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दिल्ली हिंसाः जुनून उतरने के बाद जागी इंसानियत, पढ़ें GTB अस्पताल से ग्राउंड रिपोर्ट
Delhi-Ncr News in Hindi

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: February 26, 2020, 12:55 PM IST
दिल्ली हिंसाः जुनून उतरने के बाद जागी इंसानियत, पढ़ें GTB अस्पताल से ग्राउंड रिपोर्ट
अस्पताल में उठने वाले सभी हाथ मानवता को बचाने की तस्वीर पेश कर रहे थे.

दिल्ली में हुई हिंसा की घटनाओं के दौरान गोली चलाने और गोलियां खाने वालों के चेहरे मैदान पर भले ही अलग-अलग नजर आ रहे हों, मगर अस्पताल में उठने वाले सभी हाथ मानवता को बचाने की तस्वीर पेश कर रहे थे. पढ़ें GTB अस्पताल की आंखो देखी रिपोर्ट.

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  • Last Updated: February 26, 2020, 12:55 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली को किस जुनून ने अपनी जद में ले लिया? क्या हो गया? कैसे हुआ? ये वो तमाम प्रतिक्रियाएं हैं, जो रविवार से राष्ट्रीय राजधानी के कुछ इलाकों में हो रही हिंसा की घटनाओं के बरक्स आ रही हैं. ये आप अलग-अलग जगहों पर देख सकते हैं और पढ़ सकते हैं, लेकिन गुरु तेगबहादुर अस्पताल (GTB Hospital) में हम पहुंचे तो देखा कि सभी भाई-भाई हैं. हिंसा का जुनून उतर चुका है और इंसानियत जिंदा हो उठी है. मैं अपने साथी नासिर हुसैन के साथ जीटीबी अस्पताल पहुंचा तो वहां का दृश्य दिल्ली के दिलवालों का ही लग रहा था. कहीं से किसी घायल की आवाज आती थी, तो कोई नहीं पूछता था कि तुमने लड़ाई क्यों की, कौन किस तरफ था? अस्पताल के अंदर पाले खत्म हो गए थे, कोई दीवार नहीं थी. उत्तरी-पूर्वी इलाके के जाफराबाद, मौजपुर, चांदबाग और बाबरपुर इलाकों में स्थिति कितनी खतरनाक थी, इसका हाल मैंने और मेरे सहयोगी ने मंगलवार को इलाके के सबसे बड़े अस्पताल गुरु तेगबहादुर अस्पताल में जाकर देखा.

दिल्ली के इन इलाकों में हुई हिंसा की घटनाओं के दौरान गोली चलाने और गोलियां खाने वालों के चेहरे मैदान पर भले ही अलग-अलग नजर आ रहे हों, मगर अस्पताल में उठने वाले सभी हाथ मानवता को बचाने की तस्वीर पेश कर रहे थे. अस्पताल के गेट पर लाए गए घायल नौजवानों को भीतर तक स्ट्रेचर पर ले जाने वाले, किसी की जाति या धर्म नहीं पूछ रहे थे. वे उन निर्दोष मरीजों को बस डॉक्टर तक पहुंचा रहे थे, ताकि जल्द से जल्द उनका इलाज हो सके.

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अस्पताल के गेट पर लाए गए घायल नौजवानों को भीतर तक स्ट्रेचर पर ले जाने वाले, किसी की जाति या धर्म नहीं पूछ रहे थे.


ये कहानी कोई फिल्मी नहीं, बल्कि आंखों देखी हकीकत है, जो मैंने अपने सहयोगी नासिर के साथ दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में देखी. कैसे गुमराह युवकों के साथ-साथ निर्दोष युवक भी इस हिंसा की चपेट में आ कर घायल हो रहे हैं. ये युवक हिंदू हों या मुसलमान जब अस्पताल पहुंचते हैं, तो मजहब आड़े नहीं आता है. हर वर्ग के लोग इनकी मदद के लिए उठ खड़े होते हैं. जीटीबी अस्पताल पहुंचते ही मेरा पीड़ादायक अनुभव शुरू हुआ. सबसे पहले मैं अस्पताल के आपातकालीन विभाग में अस्पताल के एमएस ऑफिस के दरवाजे से अंदर गया. अंदर जाने के बाद जो स्थिति देखी वह काफी हैरान करने वाली थी.



अस्पताल में हाल जानने की सुध
हम दोनों को घायलों की स्थिति जानने की जल्दबाजी थी, लेकिन अस्पताल का दृश्य बेचैनी भरा था. दिन के लगभग 1.35 बजे हम जीटीबी अस्पताल पहुंचे थे. वहां देखा, अपनों की खैर जानने के लिए पहुंचे हुए बदहवास लोग और चारों तरफ चहलकदमी करते पुलिस के जवान और अफसर. किसी घायल को कोई मोटरसाइकिल से ला रहा था, तो किसी को एंबुलेंस से हॉस्पिटल लाया जा रहा था. अस्पताल पहुंचते ही घायलों को फौरन इमरजेंसी पहुंचाया जा रहा था. एक कानून के खिलाफ गुमराह या उसके समर्थन में अंधे हुए लोगों के बीच की रंजिश का मंजर सिर्फ मैदान तक ही था, अस्पताल में तो मानवता सबसे ऊपर दिख रही थी. न किसी घायल का धर्म पूछा जा रहा था और न किसी को इस बात की फिक्र थी कि घायल को इमरजेंसी तक ले जाने वाला किस मजहब का है.

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अपनों की खैर जानने के लिए पहुंचे हुए बदहवास लोग और चारों तरफ चहलकदमी करते पुलिस के जवान और अफसर.


हिंसाग्रस्त इलाकों के तनाव का दिखा असर
सोमवार शाम को हिंसक घटनाएं होने के बाद मंगलवार पूरे दिन जाफराबाद, मौजपुर, चांदबाग और बाबरपुर, भजनपुरा, बृजपुरी और गोकुलपुरी में दहशत का माहौल बना रहा. जीटीबी अस्पताल पहंच रहे ज्यादातर लोग इसी इलाके के थे. हमने जब जीटीबी अस्पताल में मौजूद एक पुलिस अधिकारी से बात की तो उनका कहना था कि अभी हालात नियंत्रण में है. इसके बावजूद घायलों का अस्पताल आना लगातार जारी था. स्थिति गंभीर थी. इमरजेंसी वार्ड में किसी घायल के आने की खबर लगते ही आपातकालीन वार्ड में मौजूद सभी लोग साइड हो जाते, ताकि स्ट्रेचर जल्द से जल्द बाहर लाया जा सके और घायल का इलाज हो सके.

जीटीबी अस्पताल में आने वाला हर शख्स परेशान था, लेकिन अस्पताल में मौजूद लोगों की परेशानी यह थी कि घायल का इलाज कैसे और कितनी जल्दी हो. हर घायल खून से लथपथ नजर आ रहा था. किसी के शरीर पर कपड़े नहीं थे तो कोई बेसुध था. किसी को उसके दोस्त लेकर आए थे, तो किसी को पुलिस एंबुलेंस में लेकर आ रही थी. एक एंबुलेंस आती और मरीज को उतार कर तुरंत वापस लौटती दूसरे घायल को लाने के लिए. स्थिति देख कर कई लोगों को रोना आ रहा था. बहुतों को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर देश की राजधानी में ये हो क्या रहा है?

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मेरा धर्म पूछा और पीटने लगे
मेरे सहयोगी नासिर ने एक घायल लड़के से बात की. जार-जार रो रहे उस लड़के से मैंने पूछा कि वह कैसे हिंसा की चपेट में आ गया? लड़के ने कहा, 'मैं ठेला चलाता हूं. मेरे साथ एक और लड़का था. पुल के पास हमको कुछ लोगों ने घेर लिया और पूछा किस धर्म के हो? हम दोनों ने जैसे ही अपना धर्म बताया तो वे लोग मुझे और मेरे दोस्त को पीटने लगे. हमलोगों को अधमरा छोड़ कर वे लोग जब आगे बढ़ गए, तब हम लोग किसी तरह पुलिस जिप्सी के पास पहुंचे और उनसे अस्पताल पहुंचाने की गुहार लगाई. पुलिस हम दोनों को लेकर तुरंत ही अस्पताल के लिए चल दी.' अस्पताल में ही मौजूद एक और प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि बीती रात तीन बजे तक घायलों का आना जारी था. सुबह 8 बजे के बाद तो यह संख्या और बढ़ गई.

फुरकान के भाई ने बयां किया दर्द
मरीजों का हाल देखने के बाद हम दोनों अस्पताल के शवगृह की तरफ चले. वहां जाने के दौरान एक डॉक्टर से बात करने की कोशिश की. डॉक्टर ने कहा कि घायलों की संख्या सुबह में कम थी, लेकिन दोपहर बाद बढ़ गई है. अधिकतर गोली लगने से घायल हुए हैं. शव गृह जाने पर सबसे पहले हमारी मुलाकात मोहम्मद इमरान नाम के शख्स से हुई, जो शवगृह के सामने कुछ लोगों से बात कर रहा था. इमरान ने बताया कि हिंसा की वजह से उसके छोटे भाई फुरकान की मौत हो गई है. इमरान ने बताया कि मौत से कुछ देर पहले ही उसने भाई (फुरकान) को घर छोड़ा था. घर से निकलने के कुछ ही देर बाद इमरान के एक दोस्त ने उसे फोन पर फुरकान को गोली लगने की सूचना दी. इमरान ने बताया, 'मैंने फोन काट कर फुरकान के नंबर पर डायल किया, तो फोन नहीं उठा. मैं स्कूटी लेकर तुरंत ही निकल पड़ा. हमें पता चला कि फुरकान तो अपने बच्चों के लिए खाना लेने गया था. मेरे भाई को जांघ में गोली लगी थी, वह अगर समय पर अस्पताल पहुंच जाता तो बच जाता, लेकिन खून ज्यादा निकल गया और अस्पताल पहुंचने में भी देर हो गई. अभी तक मेरे भाई का शव मुझे नहीं दिया जा रहा है.'

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मोहम्मद इमरान ने बताया कि हिंसा की वजह से उसके छोटे भाई फुरकान की मौत हो गई है.


बेटा नहीं रहा, दुनिया उजड़ गई
शवगृह में ही बाबूनगर मुस्तफाबाद के रहने वाले हरि सिंह सोलंकी से मुलाकात हुई. हरि सिंह सोलंकी ने इस हिंसा में अपना जवान बेटा खो दिया है. हरि सिंह के बेटे राहुल सोलंकी की इस हिंसा में मौत हो गई है. हरि सिंह ने कहा, 'दुख को सहन करने की सांत्वना देना तो दूर, दिल्ली पुलिस और हॉस्पिटल प्रशासन सोमवार रात से उनके बेटे की डेडबॉडी तक नहीं दे रहे हैं. मेरा एक बेटा और बेटी है. दोनों की शादी अप्रैल में होने वाली थी. इसकी तैयारियां चल रही थीं, लेकिन हमारी खुशियों को दंगाइयों की नजर लग गई और मेरी दुनिया उजड़ गई.' हमारे सामने ही हरि सिंह ने वहां मौजूद दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी से बेटे की डेडबॉडी दिलाने की गुहार भी लगाई. उस समय हिंसा में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की बॉडी भेजी जा रही थी. हरि सिंह सोलंकी ने हमसे सवाल किया कि जब शहीद रतनलाल का पोस्टमॉर्टम बिना बोर्ड के हुआ है तो फिर उनके बेटे के लिए बोर्ड क्यों?

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दिल्ली पुलिस के हवलदार शहीद रतनलाल की बॉडी के साथ खड़े पुलिस अधिकारी


दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में मैं अपने सहयोगी नासिर हुसैन के साथ तकरीबन 3.30 घंटे तक रहा. अस्पताल के आपातकालीन विभाग में जब तक रहा, हर 10 मिनट के बाद एक घायल मरीज पहुंच रहा था. फुरकान का भाई हो या राहुल सोलंकी के पिता, सौहार्द का माहौल खराब होने की पीड़ा हर किसी के चेहरे से झलक रही थी. आपको बता दें कि दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध और समर्थन कर रहे लोगों के बीच भड़की हिंसा में बुधवार तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है और 130 से ज्यादा लोग घायल हैं.

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First published: February 26, 2020, 12:55 PM IST
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