येदियुरप्पा कैसे साबित करेंगे बहुमत?
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येदियुरप्पा कैसे साबित करेंगे बहुमत?
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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक विधानसभा में दूसरी पार्टियों के कुछ विधायकों को गैर हाजिर करवाकर येदियुरप्पा बहुमत साबित कर सकते हैं

  • Last Updated: May 17, 2018, 12:25 PM IST
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नाटकीय घटनाक्रम के बाद बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा सीएम तो बन गए हैं लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित करना आसान नहीं होगा. बीजेपी के पास 104 सदस्य हैं जबकि बहुमत के लिए 112 विधायक चाहिए. ऐसे में बीजेपी को या तो जेडीएस विधायकों को तोड़ना पड़ेगा या फिर कांग्रेस के. क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं. इस बारे में हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार से बातचीत की.

कुमार के मुताबिक "सदन में बहुमत के लिए वोटिंग से पहले जेडीएस और कांग्रेस व्हिप तो जरूर जारी करेंगी. व्हिप जारी होने के बाद कोई भी विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं कर सकता. उसकी सदस्यता चली जाएगी. लेकिन यदि वह गैरहाजिर हो जाएं तो व्हिप लागू नहीं होगा. मुझे लगता कि कुछ विधायकों को गैरहाजिर करवाने का विकल्प ही अपनाया जाएगा. इससे बहुमत का आंकड़ा बदल जाएगा और बीजेपी आसानी से फ्लोर टेस्ट पास कर लेगी."

क्या कांग्रेस या फिर जेडीएस के विधायक दल बदल का खतरा मोल लेंगे. कुमार के मुताबिक "दलबदल अवैधानिक है लेकिन यदि सदस्य नई पार्टी बना लें तो उसे वैध माना जाएगा. लेकिन इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी. ज्यादा विधायकों की जरूरत होगी, ऐसा करना आसान नहीं होगा."



क्या है दल-बदल कानून?
'आयाराम गयाराम' राजनीति समाप्त करने के लिए दल-बदल कानून राजीव गांधी सरकार ने 24 जनवरी 1985 को 52वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिए लोकसभा में पेश किया था. 30 जनवरी को लोकसभा और 31 जनवरी को राज्यसभा में विधेयक पारित हुआ. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद दल-बदल अधिनियम अस्तित्व में आया.
इसके जरिए अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में बदलाव किया गया. संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. दरसअल, 10वीं अनुसूची को ही दल-बदल कानून के तौर पर जाना जाता है. यह संशोधन 1 मार्च 1985 से लागू हो गया था.


ऐसे जाती है सदस्यता:
संसद या राज्य विधानमंडल सदस्यों की सदस्यता कैसे समाप्त हो, इसकी व्याख्या दल-बदल कानून में स्पष्‍ट रूप से की गई है.
(1) कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे
(2) यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दे तो सदस्यता जाएगी
(3) कोई निर्दलीय चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए तो सदस्यता जाएगी
(4) यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वाइन कर ले तो जाएगी सदस्यता

अपवाद:


1. 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के पैरा 3 में एक तिहाई का नया दल बनाने की अनुमति थी.
2-अधिनियम के पैरा 4 में दो या अधिक दल अपनी सदस्यता के दो तिहाई बहुमत से विलय का अधिकार
3-कोई सदस्य अध्यक्ष के पद पर चुनाव से पहले दलीय निष्पक्षता की दृष्टि से दल से इस्तीफा दे दें.

हालांकि, दल-बदल अधिनियम आयाराम गयाराम रोकने के लिए एक अच्छा कदम माना गया, लेकिन पैरा 3 और पैरा 4 ने मकसद को अधूरा छोड़ दिया. इसका नतीजा रहा कि 16-दिसंबर-2003 को संसद को 91वां संविधान संशोधन विधेयक पारित करना पड़ा.

इस विधेयक में न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया. इस संशोधन  द्वारा 10वीं अनुसूची की धारा 3 को खत्म कर दिया गया, जिसमें एक-तिहाई सदस्य एक साथ दल बदल कर सकते थे. अब दो-तिहाई से कम सदस्य अपना दल नहीं छोड़ सकते.
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