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रेप, गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट के लिए कितना 'फास्ट' है हमारा फास्ट ट्रैक कोर्ट!
Unnao News in Hindi

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: December 7, 2019, 6:32 PM IST
रेप, गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट के लिए कितना 'फास्ट' है हमारा फास्ट ट्रैक कोर्ट!
अदालत ने तेजाब फेंककर युवती की हत्या करने के मामले में दोषी युवक समेत 3 महिलाओं को उम्र कैद की सजा सुनाई. (सांकेतिक तस्वीर)

पिछले साल ही 12 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों (Minor girls) के साथ बलात्कार और सामूहिक बलात्कार (Rape and Gangrape) की घटनाओं में बढ़ोतरी को देखते हुए मोदी सरकार (Modi Government) ने CRPC और IPC की धाराओं में संशोधन किए थे. इसके बावजूद उन्नाव (Unnao) और हैदराबाद (Hyderabad जैसी घटनाएं इस देश में हो रही है.

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  • Last Updated: December 7, 2019, 6:32 PM IST
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नई दिल्ली. उन्नाव रेप पीड़िता (Unnao Rape Victim) दो दिन तक लड़ने के बाद आखिरकार जिंदगी की जंग हार गई. 44 घंटे तक मौत से लड़ने के बाद उन्नाव की बहादुर 'निर्भया' (Nirbhaya) ने शुक्रवार की रात 11 बज कर 40 मिनट पर दिल्ली (Delhi) के सफदरजंग अस्पताल (Safdarjung Hospital) में दम तोड़ दिया. उन्राव रेप पीड़िता की मौत के बाद पूरे देश में गुस्से का माहौल है. लोग सोशल मीडिया पर सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं. रेप पीड़िता को लेकर एफआईआर (FIR) दर्ज करने से लेकर गवाही तक लोग सरकार और प्रशासन से सवाल पूछ रहे हैं और भूमिका तय करने की बात कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Courts, FTCs) गठन के बाद भी मामला इतना लंबा क्यों खींचता है? फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रभावी तरीके से क्यों काम नहीं कर पा रहे हैं?

फास्ट ट्रैक कोर्ट में डेढ़ लाख से भी ज्यादा केस लंबित
पिछले साल ही 12 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों के साथ रेप और गैंगरेप की घटनाओं में बढ़ोतरी को देखते हुए मोदी सरकार (Modi Government) ने CRPC और IPC की धाराओं में संशोधन किया था. इस संशोधन के बाद अब पहले के मुकाबले और सख्त सजा के प्रावधान किए गए हैं. इसके बावजूद हैदराबाद और उन्नाव जैसी सबको हिला कर रख देने वाली घटनाएं हो रही हैं.

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केंद्र सरकार ने पिछले साल ही CRPC और IPC की धाराओं में संशोधन किया था




बता दें कि मोदी सरकार वर्ष 2018 में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों को रोकने के लिए आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2018 (The Criminal Law Amendment Act 2018) लेकर आई थी. इस अधिनियम में यौन अपराध के खिलाफ बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) और बच्चों, महिलाओं के साथ बलात्कार के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है. लेकिन, इसके बावजूद एफआईआर (FIR) लिखने में देरी होती है, साथ ही आरोपी भी जमानत पर छूट कर बाहर आ जाते हैं.



IPC और CRPC एक्ट में पिछले साल हुए थे संशोधन
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शुभ्रा मेहंदीरत्ता न्यूज़ 18 हिंदी से बातचीत में कहते हैं, 'उन्नाव रेप पीड़िता के साथ जो हुआ ठीक नहीं हुआ. जैसे ही मैंने खबर में देखा था कि पीड़िता 90 फीसदी जल चुकी है. वैसे ही समझ मे आ गया था. हमारे पास कठोर कानून पहले से ही मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन नहीं होता. कठोर कानून के पालन करने की जरूरत है. फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबी तारीख मिलने लगी हैं. क्योंकि, पब्लिक प्रोस्क्यूटर नही हैं. इसके साथ और भी कई चीजें है, जिसका पालन नहीं हो रहा है. लोग सड़कों पर उतरते हैं, गुस्सा शांत करने के लिए हैदराबाद एनकाउंटर हो जाता है. सिस्टम को ठीक करना होगा.'

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उन्नाव रेप केस में पीड़ित युवती के बलात्कारी को आसानी से जमानत मिल जाती है (प्रतीकात्मक तस्वीर)


आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह कहते हैं, 'ये हमारी व्यवस्था पर सवाल है. कानून आप कितना भी सख्त बना लीजिए, अगर उसका जमीन पर पालन नहीं होगा तो अपराधियों के मन में कोई डर नहीं होगा. उन्नाव मामले में बलात्कार किया जाता है फिर बलात्कारी को जमानत मिल जाती है. जमानत किस आधार पर दी जाती है? कोर्ट में क्या पैरवी पुलिसवालों ने की? जमानत मिलने के बाद बेखौफ अपराधियों ने बाहर आकर रेप पीड़िता को जला दिया. निर्भया केस में हम लोगों ने देखा फांसी की सजा हो गई, लेकिन सात साल से मामला अटका हुआ है. आरोपी दया याचिका भेज रहा है. योगी सरकार से उम्मीद करना ही बंद कर दो. इनका काम बस मंदिरों में जाकर घंटा बजाना है.'

आंकड़े कुछ और कहानी बयां करती है
गौरतलब है कि आंकड़े बताते हैं कि एक साल के अंदर फास्ट ट्रैक कोर्ट में सिर्फ 30.2 प्रतिशत मामलों का ही निपटारा किया गया है. 30 प्रतिशत मामलों को सुलझाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट को भी 1-3 साल तक का वक्त लग गया. 30.9 प्रतिशत में केस में तो फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा तीन से 10 साल तक चला है. जबकि 8.9 प्रतिशत मामले तो ऐसे हैं जिसका निपटारा करने में फास्ट ट्रैक कोर्ट को भी 10 साल से ज्यादा का वक्त लग गया है. पॉस्को एक्ट के तहत दर्ज एक लाख 60 हजार 989 मामले अभी भी कोर्ट में लंबित है. जिसके निपटारे के लिए सरकार ने 1023 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया है.

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फास्ट ट्रैक कोर्ट में सिर्फ 30.2 प्रतिशत मामलों का ही निपटारा किया गया है


सुप्रीम कोर्ट के वकील विनोद दिवाकर न्यूज़ 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, 'देखिए रेप और पॉक्सो कैस ज्यादा हैं, उसके अनुपात में फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या कम है. पूरे देश में 1023 फास्ट केस ट्रैक कोर्ट बनने हैं, लेकिन 31 मार्च, 2018 तक 1 लाख 66 हजार 882 केस रेप और पॉक्सो एक्ट में दर्ज हैं. संभावित फास्ट ट्रैक कोर्ट जो बनने वाले हैं उनमें 389 कोर्ट सिर्फ पॉक्सो केस की ही सुनवाई करेंगे. 634 कोर्ट या तो रेप या फिर रेप और पॉक्सो दोनों केस की सुनवाई करेगा. अब अगर इतने मामले हैं तो इसके लिए चार-पांच सख्त कदम उठाने की जरूरत है. पहला, पब्लिक प्रोस्क्यूटर की नियुक्ति पार्ट टाइम के लिए न कर फुल टाइम के लिए की जाए. दूसरा, स्थानीय पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए कि गवाह को कोर्ट द्वारा तय तारीख पर पेश कराए. तीसरा, कोर्ट को चाहिए कि जिस दिन गवाह आए उस दिन उसकी गवाही पूरी हो. चौथा, अगर मुलजिम का वकील नहीं आता है तो डिस्ट्रिक्ट लीगल अथॉरिटी विकल्प के तौर पर दूसरा वकील मुहैया कराए. पांचवां, कोर्ट में जज का स्टेनो की पर्याप्त संख्या के साथ-साथ उपस्थिति भी होनी चाहिए. छठा, अदालत को FSL रिपोर्ट दो महीने के अंदर उपलब्ध कराई जानी चाहिए.'

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First published: December 7, 2019, 2:37 PM IST
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