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आखिर इतने बेचैन क्यों है प्रशांत किशोर?
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Anil Rai | News18India
Updated: January 27, 2020, 8:54 PM IST
आखिर इतने बेचैन क्यों है प्रशांत किशोर?
प्रशांत किशोर लगातार बीजेपी नेताओं के खिलाफ ट्विट कर रहे हैं.

प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) पिछले एक महीने से लगातार भाजपा (BJP) के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं. अब तो उन्‍होंने राजनीतिक मर्यादा की सीमा लांघते हुए अपनी पार्टी और गठबंधन के खिलाफ वोट (Vote) करने की अपील कर दी है.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 8:54 PM IST
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नई दिल्‍ली: जेडीयू (JDU) नेता और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) इन दिनों काफी बेचैन दिख रहे हैं, पिछले करीब एक महीने में प्रशांत किशोर के ट्विटर हैंडल को देखें तो साफ पता चलता है कि पीके एक के बाद एक लगातार भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) के नेताओं के खिलाफ ट्वीट कर रहे हैं. प्रशांत कहते हैं कि जेडीयू को बिहार (Bihar) में बीजेपी (BJP) से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए फिर कहते हैं, फिर जेडीयू सुप्रीमों नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के बिहार में सीएम फेस (CM Face) बताते हैं बाद सुशील मोदी (Sushil Modi) के पुराने वीडियो के बहाने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हैं और अब तो उन्होंने अमित शाह (Amit Shah) के बयान का विरोध करने के बहाने अपनी बी पार्टी और गठबंधन को हराने की अपील कर दी है.

अमित शाह के विरोध के बहाने क्या पीके ने पार की लक्ष्मण रेखा
दिल्ली में बीजेपी और जेडीयू पहली बार गठबंधन में सीटे का बटावारा कर चुनाव लड़ रहे हैं , ऐसे में प्रशांत किशोर की टिप्पणी को ठीक से समझें तो साफ है अपने ही पार्टी और गठबंधन के खिलाफ वोट की अपील कर पीके ने राजनीति को वो लक्ष्मणरेखा पार कर दी है जिसे पार्टी वीरोध कहते हैं हालांकि इन सबके बाद भी जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस पूरे मामले पर चुप है । नीतीश कुमार गाहे-बगाहे इशारों इशारों में प्रशांत किशोर के बयानों का खंडन तो कर देते हैं लेकिन जिस तरह पवन वर्मा के खिलाफ उन्होंने कड़ी शब्दों का प्रयोग किया उस तरह की तल्ख टिप्पणी वो प्रशांत किशोर के खिलाफ करने से अब तक बचते नजर आ रहे हैं

पीके के इन बयानों के पीछे क्या है असली वजह

पीके को नीतीश कुमार के मुख्य रणनीतिकारों में से एक माना जाता है.  प्रशांत किशोर लगातार भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बयान बाजी कर रहे हैं, लेकिन नीतीश कुमार कह रहे हैं कि गठबंधन में सब कुछ ठीक है. यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कह चुके हैं कि भारतीय जनता पार्टी और जेडीयू में सब ठीक-ठाक है और आने वाले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमारी ही बीजेपी-जेडीयू गठबंधन का सीएम चेहरा होंगे. साफ है प्रशांत जो बोल रहे हैं वह पार्टी लाइन नहीं है, लेकिन फिर पीके ऐसा बोल क्यों रहे हैं. क्या प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के इशारे पर बयान दे रहे हैं या पीके और नीतीश में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है.

राहुल-सोनिया की तारीफ कर चुके हैं पीके
इस बात को समझने के पहले अगर हम प्रशांत किशोर के ट्विट को देखें तो पीके राहुल गांधी और सोनिया गांधी की सीएए पर स्टैंड की तारीफ भी कर चुके हैं. प्रशांत किशोर कि आधिकारिक तौर पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी के राजनीतिक रणनीतिकार हैं और ये  दोनों वो चेहरे हैं, जिनका नीतीश कुमार से आधिकारिक तौर पर विरोध है. बिहार में जहां कांग्रेस नीतीश के खिलाफ आरजेडी गठबंधन का हिस्सा है, वहीं ममता बनर्जी की पूरी राजनीत भारतीय जनता पार्टी के विरोध की राजनीति है, जबकि नीतीश उसके समर्थन में सरकार चला रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशांत किशोर इन दोनों की सवारी में अब बैलेंस बनाने में लगे हैं या पीके नीतीश कुमार को छोड़ने के लिए रास्त बानने में लगे हैं.प्रशांत किशोर को लेकर जेडीयू आलाकमान खामोश क्‍यों?
ये सवाल नीतीश कुमार की ओर से भी है जिस तरह नीतीश कुमार ने पवन वर्मा को साफ संकेत दिया उसी तरह का संकेत नीतीश कुमार प्रशांत किशोर को क्यों नहीं दे पा रहे हैं. हालांकि नीतीश कुमार के करीबी समझे जाने वाले ललन सिंह लगातार प्रशांत किशोर के बयानों का खंडन करते आ रहे हैं और जरूरत पड़ने पर प्रशांत किशोर की पार्टी में हैसियत भी बताते रहते हैं. लेकिन प्रशांत का कद बिहार और देश की राजनीति में इस तरह का है कि जब तक नीतीश कुमार कुछ ना बोले तब तक कि नहीं माना जा सकता कि प्रशांत किशोर की हैसियत जेडीयू में खत्म हो गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि दोनों नेता क्या एक दूसरे को छोड़ने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे हैं या जो कुछ हो रहा है प्रशांत किशोर की रणनीति का हिस्सा है.

क्या पीके अपनी मजबूरियों के चलते कर रहे हैं बीजेपी विरोध
दिल्ली के गलियारों में कभी चर्चा जोरों पर है प्रशांत किशोर अगर नीतीश कुमार के साथ रहते हुए भाजपा समर्थक समझे जाते हैं तो उनके उनकी कंपनी के बाकी कॉन्ट्रैक्ट पर खासा असर पड़ेगा ऐसे में प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के साथ रहना तो चाहते हैं लेकिन सीएए एनआरसी जैसे मुद्दों पर अपना विरोध दर्ज कर अपनी बीजेपी विरोधी छवि बनाए रखना चाहते हैं. साथ ही, इन बयानों के बहाने प्रशांत ये संदेश देना चाहते हैं कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण उन पार्टियों के वोट बैंक पर नहीं पड़ेगा, जिनका कि वो और उनकी कंपनी काम संभाल रहे हैं. क्योंकि ममता बनर्जी और उनके जैसे नेता कभी नहीं चाहेंगी कि उनके रणनीतिकार के ऊपर भारतीय जनता पार्टी का करीबी होने का आरोप लगे.

 



 

यहां गौर करने लायक बात है कि भले ही प्रशांत किशोर ने कई राजनीतिक दलों की नैया पार लगाई हो, 2014 से लेकर अब तक देश में और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर अलग-अलग पार्टियों की सरकार बनवाई हो, लेकिन जेडीयू में उपाध्यक्ष होना सक्रिय राजनीति में उनकी पहली पारी है और अब तक के आंकड़ों को देखें तो साफ है कि पीके को उपाध्यक्षी रास नहीं आ रही है. क्योंकि पार्टी का एक बड़ा धड़ा जितने नीतीश कुमार का करीबी समझा जाता है और जिसकी बिहार की राजनीति में मजबूत पकड़ है और लगातार प्रशांत किशोर का विरोध कर रहा है और ऐसे मौके पर पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार कहीं भी और कभी भी प्रशांत किशोर के साथ खड़े नजर नहीं आया. यानि प्रशांत का राजनीतिक कैरियर उतना तेजी से टेकऑफ नहीं कर पा रहा है जितना उनकी कंपनी का.

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First published: January 27, 2020, 8:54 PM IST
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