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देश भर में समान नागरिक संहिता की मांग वाली याचिका पर आज सुनवाई करेगा दिल्ली हाईकोर्ट
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News18Hindi
Updated: February 19, 2020, 8:32 AM IST
देश भर में समान नागरिक संहिता की मांग वाली याचिका पर आज सुनवाई करेगा दिल्ली हाईकोर्ट
समान नागरिक संहिता की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट आज सुनवाई करेगा.

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) बुधवार को देश भर में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करेगा. मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है.

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  • Last Updated: February 19, 2020, 8:32 AM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) बुधवार को देश भर में समान नागरिक संहिता (Common Civil Code) की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करेगा. मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है. समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ एक पंथनिरपेक्ष (Secular) कानून होता है जो सभी पंथ के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है. दूसरे शब्दों में, अलग-अलग पंथों के लिए अलग-अलग सिविल कानून न होना ही 'समान नागरिक संहिता' की मूल भावना है. सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2019 में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि 1956 में हिंदू लॉ बनने के 63 साल बीत जाने के बाद भी पूरे देश में समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के प्रयास नहीं किए गए.






क्या है समान नागरिक संहिता?
भारतीय संविधान के भाग 4 में नीति निदेशक तत्त्वों का वर्णन है. इसके तहत अनुच्छेद 44 के अनुसार भारत के समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए. इसका अर्थ यह है कि भारत के सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून बनाया जाना चाहिए. संविधान के संस्थापकों ने राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों के माध्यम से इसको लागू करने को कहा है. इसके अंतर्गत व्यक्तिगत कानून, संपत्ति संबंधी कानून और विवाह, तलाक तथा गोद लेने से संबंधित कानूनों में मतभिन्नता है.

आपको जानकारी के लिए बता दें कि, भारत में व्यक्तिगत कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं. हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्मों पर हिंदू कोड लागू होता है, जबकि मुस्लिम तथा ईसाई धर्मों के अपने अलग व्यक्तिगत कानून हैं. मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है.

क्या है बहुचर्चित शाहबानो बेगम केस
'मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम केस', जो 'शाहबानो केस' के नाम से चर्चित है. शाहबानो एक 62 वर्षीय मुस्लिम महिला थीं, जिनके 5 बच्चे थे. उन्हें 1978 में पति ने शादी के 40 साल बाद तलाक दे दिया था. अपनी और अपने बच्चों के जीवनयापन के लिए शाहबानो पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए अदालत पहुंचीं. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 1985 में पहुंचा. धर्म, जाति या संप्रदाय आधारित भेदभाव के बिना लागू होने वाली अपराध दंड संहिता की धारा 125 के तहत कोर्ट ने निर्णय दिया था.

संसद को दिया था यह कानून बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को जीवन निर्वाह के लिए भत्ता दिया जाए. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ ने कहा कि समान नागरिक संहिता से भारतीय कानून में व्याप्त असमानता दूर होगी जिससे राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मदद मिलेगी. उसी फैसले के समय सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून बनाने का निर्देश दिया था.

गोवा में लागू है समान नागरिक संहिता
देश की आजादी के बाद गोवा ने पुर्तगाली नागरिक संहिता को अपना लिया था, जिसके कारण गोवा के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू है. इस संहिता के तहत पति या पत्नी द्वारा अधिग्रहीत सभी परिसंपत्तियों में दोनों का संयुक्त रूप से स्वामित्व होता है. यहां तक कि माता-पिता भी अपने बच्चों को अपनी संपत्ति से बेदखल नहीं कर सकते, उन्हें अपनी संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा अपने बच्चों को देना ही पड़ता है. साथ ही वे मुस्लिम व्यक्ति जिन्होंने गोवा में अपनी शादी का पंजीकरण करवाया है उन्हें बहुविवाह की अनुमति नहीं है.

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First published: February 19, 2020, 7:30 AM IST
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