कैसे प्लाज्मा थेरेपी और अरविंद केजरीवाल की भागीदारी से दिल्ली दे रही है कोरोना को मात?

डॉक्टरों के साथ अरविंद केजरीवाल

आखिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली में कोरोना (Coronavirus) की रफ्तार कम हो गई है, मौत की संख्या भी कम हो गई है और लोगों का डर भी भाग गया?

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    नई दिल्ली.  कोरोना वायरस (Coronavirus) की महामारी आधुनिक दुनिया के सामने सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है. ऐसे में पिछले कुछ महीनों में इस वायरस के खिलाफ लड़ाई किसी भी शहर और देश के लिए मुश्किल चुनौती रही है. दुनिया के कई बड़े महानगर कोरोना के लिए एंट्री पॉइंट बन गए. दरअसल यहां लॉकडाउन से पहले हजारों की संख्या में लोग इंटरनेशनल फ्लाइट से पहुंचे. कई लोग इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हो कर यहां आए. ऐसे में घनी आबादी के चलते यहां तेजी से कोरोना का संक्रमण फैला. देश की राजधानी दिल्ली भी उनमें से एक है. मार्च के महीने में यहां लॉकडाउन से पहले करीब 35 हजार इंटरनेशनल पैसेंजर पहुंचे. उन दिनों न तो स्क्रीनिंग की सुविधा थी और न ही क्वारंटाइन करने की.

    लॉकडाउन से बढ़ी समस्या
    भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन की शुरुआत हुई. इससे वायरस के संक्रमण को रोकने में मदद मिली. लेकिन इस दौरान लोगों के सामने सामाजिक-आर्थिक संकट खड़े हो गया. कई लोगों की नौकरी चली गई. दिहाड़ी मजदूरों के लिए कमाई का कोई साधन नहीं बचा. प्रवासी मजदूर फंस गए उनके पास कोई काम नहीं था. इसके अलवा सरकार के राजस्व में भी भारी गिरावट आई. ऐसे में लॉकडाउन को लंबे समय तक जारी रखना देश के सामने बड़ी चुनौती थी.

    जून से बढ़े मामले
    1 जून से लॉकडाउन खुलते ही दिल्ली के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई. जून के पहले हफ्ते से ही यहां कोरोना के केस लगातार बढ़ने लगे. इसके अलावा यहां मौतों की संख्या भी बढ़ने लगी. ऐसे में यहां कोरोना को लेकर लोगों के बीच दहशत फैल गई. लेकिन अब एक महीने के बाद दिल्ली में हालात सामान्य हो रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि यहां कोरोना की रफ्तार कम हो गई है, मौत की संख्या भी कम हो गई है और लोगों का डर भी भाग गया?

    कोरोना के नए केस पर नियंत्रण
    कोरोना के केस पर नियंत्रण के पीछे सबसे बड़ी वजह थी ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग और आइसोलेशन. कोरोना के मरीज और उनके कॉनटैक्ट में आने वाले लोगों को क्वारंटाइन करने से वायरस के संक्रमण को रोकने में मदद मिलती है. लेकिन लोगों को टेस्ट कराने से डर लगता था. ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपने आस-पास या वॉट्सऐप पर कोरोना वायरस के मरीजों को पुलिस अधिकारियों और मेडिकल स्टाफ द्वारा एम्बुलेंस में घसीटते हुए ले जाते हुए देखते थे. कई लोग COVID जैसे लक्षण होने के बावजूद खुद जांच नहीं करवाते थे. जब तक कोई गंभीर नहीं हुआ और अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ी, लोग आगे नहीं आए. ऐसे लोग घूमते रहे और वायरस फैलाता रहा. लेकिन जैसे ही दिल्ली सरकार ने लोगों से घर में आइसोलेट होने की अपील की हालात बदल गए. दिल्ली सरकार मनोवैज्ञानिक बाधा तोड़ने में कामयाब रही.

    होम आइसोलेशन की अपील
    दिल्ली सरकार लोगों को होम आइसोलेशन में रहने की अपील करने लगी. ऐसे लोगों को घर में रहने को कहा गया जिन्हें कोरोना के न के बराबर लक्षण थे. ऐसे लोगों की संख्या करीब 80 फीसदी थी. दिल्ली सरकार की तरफ से मेडिकल स्टाफ ने लोगों को समझाया कि आखिर घर में रहने के क्या फायदे हैं. इसके अलावा कोरोना पॉजिटिव मरीज को हर दिन फोन पर जानकारी दी गई. दिल्ली सरकार ने इन सबके के लिए 'होम आइसोलेशन' का कैंपेन चलाया. इससे लोगों को एहसास हुआ कि वो घर में रह कर अपना इलाज करवा सकते हैं. इसके अलावा इस कैंपेन से लोगों में कोरोना का डर भी काफी कम हुआ. इससे सरकार को ज्यादा से ज्यादा टेस्ट करने में मदद मिली.

    ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग पर ज़ोर
    शुरुआत से दिल्ली की रणनीति रही है ज्यादा से ज्यादा कोरोना की टेस्टिंग. दूसरे राज्यों के मुकाबले यहां काफी ज्यादा टेस्ट हो रहे थे. 31 मई को यहां हर 10 लाख लोगों पर 10500 टेस्ट हुए. इसके बाद जब कोरोना को लेकर लोगों का डर खत्म हुआ तो टेस्ट की संख्या और ज्यादा बढ़ाई गई. हॉट स्पॉट इलाकों में ज्यादा टेस्ट किए गए. जून के पहले हफ्ते में हर दिन 5500 टेस्ट हुए. केंद्र सरकार की मदद और एंटीजिन किट से दिल्ली में जून के मध्य तक हर रोज 11000 टेस्ट होने लगे. अब जुलाई के पहले हफ्ते में ये संख्या बढ़कर 21000 तक पहुंच गई. ज्यादा टेस्ट करने से मरीजों की संख्या भी बढ़ी. लेकिन इसका फायदा ये हुआ कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आइसोलेट किया जाने लगा. 16 जून के बाद दिल्ली में कोरोना के केस बढ़ने लगे. लेकिन नीचे आप टेबल में देख सकते हैं कि 23 जून के बाद मरीजों की संख्या में गिरावाट आने लगी.

    मरीजों की संख्या


    बढ़ाई गई बेड की संख्या
    जून की शुरुआत तक, सिर्फ 8 निजी अस्पताल थे जो कोरोना वायरस रोगियों का इलाज कर रहे थे और इनमें कुल 700 बेड उपलब्ध थे. ये दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में 2,500 बिस्तरों के अतिरिक्त थे. जब जून के पहले सप्ताह में मामले बढ़ने लगे, तब वे 8 निजी अस्पताल भर गए. यहां बेड उपलब्ध नहीं थे. कुछ मरीज तो इनमें से 2-3 निजी अस्पतालों में भी गए और उन्हें बेड नहीं मिले. जबकि इस दौरान सरकारी अस्पतालों में 1,000 से अधिक बेड उपलब्ध थे, कई लोगों ने निजी अस्पतालों को प्राथमिकता दी. अस्पताल से अस्पताल चक्कर काटने के चलते मरीज घबराने लगे. निजी अस्पतालों में बेड की क्षमता का तुरंत विस्तार किया गया.

    सरकार का आदेश
    केजरीवाल सरकार द्वारा एक आदेश पारित किया गया था जिसके तहत 50 से अधिक बेड वाले सभी निजी अस्पतालों को COVID रोगियों के इलाज के लिए 40 प्रतिशत बेड आरक्षित करने के लिए कहा गया. इसका मतलब ये था कि निजी अस्पतालों में COVID बेड की संख्या 700 से बढ़कर 5,000 हो गई. इसका मतलब यह भी था कि COVID सुविधाएं अब शहर के सभी हिस्सों में उपलब्ध थीं. इसके अलावा, होटलों को निजी अस्पतालों से जोड़ा गया, जिससे अस्पतालों की बेड की क्षमता बढ़ गई. निजी अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या 5,000 से बढ़कर 7,000 हो गई. आज, दिल्ली में 15,000 से अधिक COVID बेड हैं. जबकि इस बढ़ी हुई क्षमता का अधिकांश हिस्सा अभी भी खाली है - 15,000 से अधिक COVID बेड पर केवल 38 प्रतिशत का इलाज चल रहा है.

    बेड के बारे में जानकारी
    जब मरीजों की संख्या बढ़ी तो सरकार को लगा कि लोगों को सही तरीके से जानकारियां नहीं मिल रही हैं. जून के पहले सप्ताह में भी 1,000 से अधिक बेड उपलब्ध थे, लेकिन मरीजों और उनके परिवारों को यह नहीं पता था कि वे कौन से अस्पताल थे जहां ये बेड उपलब्ध थे. ऐसे में दिल्ली सरकार ने एक ऐप लॉन्च किया. जिसने शहर के हर अस्पताल में बेड की वास्तविक समय पर उपलब्धता दिखाई. शुरुआत में ऐप के इस्तेमाल में कई तरह की दिक्कतें हुईं. लेकिन बाद में सब ठीक हो गया. अब प्रत्येक दिल्ली वासी को निकटतम अस्पताल के बारे में जानकारी मिल जाती है. क्या बेड उपलब्ध है इसकी जानकारी भी मिल जाती है.

    कोरोना मरीजों की काउंसलिंग
    COVID पॉजिटिव रोगियों की सूची ICMR को लैब द्वारा दी जाती है जो इसे दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग को देती है. और स्वास्थ्य विभाग से जिला निगरानी की टीमें इसकी जानकारी मरीजों तक पहुंचती हैं और उन्हें उनकी स्थिति के आधार पर इलाज की सलाह दी जाती है. पूरे प्रोसेस में करीब 24-36 घंटे का वक्त लगता था. इस दौरान मरीज घबराए रहते थे. उनमें से कई अस्पताल पहुंच जाते थे, भले ही उनके लक्षण हल्के थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं थी. ऐसे में दिल्ली सरकार ने गैर-सरकारी संगठनों और डॉक्टर-स्वयंसेवकों के एक नेटवर्क के साथ काम करना शुरू किया. लैब रिपोर्ट अपलोड होते ही वास्तविक समय पर कॉलिंग और COVID पॉजिटिव रोगियों की काउंसलिंग शुरू की गई.

    मौत की दर में कमी लाना
    COVID-19 की दुनिया भर में मृत्यु दर 2 से 5 प्रतिशत है. इस वायरस के लिए वैक्सीन के बिना मृत्यु दर को शून्य तक लाना संभव नहीं है. लेकिन उचित रोगी और सुविधा प्रबंधन से मृत्यु दर में कमी आ सकती है और ये ठीक यही रणनीति है जिसका दिल्ली में पालन किया गया है. दिल्ली सरकार का ध्यान ये सुनिश्चित करने पर था कि जिन रोगियों में हल्के लक्षण थे वे घर पर ठीक हो सकें, ताकि गंभीर रोगियों के लिए अस्पताल की सुविधा उपलब्ध रहे. बढ़ते लक्षणों के मामले में अस्पतालों में तेजी से संक्रमण सुनिश्चित करने के लिए मरीजों पर कड़ी निगरानी रखी गई. इसका उद्देश्य हल्के और मध्यम रोगियों को गंभीर होने से रोकना था और गंभीर रोगियों को गंभीर स्थिति में आने से रोकना था.

    मरीजों के लिए ऑक्सीजन के इंतज़ाम
    कोरोना के मरीजों को आमतौर पर सांस लेने में काफी दिक्त होती है. ब्लड में ऑक्सीजन लेवल कम होने का डर बना रहता है. ऐसे में दिल्ली सरकार ने घर पर इलाज कराने वालों को ऑक्सीजन के इंतजाम करवाए. अरविंद केजरीवाल सरकार ने सभी रोगियों को ऑक्सीमीटर दिए जिससे कि वे किसी भी वक्त ऑक्सीजन के स्तर की निगरानी कर सकें. सरकार ने 59,600 ऑक्सीमीटर खरीदे. जिसमें से 58,974 का इस्तेमाल किया जा रहा है. यदि ऑक्सीजन के स्तर में कमी आनी शुरू हो जाती है, तो ऑक्सीजन की सुविधा दी जाती है. सरकार ने 2,750 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स खरीदे हैं. दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के अधिकांश बेड पर आज ऑक्सीजन की सुविधा है.

    वॉर रूम और एम्बुलेंस के इंतजाम
    दुनिया भर में देखा गया है कि महामारी के दौरान एम्बुलेंस न होने के चलते लोगों की मृत्यु हो जाती है. दिल्ली ने इसके पहले से ही इंतज़ाम कर लिए थे. ये सुनिश्चित करने के लिए कि एम्बुलेंस की कोई कमी नहीं हो एक समर्पित वॉर रूम स्थापित किया गया था. लॉकडाउन की शुरुआत में केवल 134 एम्बुलेंस थीं. दिल्ली सरकार की 102 CATS एम्बुलेंस सेवा वर्तमान में 602 वाहनों के बेड़े का संचालन करती है, जिसमें COVID और गैर-COVID दोनों मामलों में 402 एम्बुलेंस खानपान और 200 कैब शामिल हैं जो गैर-आपातकालीन कॉलों को पूरा करती हैं.

    प्लाज्मा थेरेपी
    दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में प्लाज्मा थेरेपी की शुरुआत की गई. इसके परिणाम बहुत उत्साहजनक थे. देश भर में पहली बार, दिल्ली सरकार द्वारा एक 'प्लाज्मा बैंक' स्थापित किया गया. ताकि मरीज आसानी से प्लाज्मा का उपयोग कर सकें. प्लाज्मा दान के लिए एक आक्रामक जागरूकता अभियान का नेतृत्व खुद केजरीवाल ने किया है, ताकि प्लाज्मा दान करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके.

    लोगों के साथ सीएम का जुड़ाव
    महामारी के दौरान केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों से सीधा जुड़ाव रखा. उन्होंने लोगों को होम आइसोलेशन के बारे में बताया. ऑक्सीमीटर कैसे काम करता है, प्लाज्मा क्यों दान किया जाना चाहिए, अस्पतालों के बेड कैसे बढ़ाए जा रहे हैं. इन सबके के बारे में उन्होंने लोगों को जानकारी दी. यह जुड़ाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक महामारी को नियंत्रित करने के लिए लोगों के व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता होती है; और व्यवहार में परिवर्तन एक विश्वसनीय तरीके से तथ्यों से अवगत होने से आता है. ये काम केजरीवाल ने किया.

    सबको साथ लेकर चलना
    इस महामारी के प्रबंधन के लिए केवल सरकारी तंत्र पर निर्भर रहने के बजाय, केजरीवाल, आक्रामक रूप से इस लड़ाई में योगदान देने के लिए अलग-अलग लोगों तक पहुंचे. वेंटिलेटर, मास्क, परीक्षण किट और मेडिकल स्टाफ के लिए केंद्र सरकार से बात की गई. होटल वालों से COVID केयर सेंटर चलाने में मदद मागी गई. कोरोना वायरस पर काबू पाने में दिल्ली की सफलता न केवल अस्पताल के बुनियादी ढांचे का विस्तार करने, परीक्षण बढ़ाने या आक्रामक रूप से अलग करने की क्षमता में निहित है. यह सरकार की मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक चुनौतियों को समझने की क्षमता में निहित है, जो इस महामारी ने पैदा की है.

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