थन देना. राजनीतिक जानकार इसके कई मतलब निकाल रहे हैं. बता दें कि अकाली दल ने वैसे तो सीएए (CAA) का बहाना बना कर बीजेपी से दूरी बना ली है, लेकिन इसके सियासी मायने कुछ और निकाले जा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अकाली दल और बीजेपी के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है?

बीजेप और SAD के बीच दूरी के पीछे की वजह क्या?

दिल्ली चुनाव के दौरान अकाली दल और बीजेपी के बीच संबंधों को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं. अकाली दल ने बेशक बहाना बनाया है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के कारण अकाली दल दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ना चाहती है, लेकिन इसके तार दरअसल पंजाब की राजनीति से जुड़े हैं. वह भी अकाली के अंदर बगावत की राजनीति से. कहीं न कहीं अकाली दल के अंदर परिवारवाद को लेकर बगावत है. प्रकाश सिंह बादल ने सुखबीर बादल को पार्टी की कमान पूरी तरह से सौंप दी है, जिसे अकाली दल के कई नेताओं ने सिरे से नकार दिया है. पहले रंजीत सिंह ब्रहमपुरा और सेवा सिंह शेखवां जैसे सीनियर नेताओं ने बगावत की. लेकिन सुखबीर बादल को तब बड़ा झटका लगा जब अकाली दल में बादल के बाद सबसे वरिष्ठ नेता सुखदेव सिंह ढींढसा ने सीधे तौर पर बगावत कर दी. उन्होंने सुखबीर बादल के लीडरशीप को मानने से इंकार कर दिया. सुखदेव ढींढसा के बेटे परमिंदर ढींढसा विधायक हैं और विधानसभा में अकाली दल के विधायक दल के नेता थे. उन्होंने विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया.

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अकाली दल और बीजेपी के बीच संबंधों को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं.


अकाली दल में और तेज हो सकती है बगावत की आग

अब अकाली दल में बगावत की आग और तेज हो सकती है. इस बगावत के पीछे कहीं न कहीं सुखबीर बादल, बीजेपी के दिल्ली दरबार की शह मान रहे हैं. बादल परिवार साफ तौर पर मान रहा है कि सुखदेव सिंह ढींढसा की बगावत को बीजेपी का सहयोग मिल रहा है. SAD को यह भी शक है कि सुखदेव सिंह ढींढसा को केंद्र सरकार कई और मदद कर सकती है. ढींढसा केंद्र सरकार से जल्द से जल्द शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का चुनाव कराने की बातचीत कर रहे हैं. इस कारण भी बादल परिवार ढींढसा से खासा नाराज है.

भाजपा और शिअद के बीच बढ़ी खटासदरअसल, ढींढसा और अकाली दल के पुराने और मजबूत बागी नेता शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को भी बादल परिवार के चंगुल से निकालने की योजना बना रहे हैं. बादल परिवार को शक है कि इस योजना के पीछे भी दिल्ली की शह हो सकती है. इस कारण पिछले कुछ समय से बादल परिवार और भाजपा के बीच खटास बढ़ी है. इसका सीधा असर दिल्ली चुनाव में देखा जा रहा है, जिसके तहत अकाली दल ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है. हालांकि, पंजाब की राजनीति को लंबे समय से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, 'अकाली दल ने पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में अपना प्रभाव बढ़ाया था. जाट-सिख नियंत्रित अकाली दल ने दिल्ली के खत्री सिखों में अपना प्रभाव बढ़ा कर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी पर भी अपना दबदबा बनाया और सरना गुट को वहां से बाहर कर दिया. लेकिन हाल के दिनों में दिल्ली के सिखों पर अकाली दल के प्रभाव में कमी देखी गई है. अकाली दल को खुद अहसास हो रहा है कि शायद इस बार दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार बन जाए और सिख वोट अकाली दल और भाजपा को ट्रांसफर न हो पाए. वैसे में अकाली दल ने चुनाव में भाग न लेने का फैसला लेकर अपनी फजीहत होने से बचाई है.'

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अकाली सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा. (फोटो साभार: Facebook)


हरियाणा मॉडल पर बीजेपी काम कर रही है?

पांडेय आगे कहते हैं, 'जिस तरह से कुछ साल पहले हरियाणा में बीजेपी ने ओमप्रकाश चौटाला से दूरी बनाई थी, उसी तरह बीजेपी समय के साथ बादल परिवार से भी दूरी बना सकती है. पिछले लोकसभा चुनाव में भी अकाली दल को लेकर पंजाब के लोगों में काफी नाराजगी थी, जिसका असर चुनाव परिणाम पर दिखा.' दोनों पार्टियों के बीच आई दूरी के पीछे यह भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है.

अकाली दल भी खुद बना रहा दूरी
अकाली दल के सूत्रों के मुताबिक पार्टी ने अपना आंतरिक सर्वे करवाया था, उसमें यह पता चला था कि काफी मशक्कत के बाद भी पार्टी के लिए राजौरी गार्डेन की सीट जीतना मुमकिन नहीं है. ऐसे में अकाली दल ने भाजपा से दिल्ली में दूरी बना ली. हालांकि अकाली दल में इस बात से भी नाराजगी है कि भाजपा हाईकमान उन्हें अब वैसा तवज्जो नहीं दे रहा, जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पार्टी को मिलता था. बादल परिवार लंबे समय से अकाली दल और भाजपा के बीच मजबूत रिश्तों का उदाहरण देता रहा है. लेकिन केंद्र की मौजूदा सरकार में बादल परिवार की बहू हरसिमरत कौर बादल को काफी महत्वहीन विभाग मिला है. इससे अकाली दल को अहसास हो गया है कि वर्तमान केंद्र सरकार में उसकी अहमियत वो नहीं है, जो वाजपेयी के कार्यकाल में थी.

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First published: January 24, 2020, 10:04 AM IST
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