राजस्थान के इस मंदिर में अलीगढ़ से सप्लाई होती हैं हथकड़ि‍यां, जानें क्‍या है मान्‍यता

देश ही नहीं विदेशों में भी अलीगढ़ की बनी हथकड़ी, ताले और बेड़ियां सप्लाई होती हैं.

देश ही नहीं विदेशों में भी अलीगढ़ की बनी हथकड़ी, ताले और बेड़ियां सप्लाई होती हैं.

पुलिस स्टेशन (Police Station) के लॉकअप और जेल के लिए ताले भी अलीगढ़ से ही बनकर जाते हैं. और तो और कैदियों को पहनाई जाने वाली बेड़ियां भी यहीं बनती हैं.

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नई दिल्ली. ऐसा नहीं है कि अलीगढ़ की पहचान सिर्फ सिर्फ ताले (Locks) ही हैं. अलीगढ़ की बनी हथकड़ी भी इस शहर को देश के साथ विदेशों में भी खास पहचान दिलाती है. इतना ही नहीं राजस्थान (Rajasthan) के एक मंदिर में देवी पर चढ़ाने के लिए हथकड़ी (Hand Cuffs) अलीगढ़ से ही बनकर जाती है. अंग्रेजों के जमाने से हथकड़ी बनाने का काम होता आ रहा है. वक्त के साथ हथकड़ी का डिजाइन और उसका वजन भी बदला जा चुका है. आज अलीगढ़ में 4 से 5 तरह की हथकड़ी बनती है. एक और खास बात यह है कि पुलिस स्टेशन (Police Station) के लॉकअप और जेल के लिए ताले भी अलीगढ़ से ही बनकर जाते हैं. और तो और कैदियों को पहनाई जाने वाली बेड़ियां भी यहीं बनती हैं.

राजस्थान में प्रतापगढ़ ज़िले के एक गांव में ऊंची पहाड़ी पर दिवाक माता का मंदिर है. मंदिर के आसापास खासा जंगल है. ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना डाकुओं ने की थी. वो यहां पूजा करते थे. इसके बाद ऐसी मान्यता प्रचलित हुई कि दिवाक माता को हथकड़ी चढ़ाने से इंसान जेल जाने से बच जाता है और अगर जेल में है उसकी जल्दी रिहाई हो जाती है. इसी मान्यता के चलते हथकड़ी चढ़ाई जाती है. मंदिर के आसपास बनी दुकानों पर यह हथकड़ी मिल जाती है.

6 से ज्यादा देशों में अलीगढ़ की बनी हथकड़ी की मांग

कभी हथकड़ी के काम से जुड़े रहे भुजपुरा बाईपास के रहने वाले बाबा बताते हैं कि इस वक्त करीब आधा दर्जन देशों को अलीगढ़ में बनी हथकड़ी सप्लाई की जाती है. हथकड़ी के साथ ही यहां की बनी बेड़ियां भी विदेशों में भेजी जाती हैं. हिन्दुस्तानी जेलों में भी अलीगढ़ से ही बेड़ियां मंगाई जाती हैं. साल 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अलीगढ़ से ताले, हथकड़ी ओर बेड़ियां खरीदी थीं. हॉलीवुड की डिमांड पर भी अलीगढ़ से हथकड़ी और बेड़ियां भेजी जाती हैं.
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इस तरह की हथकड़ी बनाई जा रही हैं अलीगढ़ में

अंग्रेजों के ज़माने से बनती चली आ रही फिक्सड हैंड कफ्स वाली हथकड़ी सबसे पुरानी है. यह हथकड़ी आधा किलो वजन तक की होती है. वहीं, कलाई के हिसाब से यह चार साइज में बनती है. हालांकि अब इसका चलन कम है, लेकिन इसके बाद भी यह आज 2 इंच, सवा 2 इंच, ढाई इंच और पौने तीन इंच के साइज में बनाई जा रही है. फिक्स्ड हैंड कफ्स के बाद एडजस्टेबल हैंड कफ्स आ गई थी. यह भी 45 साल पुरानी है.




हालांकि, वजन में यह भी फिक्सड हैंड कफ्स की तरह ही हैं. इसका एक ही साइज बनाया जाता है और इस्तेमाल के वक्त कलाई के हिसाब से एडजस्ट कर लिया जाता है. 10 साल पहले स्टैंडर्ड साइज में 8 टाइप हथकड़ी बनाई गई थी. पुरानी हथकड़ियों के मुकाबले यह वजन में थोड़ी हल्की होती है. 2008-10 में हथकड़ियों के वजन को कम करने की पहल हुई थी. शायद इसी के चलते एक आईपीएस के प्रस्ताव पर आरई मोड हैंड कप बनाई गई. इसका वजन करीब 350 ग्राम है. इसकी शुरुआत कोबरा स्क्वायड से हुई थी, लेकिन आज यह यूपी के हर थाने में दिखाई देती है. इसमे डबल लॉक होता है.

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