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दिल्ली चुनावः पर्दे के पीछे की ताकत बने PK, क्या बंगाल में भी दिखेगा असर!
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News18India
Updated: February 12, 2020, 9:31 PM IST
दिल्ली चुनावः पर्दे के पीछे की ताकत बने PK, क्या बंगाल में भी दिखेगा असर!
दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल की चुनावी जीत के पीछे रहे प्रशांत किशोर. (फाइल फोटो)

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत के पीछे PK की चुनावी रणनीतियों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे पहले पीएम नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जगन मोहन रेड्डी, कैप्टन अमिरंदर सिंह जैसे नेताओं के चुनाव अभियानों में भी उनका नाम आ चुका है.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 9:31 PM IST
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नई दिल्ली. 2014 के आम चुनावों के बाद देश की सियासत में जो भी परिवर्तन आया हो, राजनीतिक दलों के साथ चुनावों से पहले चुनावी रणनीतिकार का होना अनिवार्य जैसा जरूर माना जाने लगा है. संयुक्त राष्ट्रसंघ में काम करने का अनुभव रखने और पीएम नरेंद्र मोदी के चुनाव रणनीतिकार के रूप में पहली बार पहचाने जाने वाले प्रशांत किशोर उर्फ PK ऐसे ही चुनाव विश्लेषक हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत के पीछे PK की चुनावी रणनीतियों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे पहले पीएम नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जगन मोहन रेड्डी, कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे नेताओं के चुनाव अभियानों में भी उनका नाम आ चुका है. ऐसे में सीधा सवाल यही आता है कि क्या PK सियासत में सफलता का गारंटी-कार्ड हैं, जिसके इस्तेमाल से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी जा सकती हैं या फिर वे ऐसे जादूगर हैं, जिनके पिटारे में चुनावी-जीत के फॉर्मूले होते हैं.

मोदी से शुरुआत और सफल होने लगे PK
साल 2012 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने देश के अगले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया और उनके प्रचार अभियान की बागडोर संभाली प्रशांत किशोर ने. नरेंद्र मोदी के पक्ष में 'हवा' बनाने से लेकर उन्हें पीएम पद पर बैठाने तक किशोर, बीजेपी के साथ रहे. लेकिन मोदी के पीएम बनने के कुछ दिन बाद ही बीजेपी के साथ किशोर के रिश्ते में खटास आने लगी और वे अलग हो गए. इसके कुछ ही दिनों बाद प्रशांत किशोर के मोदी-विरोध में अलग हुए जदयू नेता और बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ जुड़ने की खबरें आईं. 2014 के आम चुनाव के बाद मोदी-लहर पर सवार भाजपा को 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पीके और नीतीश की जोड़ी ने पहला झटका दिया.

बिहार के बाद PK की असल परीक्षा यूपी में 2017 के विधानसभा चुनावों में हुई, जहां वे कांग्रेस के साथ थे. यूपी में लंबे अर्से से सुस्त पड़ी कांग्रेस को PK ने 'खाट पे चर्चा' और समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ के बाद 'यूपी के लड़के' जैसे चुनावी अभियानों से जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे. चुनाव-मैनेजमेंट की दो सफलताओं के बाद PK को यह पहला बड़ा झटका लगा था. लेकिन कांग्रेस से वे अलग नहीं हुए. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह से जुड़े और वहां उनका 'कॉफी विद कैप्टन' अभियान चर्चा में रहा. यहां पर कांग्रेस को कामयाबी मिली. इसके बाद PK की सबसे ज्यादा चर्चा जहां हुई, वह था दक्षिण भारत का राज्य आंध्र प्रदेश. आंध्र में PK ने कांग्रेस से अलग हुए जगन मोहन रेड्डी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आप याद करें जगन की पदयात्रा को और फिर आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जगन रेड्डी की पार्टी ने जिस अंदाज में बंपर जीत हासिल की, उससे PK के सियासी फॉर्मूले को और बल मिला.

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पीएम नरेंद्र मोदी के साथ 2014 के पहले जुड़े थे प्रशांत किशोर. (फाइल फोटो)


इसके बाद प्रशांत किशोर ने जदयू की सदस्यता ले ली, लेकिन उन्होंने मूल काम नहीं छोड़ा. जदयू के उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रशांत किशोर के कभी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस तो कभी अरविंद केजरीवाल की आप और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के चुनाव अभियान से जुड़े होने की चर्चाएं होती रहीं. इस बीच केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन कानून के लागू करने और इसके खिलाफ ट्वीट करने को लेकर PK को जदयू ने पार्टी से निकाल दिया. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने इन चर्चाओं को लेकर बयान भी दिया, जिससे ये संकेत साफ गया कि जदयू में होने के साथ-साथ PK का दूसरे दलों से जुड़ाव, पार्टी के नेताओं को रास नहीं आ रहा है. बहरहाल, PK इन सियासी उठा-पटकों से वैसे ही उबरे, जैसे किसी कॉर्पोरेट कंपनी का कर्मचारी एक नौकरी छोड़कर दूसरे में जाते हुए महसूस करता है. आम आदमी पार्टी के साथ उन्होंने दिल्ली चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दिल्ली में चला बिहार वाला फॉर्मूलाबिहार में 2015 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू नेता नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर की टीम की सहायता से भाजपा को चुनाव में पटखनी दी थी. उस चुनाव में भी PK ने नीतीश को पीएम नरेंद्र मोदी के मुकाबले सौम्य लेकिन मुद्दों पर गंभीरता के साथ बात रखने वाले नेता के रूप में पेश किया था. पीएम मोदी की रैली में बिहार-पैकेज को लेकर लगे नारे और उस पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का जवाब वाला वीडियो, आपको याद होगा. वीडियो में लालू ने अपने अंदाज में पीएम मोदी के वादों की मिमिक्री कर के दिखाई थी. लेकिन नीतीश कुमार ने तब भी संयत रहकर पीएम मोदी को जवाब दिया था. दिल्ली के चुनाव में भी अरविंद केजरीवाल ने पूरे प्रचार अभियान के दौरान कभी पीएम मोदी के ऊपर सीधा हमला नहीं किया. बल्कि पीएम मोदी और अन्य बीजेपी नेताओं के आरोपों का केजरीवाल ने संयत होकर जवाब दिया. अपनी बात रखी, लेकिन शुद्ध सियासी अंदाज में, न कि भाजपा की आक्रामक शैली को अपनाकर. केजरीवाल का पुराना रिकॉर्ड देखते हुए PK ने उनका सियासी मेक-ओवर किया, जिसका परिणाम 11 फरवरी को चुनावी नतीजों के रूप में दिखा.

किसी राजनैतिक शख्सियत का सियासी मेक-ओवर करना आसान नहीं होता. पार्टी और उसकी विचारधारा को साथ रखते हुए, उस शख्सियत की सार्वजनिक छवि में मीन-मेख जैसा परिवर्तन करना, चुनौती भरा है. PK इस काम में माहिर हैं. पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चले आक्रामक चुनाव प्रचार अभियानों को याद करें और उसके साथ-साथ चुटीले नारे या स्लोगन, PK के तरकश में हमेशा होते हैं. पीएम मोदी के चुनाव अभियान के समय 'अबकी बार मोदी सरकार' हो या नीतीश कुमार के लिए 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो' और उत्तर प्रदेश के चुनाव में 'यूपी के लड़के' जैसे नारे, इसके प्रमाण हैं. बिहार के चुनाव में 'घर-घर नीतीश कुमार' का स्लोगन भी काफी प्रभावशाली रहा था. दिल्ली में आम आदमी पार्टी का 2020 का स्लोगन 'लगे रहो केजरीवाल' PK के चुनावी-नारों की अगली कड़ी थी. इस नारे ने बीजेपी के 'देश बदला, अब दिल्ली बदलो' को पछाड़ दिया.

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बिहार चुनाव में नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की जोड़ी ने बीजेपी को चौंकाया था. (फाइल फोटो)


बंगाल में होगी अगली परीक्षा
PK के चुनाव अभियानों का रिपोर्ट कार्ड देखें, तो अभी तक कुल 7 अभियान नजर में आते हैं. 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव से लेकर 2014 में पीएम मोदी का अभियान, 2015 में नीतीश कुमार, 2017 में यूपी में राहुल गांधी और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ वे और उनकी कंपनी I-Pac जुड़ी रही. इसके बाद 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के साथ भी पीके जुड़े थे. 2020 में वे दिल्ली में आप के साथ हैं. इन सबमें यूपी का चुनाव छोड़ दें, तो बाकी सभी में PK को सफलता हाथ लगी. लेकिन इसके बाद जिस राज्य में उनके सामने बड़ी चुनौती है, वह पश्चिम बंगाल है, जहां 2021 में विधानसभा के चुनाव होने हैं.

पहले नीतीश कुमार और फिर अरविंद केजरीवाल के बाद क्या PK ममता बनर्जी के चुनाव अभियान का तरीका बदल सकेंगे, यह बड़ा सवाल है. क्योंकि ममता बनर्जी की छवि आक्रामक नेता की रही है. बंगाल में जब से बीजेपी ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है, उसके बाद डीजीपी के बचाव में धरना देने का मामला हो या फिर CAA को लेकर धरना-प्रदर्शनों का, ममता बनर्जी अपने आक्रामक तेवरों और विपक्षी पर सीधा हमला करने वाली नेत्री के रूप में जानी जाती रही हैं. क्या PK उन्हें भी वही घुट्टी पिलाएंगे, जो उन्होंने नीतीश या केजरीवाल को पिलाई? या फिर ममता बनर्जी की तेवर वाली छवि के साथ बंगाल में बीजेपी के खिलाफ चुनावी जंग में PK कोई नया फॉर्मूला अपनाएंगे? ये चंद सवाल हैं जो अभी से उठ रहे हैं.

नेपथ्य में रहकर बड़ा खेल
प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष, उनका नेपथ्य में रहना है. वे जिस पार्टी या नेता के पीछे होते हैं, उसकी सियासी गतिविधियों से ये अंदाजा लग पाता है कि इसके पीछे PK हैं. वे खुद परे रहकर अपने नेता को मीडिया में हमेशा बनाए रखने की रणनीति पर काम करते हैं और इसमें सफल भी होते हैं. मीडिया किस बात को तवज्जो देगा या किस बयान का फौरी जवाब दिया जाना चाहिए, PK बखूबी जानते हैं. हालांकि कई जानकारों का यह भी कहना है कि वे अभी तक उन्हीं नेताओं के साथ रहकर सफल हो पाए हैं, जो सत्ता में हैं या फिर उस पार्टी के साथ जिसकी जीत की उम्मीद हो. इस धारणा के पीछे उदाहरण के तौर पर राहुल गांधी के साथ यूपी में उनकी नाकामी को रखा जाता है. लेकिन, इन सबसे इतर पिछले 6 साल में कोई ऐसा चुनाव नहीं हुआ है, जिसकी चर्चा में PK न आए हों. आज जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी जीत का जश्न मना रही है या आने वाले बिहार और बंगाल के चुनाव की बातें हो रही हैं, PK इन चर्चाओं के केंद्र में हैं. देखना होगा कि एमके स्टालिन की डीएमके को वह कैसा संबल देते हैं. बिहार में अब जबकि PK किसी दल के साथ नहीं हैं, क्या 'गजब' करते हैं. या फिर बंगाल में ममता-दी के साथ उनकी जोड़ी भाजपा की महत्वाकांक्षा को थाम पाती है या नहीं.

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First published: February 12, 2020, 6:08 PM IST
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