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निर्भया कांड: सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकी दोषी पवन की एक भी दलील, जानिए-बहस की प्रमुख बातें
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Updated: January 20, 2020, 5:40 PM IST
निर्भया कांड: सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकी दोषी पवन की एक भी दलील, जानिए-बहस की प्रमुख बातें
निर्भया मामले में दोषी पवन गुप्ता (फाइल फोटो)

दोषी पवन गुप्ता (Pawan Gupta) के वकील एपी सिंह (AP Singh) ने कोर्ट में बहस की शुरुआत करते हुए कहा- पुलिस ने पवन से जुड़े कुछ तथ्य छिपाए. यह अब सामने आए हैं. ये हैं पवन के अंबेडकर नगर स्थित स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र जिसमें उसकी जन्म तिथि 8 अक्टूबर 1996 है.

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  • Last Updated: January 20, 2020, 5:40 PM IST
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नई दिल्ली. निर्भया मामले (Nirbhaya Case) में फांसी की सजा पाए चारों दोषियों (Culprits) में से एक पवन गुप्ता (Pawan Gupta) की वारदात के वक्त नाबालिग होने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई हुई. दोषी के वकील एपी सिंह ने दलील दी कि वारदात के समय पवन नाबालिग था. इसलिए उसे फांसी नहीं दी जा सकती है. बेंच ने पवन के दावे पर कहा- 'इस मामले को कितनी बार उठाएंगे? नाबालिग होने वाली बात ट्रायल कोर्ट में क्यों नहीं बताई गई?' कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अगर आप इस तरह अर्जी दाखिल करते रहेंगे तो यह अंतहीन प्रक्रिया हो जाएगी.

आगे पढ़िए तीन सदस्यीय विशेष बेंच की इस सुनवाई के दौरान क्या-क्या बातें हुईं.

दोषी पवन गुप्ता के वकील एपी सिंह ने कोर्ट में बहस की शुरुआत करते हुए कहा- पुलिस ने पवन से जुड़े कुछ तथ्य छिपाए. यह तथ्य अब सामने आए हैं. ये हैं पवन के अंबेडकर नगर स्थित स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र, जिसमें उसकी जन्म तिथि 8 अक्टूबर 1996 है.

जस्टिस अशोक भूषण- लेकिन ये जन्म प्रमाण पत्र पवन को 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद सामने लाए गए हैं.

एपी सिंह- जी हां, मैं इसके बाद तिहाड़ जेल गया और फिर वहां पवन ने मुझे बताया कि वह स्कूल में पढ़ता था. उसके बाद मुझे ये स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र मिला. जिसमें पवन की जन्म तिथि लिखी हुई है.

न्यायमूर्ति भूषण- लेकिन आप इसे अदालत के सामने पहले क्यों नहीं लाए.

एपी सिंह- पवन ने अंबेडकर नगर के टांडा स्थित गायत्री बाल संस्कार स्कूल से पढ़ाई की है. मुझे स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र तब मिला जब ये केस हाईकोर्ट में था. मामले की सुनवाई के दौरान पवन की उम्र पर चर्चा नहीं की गई थी. लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय में मुख्य फैसले की समीक्षा के दौरान दिल्ली पुलिस के डीसीपी ईश्वर सिंह ने पवन के दस्तावेजों का सत्यापन किया था. जिसे नजरअंदाज कर दिया गया.जस्टिस अशोक भूषण- लेकिन आपने इस पर हाईकोर्ट की रिव्यू पिटिशन के दौरान बहस की थी. जिसे 9 जुलाई 2018 में खारिज कर दिया गया था. फिर आप दोबारा इस मुद्दे को कैसे उठा सकते हैं. कोर्ट ने इसे पहले ही खारिज कर दिया है. आप बार-बार वही कागजात दिखा रहे हैं.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता- इस उम्र के मुद्दे पर पहले ही बात हो चुकी है और रिजेक्ट भी कर दिया गया है. इसे फिर से नहीं उठाया जा सकता है.

एपी सिंह- इस पर चर्चा नहीं हुई थी.

जस्टिस भानुमति- आप पहले भी इस मुद्दे को उठा चुके हैं. इसमें कोई नया तर्क सामने नहीं आया है. इससे पहले जब छठे दोषी ने जुवेनाइल का दावा करके केस लड़ा था, तो पवन ने ऐसा क्यों नहीं किया. वह उस समय भी तो बतौर जुवेनाइल केस लड़ सकता था. लेकिन उम्र का मुद्दा अभी उठाया जा रहा है.

एपी सिंह- हां, आप सही हैं. लेकिन पवन के केस में सब कुछ जल्दबाजी में हुआ. काफी लोग कोर्टरूम में आए, लेकिन पवन को किसी तरह से कोई मौका नहीं मिला. जनता और मीडिया के दबाव में पवन पर चार्ज लगाए गए.

जस्टिस भानुमति: हम इन सब में दोबारा नहीं जाएंगे. आपने हाईकोर्ट में भी उम्र के मुद्दे को उठाया है.

एपी सिंह- शुरुआत में सब चीजों को नजरअंदाज किया गया था. जब मैं पवन से मिला तब मुझे उसके स्कूल जाने वाली बात का पता चला. जब भी इस तरह का कोई मसला होता है तो सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट ही नहीं बल्कि स्कूल सर्टिफिकेट को भी देखा जाता है और उसे वैध माना जाता है. माता पिता स्कूल में गलत जानकारी कैसे दे सकते हैं. और उन्हें क्या पता था कि आगे चलकर पवन निर्भया मामले में दोषी पाया जाएगा.

1 फरवरी को होनी है फांसी
बता दें, दिल्ली की एक अदालत ने मामले के चार दोषियों- विनय शर्मा (26), मुकेश कुमार (32), अक्षय कुमार (31) और पवन (25) के खिलाफ एक फरवरी के लिए शुक्रवार (17 जनवरी) को फिर से मृत्यु वारंट जारी किए है. इससे पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुकेश की दया याचिका खारिज कर दी. अन्य तीन दोषियों ने दया याचिका दायर करने के संवैधानिक उपाय का फिलहाल इस्तेमाल नहीं किया है.

क्या है पूरा मामला
गौरतलब है कि, दिल्ली में सात साल पहले 16 दिसंबर की रात को एक नाबालिग समेत छह लोगों ने चलती बस में 23 वर्षीय छात्रा से सामूहिक बलात्कार किया था और उसे बस से बाहर सड़क के किनारे फेंक दिया था. सिंगापुर में 29 दिसंबर 2012 को एक अस्पताल में पीड़िता की मौत हो गयी थी. मामले में एक दोषी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी. आरोपियों में से एक नाबालिग था, जिसे किशोर न्याय बोर्ड ने दोषी ठहराया था और तीन साल की सजा के बाद उसे सुधार गृह से रिहा किया गया था. शीर्ष अदालत ने अपने 2017 के फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय और निचली अदालत द्वारा मामले में सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा था.

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First published: January 20, 2020, 3:51 PM IST
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