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POCSO के तहत दर्ज एफआईआर अब क्यों नहीं होंगे रद्द! जानें हाई कोर्ट का अहम फैसला

सेंट्रल दिल्ली में सात साल के एक बच्चे के साथ यौन शोषण के तहत मामला दर्ज हुआ था. (सांकेतिक फोटो)

Sexual Harasment: दिल्ली हाई कोर्ट (High Court) ने पॉक्सो (POCSO) के तहत एक दर्ज मामले में दोनों पक्ष के समझौते के बाद भी एफआईआर (FIR) रद्द करने से इनकार कर दिया है.

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नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट (High Court) ने पॉक्सो (POCSO) के तहत दर्ज एक मामले में दोनों पक्ष के समझौते के बाद भी एफआईआर (FIR) रद्द करने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने अपने एक फैसले में समझौते के आधार पर पॉक्सो के तहत दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए कहा, 'पॉक्सो एक्ट लाया ही इसलिए गया था कि क्योंकि मौजूदा कानून में बच्चों के साथ अपराध की सही से व्याख्या नहीं थी. इसलिए मां-बाप या कोई सगा संबंधी समझौता कर इसको खत्म नहीं कर सकता. इससे पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में बच्चों को न्याय नहीं मिलेगा. बता दें कि देश में पॉक्सो एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act-2012) के तहत कई मामले दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन कई मामलों में दोनों पक्षों के समझौता हो जाने से एफआईआर रद्द भी हो रहे हैं.

बच्चों के यौन शोषण के तहत दर्ज मामले में कोर्ट का फैसला
कुछ साल पहले सेंट्रल दिल्ली में 7 साल के एक बच्चे के साथ यौन शोषण का मामला दर्ज हुआ था. पीड़ित के पिता के साथ विवाद खत्म होने पर आरोपी ने कोर्ट से यह मांग की इस एफआईआर को रद्द कर दिया जाए. इस पर हाई कोर्ट ने आरोपी पक्ष के दलील को ठुकराते हुए कहा कि पीड़ित के पिता को आरोपी पक्ष के साथ समझौते के इजाजत नहीं दी जा सकती. अदालत का काम है बुरी ताकतों के हमले के खिलाफ बच्चों को संरक्षण देना.

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दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में समझौते के आधार पर पॉक्सो के तहत दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है.


बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की मौजूदा कानूनों में सहीव्याख्या नहीं-HC
कोर्ट ने कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की मौजूदा कानूनों में सही तरह से व्याख्या नहीं की गई है. पॉक्सो एक्ट लाने का मतलब ही यह है कि बच्चों को सभी तरह के यौन उत्पीड़न से सुरक्षा देना है. ऐसे अपराधों में समझौते की इजाजत देना न्यायहित में नहीं होगा.

क्या कहते हैं जानकार
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रविशंकर कुमार न्यूज 18 हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, दिल्ली हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला है. बच्चों को लेकर एक ऑर्गेनाइज्ड तरीके से क्राइम का खेल चल रहा है. मामला तो दर्ज हो जाते हैं, लेकिन बाद में दवाब या अन्य वजहों से दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है. इससे बच्चों को तो न्याय नहीं मिल पाता. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक लगभग हर साल कुल अपराधों में 20 प्रतिशत के आस-पास बच्चों से जुड़े होते हैं. भारत के कुल जनसंख्या का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा बच्चों का है. बच्चों का यौन शोषण एक सामाजिक चिंता का कारण भी है. वयस्कों की तुलना में बच्चों को अपने ऊपर हुए जुल्मों का खुलासा करना मुश्किल होता है. इसी को देखते हुए पॉक्सो अधिनियम लाया गया था. दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले का दूरगामी असर देखने को मिलेगा.'

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देश में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण के लिए साल 2012 में (POCSO) अधिनियम लाया गया था. (प्रतीकात्मक)


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गौरतलब है देश में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण के लिए साल 2012 में (POCSO) अधिनियम लाया गया था. 14 नवंबर 2012 से यह पूरे देश में लागू हुआ था. उस समय कानूनविदों ने कहा था कि यह एक ऐतिहासिक कानून है. लेकिन, बीते 8-9 सालों में इस कानून को लेकर कई तरह की शिकायतें आनी शुरू हो गई थीं. दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद एक बार फिर से इस कानून का गलत इस्तेमाल करने पर रोक लगेगी.