दिल्ली हिंसा: स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन को क्लीन चिट, हाईकोर्ट ने माना- इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर दिया था आदेश
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दिल्ली हिंसा: स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन को क्लीन चिट, हाईकोर्ट ने माना- इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर दिया था आदेश
स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन को उनके आदेश के लिए होईकोर्ट ने दी क्लीन चिट

स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन (Special Police Commissioner Praveen Ranjan) ने अपने आदेश में अपनी टीम को कहा था कि दिल्ली के नार्थ ईस्ट हिस्से में हुई हिंसा की जांच के दौरान किसी की गिरफ्तारी को लेकर ज्यादा सचेत और सावधानी बरते.

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  • Last Updated: August 7, 2020, 1:27 PM IST
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दिल्ली. देश की राजधानी दिल्ली में हुई हिंसा के मामले में हाइकोर्ट ने स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन (Special Police Commissioner Praveen Ranjan) को उनके 8 जुलाई के आदेश के लिए क्लीन चिट दे दी है. हाइकोर्ट ने माना कि इंटेलिजेंस इनपुट (Intelligence Input) के आधार पर वह आदेश पारित किया गया था. स्पेशल पुलिस कमिश्नर प्रवीर रंजन ने अपने आदेश में अपनी टीम को कहा था कि दिल्ली के नार्थ ईस्ट हिस्से में हुई हिंसा की जांच के दौरान किसी की गिरफ्तारी को लेकर ज्यादा सचेत और सावधानी बरते. दंगे में मारे गए दो लोगों के परिवार वालों की ओर से पुलिस अधिकारी के इस लेटर पर सवाल उठाया गया था.

बता देंकि याचिकाकर्ताओं के वकील महमूद प्राचा ने पुलिस को निर्देश देने का अनुरोध किया था कि वह विशेष आयुक्त प्रवीर रंजन के आठ जुलाई का आदेश और अधिकारियों द्वारा दिए गए ऐसे आदेशों को प्रस्तुत करे जोकि पुलिस अधिकारियों की जांच के काम में एक गैरकानूनी और अवैध हस्तक्षेप करता है.

याचिका में दावा किया गया था कि, 'इन दबाव में स्पष्ट रूप से, प्रतिवादी संख्या 4 (विशेष आयुक्त) ने 8 जुलाई को एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि कुछ हिंदू व्यक्तियों की गिरफ्तारी के खिलाफ हिंदू समुदाय में गुस्सा व्याप्त था और जांच अधिकारियों को निर्देश देना कि भविष्य में गिरफ्तारी करते समय उन्हें सतर्क रहना चाहिए और व्यक्तियों की गिरफ्तारी विशेष लोक अभियोजकों के साथ साक्ष्यों की चर्चा के बाद ही की जानी चाहिए, जिन्हें इन मामलों में पुलिस का प्रतिनिधित्व करने के लिए अवैध रूप से नियुक्त किया गया है.'



याचिका में इस तरह के गैरकानूनी आदेशों को रद्द करने का भी अनुरोध किया गया था ताकि कानून के दायरे में जांच हो सके. हालांकि, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस याचिका को दायर करने के बजाय याचिकाकर्ता आरटीआई आवेदन के जरिए आठ जुलाई का आदेश प्राप्त कर सकते थे और पहले उन्हें दस्तावेज को पढ़ लेना चाहिए था.
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