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तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट का नोटिस, जानें पूरा मामला

 तलाक-ए-हसन के अनुसार, एक मुस्लिम व्यक्ति तीन महीने के लिए महीने में एक बार "तलाक" कहकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है.

तलाक-ए-हसन के अनुसार, एक मुस्लिम व्यक्ति तीन महीने के लिए महीने में एक बार "तलाक" कहकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है.

Delhi High Court News: महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि तलाक-ए-हसन न केवल मनमाना, अवैध, निराधार, कानून का दुरुपयोग है, बल्कि एकतरफा अतिरिक्त-न्यायिक अधिनियम भी है जो सीधे अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन है." याचिका में यह भी कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 एक गलत धारणा देता है कि कानून तलाक-ए-हसन को एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक होने की अनुमति देता है, जो याचिकाकर्ता और अन्य विवाहित मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.

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नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है. तलाक-ए-हसन के अनुसार, एक मुस्लिम व्यक्ति तीन महीने के लिए महीने में एक बार “तलाक” कहकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है. याचिका में तलाक-ए-हसन को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा ने दिल्ली पुलिस के साथ-साथ उस मुस्लिम व्यक्ति से जवाब मांगा, जिसकी पत्नी ने तलाक-ए-हसन के नोटिस को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि तलाक-ए-हसन न केवल मनमाना, अवैध, निराधार, कानून का दुरुपयोग है, बल्कि एकतरफा अतिरिक्त-न्यायिक अधिनियम भी है जो सीधे अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन है.” याचिका में यह भी कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 एक गलत धारणा देता है कि कानून तलाक-ए-हसन को एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक होने की अनुमति देता है, जो याचिकाकर्ता और अन्य विवाहित मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.

याचिका में महिला ने लगाया दहेज और उत्पीड़न का आरोप

याचिका दायर करने वाली मुस्लिम महिला के मुताबिक, साल 2020 सितंबर में उसकी शादी हुई थी. उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके ससुरालवालों ने उसकी विधवा मां को एक भव्य शादी आयोजित करने के लिए मजबूर किया और उनसे दहेज की मांग की. महिला का आरोप है कि उनके पति ने दहेज के लिए उनका उत्पीड़न किया और विरोध करने पर एकतरफा तलाक का एलान कर दिया।.

वहीं दिल्ली हाईकोर्ट में तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली मुस्लिम महिला की याचिका में दावा किया गया है कि उसके और उसके परिवार के खिलाफ किसी भी कार्रवाई से बचने के लिए, उसके पति ने तलाक-ए-हसन को प्राथमिकता दी और उसे पहला नोटिस दिया. मामले को अब रोस्टर बेंच द्वारा 18 अगस्त को सुनवाई के लिए पोस्ट किया गया है.

तलाक-ए-हसन क्या है?

तलाक-ए-हसन के मुताबिक,, कोई भी मुस्लिम व्यक्ति महीने में एक बार मौखिक या लिखित रूप में अपनी पत्नी को तलाक देता है और लगातार तीन महीने तक ऐसा करने पर तलाक औपचारिक रूप से मंजूर हो जाता है.

Tags: DELHI HIGH COURT, Muslim

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