लाइव टीवी

OPINION: CAA विरोधी आंदोलन के इस स्वरूप का क्या महात्मा गांधी समर्थन करते?
Delhi-Ncr News in Hindi

News18Hindi
Updated: January 6, 2020, 8:23 PM IST
OPINION: CAA विरोधी आंदोलन के इस स्वरूप का क्या महात्मा गांधी समर्थन करते?
(फाइल फोटो)

महात्मा गांधी और विशेषकर पुरानी कांग्रेस के नेता अगर जीवित होते तो वह भीड़ की शिक्षा पर प्रश्न उठाते और जाकिर हुसैन से ‘नई तालीम’ जैसा कुछ पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए कहते जिससे कि भीड़ को सामाजिक दायित्व और अहिंसा के बारें में शिक्षित किया जा सकता.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 6, 2020, 8:23 PM IST
  • Share this:
(रामानंद)

नई दिल्ली. नागरिक संशोधन अधिनियम यानी CAA का विरोध बंद नहीं हो रहा हैं. CAA से जुड़े सभी सवाल और अफवाहों का जन्म CAA स्वयं में नहीं हैं. CAA एक ऐसा कानून हैं जिससे सीधे किसी भी समुदाय या वर्ग को कोई हानि नहीं हो रही हैं. फिर भी इस कानून में कुछ समुदाय या वर्ग नहीं आ रहे, उसको लेकर कुछ आपत्तियां वाजिब हो सकती हैं मगर जिस प्रकार से वह आपत्तियां रखी जा रहीं हैं और जिन माध्यमों से उन आपत्तियों को रखा गया, उससे आम जनमानस में भय का वातावरण तैयार हो गया.

CAA के द्वारा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समूह जो दिसंबर 2014 से पहले भारत में आ चुके हैं उनको एक बार में नागरिकता देने की बात की जा रही है जिससे की वह भारत सरकार के कार्यक्रमों और योजनाओं का लाभ एक नागरिक के रूप में ले सकें.



क्या किसी की नागरिकता छिन जाएगी?



इस पूरे कानून को NRC से जोड़कर ऐसे प्रस्तुत किया गया और किया जा रहा है की जैसे इस कानून के द्वारा अल्पसंख्यक समूह की नागरिकता छीन ली जायेगी. इस पूरे डर का आधार NRC को बनाया जा रहा हैं जिसका अभी अस्तित्व ही नहीं हैं. असम में यह असम अकॉर्ड की बाध्यता के कारण सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लागू हुआ जिस पर सभी पक्षों ऊंगली उठाई और कोई भी इसके परिणाम और क्रियान्वन से खुश नहीं था.

समाज में अविश्वास और अल्पसंख्यक वर्ग में भय, एक ऐसे अस्तित्वविहीन कानून के आधार पर घोला जा रहा हैं जो अभी आया ही नहीं हैं. जिसका मसौदा किसी ने देखा ही नहीं हैं. भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में जहां हर स्तर पर लोकतंत्र कायम हैं वहां पर यह कल्पना करना की किसी की नागरिकता छिन जायेगी यह समझ से परे हैं.

गांधी की चर्चा
इस पूरे आंदोलन में अगर कोई व्यक्ति सबसे ज्यादा याद किया गए हैं तो वह हैं गांधी जी. गांधी जी की अहिंसा का आंदोलन विश्व में हर जगह याद किया जाता हैं खासकर संघर्ष और आंदोलन की पृष्ठभूमि में. कई लोगों को लगता है की ऐसी परिस्थिति में अगर गांधी जीवित होते तो वह इस कानून का विरोध करतें. इस पूरी धारणा के पीछे का आधार गांधी जी का अहिंसा के प्रति का आग्रह था. गांधी जी का व्यक्तित्व ऐसा था की वह किसी भी प्रकार की हिंसा और भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे.
अतः गांधी जी की याद ऐसी परिस्थितियों में आना स्वाभाविक ही है, क्योंकि गांधी जी आधुनिक भारत की सबसे मुखर आवाजों में से एक थे. गांधी जी की योगदान भारत के अहिंसा के विचार और भारतीयता के विचार को आगे रखने वालों लोग में प्रमुखता से लिए जाता हैं.


भारतीय परंपरा में अनेक विचारधाराएं हैं
भारत में जब भी कभी किसी भी विषय पर विवाद होता हैं तो लोग यह सोचना प्रारंभ करते हैं कि गांधी जी ने क्या किया था ऐसी परिस्थिति में. स्वंत्रता आन्दोलन की प्रमुख और सबसे मुखर आवाज़ होने के नाते गांधी जी को याद करना स्वाभाविक हैं मगर हर चर्चा को गांधी से शुरू करने गांधी पर ख़त्म करने के अपने वैचारिक नुकसान हैं. भारत को स्वतंत्र करने, भारत को इस रूप में प्रस्तुत करने, भारत के भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने में बहुत से लोगों को योगदान हैं.

भारत एक ऐतिहासिक सभ्यता वाला राष्ट्र है इसलिए इसके इतिहास में, इसके विचारों में बुद्ध, जैन व उपनिषदों का विचार वह इन विचारों को प्रतिपादित और जन जन-जन तक पहुंचने वाले चिंतक तथा इसको पोषित करने वाले राजा सब इसी धरती के हैं. द्वैत, अद्वैत की परंपरा हो, संगम साहित्य हो सभी ने भारत की परम्परा में अपना-अपना रस दिया है.

शेरशाह, अकबर, राणा प्रताप, शिवा जी और हम्पी साम्राज्य सभी ने इस धरती के यश को बढाया हैं और विकसित किया है. हर समय में इस धरती ने नया अनुभव लिया है और बार इसको देने वालों ने भारत की परम्परा में अपना योगदान दिया हैं.


आधुनिक भारत के इतिहास में...
आधुनिक भारत के इतिहास में भी राजा राम मोहन राय, पंडिता रमा बाई, गोपाल कृष्ण गोखले, स्वामी विवेकानंद ,बाल गंगाधर तिलक, अय्यनकली, सुब्रमणय भारती, लाला लाजपत राय, टैगोर, भगत सिंह, उधम सिंह, अशफाकउल्ला खान, सुभाष चन्द्र बोष, डॉ आम्बेडकर, सावरकर, बिपिन चन्द्र पाल, महर्षि अरविन्द आदि सबने अपना योगदान दिया है.

देश की उन्नति और स्वतंत्रता में सबने अपने-अपने सामर्थ्य और विवेक से योगदान दिया हैं. आज जो हम भारत देख रहे हैं वह लाखों-करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं का परिणाम हैं न की केवल एक व्यक्ति और एक संगठन का. गांधी जी का योगदान इस आंदोलन को जन आंदोलन में परिवर्तित करने को था और इसके लिए वह हमेशा याद किये जाते रहेंगे.

आजादी के लिए 1857 में एक साहस भरा प्रयास
सबको समझना होगा कि आजादी के लिए 1857 में एक साहस भरा प्रयास हुआ जो की कतिपय कारणों से असफल हुआ मगर इसमें हजारों लोग मारे गएं. 1947 तक विभिन्न स्तरों पर देश के विभिन्न भागों में क्रांतिकारी आन्दोलन चलते रहे, जिसमे अनेकों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी. अतः भारत का विचार किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं अपितु यह विचारों का समुच्चय हैं. जिसकी एक लम्बी श्रृंखला हैं. इसमें हर प्रकार के विचार हैं. कुछ विचारों के प्रति आपका आग्रह हो सकता हैं मगर भारत के विचार को केवल एक व्यक्ति के विचार के आधार पर पढना अन्य विचारों के साथ अन्याय होगा.

अगर गांधी होते तो इस परिस्थिति में क्या करते
अतः आज जब यह प्रश्न पूछने के लिए उत्सुक हो रहे हैं की अगर गांधी होते तो इस परिस्थिति में क्या करते तो हमें यह भी सोचना चाहिए की अगर आंबेडकर होते तो वो क्या करते जब उनके द्वारा लाये गए कानून, जिसमे एक शब्द भी किसी समुदाय के खिलाफ नहीं लिखा गया उसको आधार बनाकर अफवाह और हिंसा फैलाई जाती.

भगत सिंह या सुभाष चन्द्र बोष क्या करते जब कुछ शरणार्थियों को नागरिक अधिकार देने के प्रश्न पर समाज का एक वर्ग हिंसक हो जाता. आवश्यक है जब भी किस चिन्तक, विचारक या शासक को जब हम आज की परिस्थितियों में देखने का प्रयास करे तो वह हमारा प्रयास ईमानदार होना चाहिए. वैसे विचार कई प्रकार के होते हैं कुछ एक परिस्थिति के लिए होते हैं और कुछ विचार सर्वकालिक होते हैं. अतः जब भी किसी विचार का परीक्षण आज की परिस्थिति में करें तो ध्यान रखे की वह विचार सर्वकालिक हो और उस विचार को जैसी परिस्थितियां चल रही हैं वैसी ही परिस्थिति में उस विचार का परीक्षण करें.

नेहरु लियाकत समझौता नहीं भूलना चाहिए
भारत में अगर इस प्रकार के हिंसक आन्दोलन अल्पसंख्यकों को नागरिक अधिकार देने के लिए सरदार पटेल, नेहरु और स्वयं गांधी इस पूरी घटना के राजनीतिकरण का विरोध करते और कहते की हम शरणार्थियों को नागरिकता हर हाल में देंगे. चाहे देश को उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े. गांधी, नेहरु-लियाकत समझौते की याद दिलाते और कहते की समझौते का सम्मान करना एक राष्ट्र नैतिक दायित्व हैं अगर दूसरा राष्ट्र नहीं कर रहा हैं तो भी हमें अन्य देश के अल्पसंख्यकों को अपने देश में शरण देनी चाहिए.

भीड़ को सामाजिक दायित्व सीखना होगा
गांधी और विशेषकर पुरानी कांग्रेस के नेता अगर जीवित होते तो वह भीड़ की शिक्षा पर प्रश्न उठाते और जाकिर हुसैन से ‘नई तालीम’ जैसा कुछ पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए कहते जिससे की भीड़ को सामाजिक दायित्व और अहिंसा के बारें में शिक्षित किया जा सकता. वह कहते की आपकी आपत्ति हमारी नीति से हैं, आप नीति का विरोध कीजिये मगर राष्ट्र का विरोध न कीजिये. गांधी और उसके अनुयायी भीड़ द्वारा फैलाई गई हिंसा के जिम्मेदार लोगों और उनको समर्थन करने वाले नेताओं के लिए ‘Young India’ में खुद लेख लिखते और उन नेताओं की भर्त्सना करते जो अफवाह को आधार बना कर समाज के तबके को सरे तबके के खिलाफ भड़का रहे हैं.

(रामानंद, सेंटर ऑफ पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक हैं)

ये भी पढ़ें: JNU Violence: उद्धव ठाकरे बोले- JNU में छात्रों पर हमला 26/11 अटैक की तरह

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए दिल्ली-एनसीआर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 6, 2020, 7:34 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading