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इनसाइड स्टोरी: कैसे काम कर रही है शाहीन बाग आंदोलन की व्यवस्था
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अफसर अहमद | News18India
Updated: January 17, 2020, 10:14 PM IST
इनसाइड स्टोरी: कैसे काम कर रही है शाहीन बाग आंदोलन की व्यवस्था
CAA के खिलाफ पिछले एक महीने से ज्यादा समय से शाहीन बाग की 500 महिलाएं धरना दे रही हैं.

शाहीन बाग 500 महिलाओं (Shaheen Bagh Protest) की जिद है या 500 रुपए का लालच? सोशल मीडिया पर शाहीन बाग की महिलाओं के पैसे लेकर धरना देने का वीडियो वायरल होने के बाद आइए जानते हैं महीनेभर से ज्यादा दिनों से चल रहे इस शांतिपूर्ण धरने की इनसाइड स्टोरी.

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  • Last Updated: January 17, 2020, 10:14 PM IST
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नई दिल्ली. बीते एक महीने में देश ने कई उबाल देखे हैं. नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Act) के पक्ष और विरोध में जोरदार प्रदर्शन, धरने और रैलियां निकली हैं, लेकिन सभी में एक बात खास रही कि वो एक दिन की दहलीज पार कर दूसरे दिन के अंदर कदम नहीं रख पाए. सिवाए कुछ के, उनमें से एक है शाहीन बाग. जब ये धरना (Shaheen Bagh Protest) शुरू हुआ था, तब जामिया (Jamia Millia Islamia) में विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर था और शाहीन बाग में कुछ महिलाएं खामोशी के साथ धरने पर आकर बैठ गईं. दिन गुजरे, हफ्ते गुजरे लेकिन शाहीन बाग में बैठी महिलाएं वहां से हिली तक नहीं. आज आलम ये है कि न सिर्फ भारतीय मीडिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में शाहीन बाग की इन महिलाओं की चर्चा जोर-शोर से हो रही है.

अगर हम राजनीति को इससे अलग कर दें तो सीधा सवाल ये है कि आखिर इतने सुचारू ढंग से यहां व्यवस्था कैसे चल रही है? कौन लोग हैं इसके पीछे जिन्होंने सड़क पर अव्यवस्था के बीच एक जीती जागती सांस लेती व्यवस्था को जन्म दिया है? गुरुवार को मैंने शाहीन बाग जाकर इस व्यवस्था का जायजा लिया. जब मैं अपने एक साथी के साथ शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन से शाहीन बाग रोड के लिए गली से निकला तो सबकुछ समान्य सा नजर आया. जब मैं शाहीन बाग धरना रोड पर पहुंचा तो देखता हूं कि धरनास्थल के पीछे वाले हिस्से में पहुंच गया हूं. वहां धरनास्थल और पुलिस के पहले बैरिकेड के बीच करीब 30 मीटर का फासला था. पुलिस का दूसरा बैरिकेड पहले से करीब 50 मीटर दूर मौजूद था. वहां एक जिप्सी मौजूद थी. सबकुछ सामान्य सा.

Shaheen-bagh-protest, Citizenship Act
शाहीन बाग धरनास्थल जाने से पहले वॉलंटियर्स लोगों की तलाशी लेते हैं, ताकि कोई असामाजिक तत्व न घुस आए.


धरना को सुरक्षित रखने की कवायद



धरनास्थल के पीछे वाले बैरिकेड का नाम पुलिस वालों ने तिरंगा बैरिकेड रख दिया है. क्यों रखा ये तो पता नहीं, लेकिन उस पर कई सारे राष्ट्रीय झंडे जरूर लटके देखे जा सकते थे. बैरिकेड के बगल से ही एक गली गई है. उसका बड़ा गेट बंद था, लेकिन उसका छोटा गेट खुला हुआ था. हम उस ओर बढ़े. तभी एक शख्स ने हमें देखा और हमारी हल्की तलाशी ली. मुझे अचंभा हुआ. वहां तीन-चार और वालंटियर खड़े थे. मैंने पूछा इसका क्या मतलब है. वालंटियर ने जवाब दिया कि ‘धरने में कोई गलत एलिमेंट न आ जाए इसलिए हम हल्की जांच कर रहे हैं.’ मैंने उसके साथ मौजूद बाकी वालंटियर्स से बात की. उनका भी आरोप था ‘बीते दिनों में एक नहीं कई बार ऐसा हुआ है कि धरने में अव्यवस्था फैलाने के मकसद से कुछ गलत लोगों ने इस रास्ते से घुसने की कोशिश की, लेकिन हमारी सतर्कता के चलते ऐसा नहीं हो सका.’ मैंने पूछा आप कहां से हो, उन्होंने कहा हम यहीं से हैं और आपकी तरह ही आम लोग हैं. बस चाहते हैं कि धरना शांति से चले. मैं हैरान था कि एक अव्यवस्थित दिखने वाले धरने का यह पहला चैनल ही इतना व्यवस्थित कैसे है.

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शाहीन बाग धरनास्थल पर मेडिकल कैंप भी लगाया गया है.


वॉलंटियर्स ने संभाल रखी है जिम्मेदारी
मैं अपने साथी के साथ गली के अंदर घुसा. फिर दाईं और मुड़कर दूसरी ओर गली में घुसा जो सीधे धरनास्थल पर जाकर खुलती है. बाहर जरूर सन्नाटा लग रहा था, लेकिन अंदर काफी चहल-पहल थी. रात के करीब 8 बजे का वक्त हो रहा था और बड़ी संख्या में बुर्का पहने महिलाएं धरनास्थल की ओर बढ़ रही थीं. कई महिलाओं के साथ बच्चे भी थे. मैं धरनास्थल पहुंचा. मुख्य स्टेज पर जाने से पहले मेरी नजर एक मेडिकल सेंटर पर पड़ी. उत्सुकतावश मैंने उसे और थोड़ा पास जाकर देखा तो पाया कि वहां कुछ लोग मेडिकल हेल्प मुहैया करा रहे थे. वहां भी कुछ महिलाएं वॉलंटियर के तौर पर तैनात थीं. अब मुख्य धरनास्थल की ओर बढ़ा. देखता हूं कि धरनास्थल के पंडाल में करीब 500 महिलाएं हैं. सामने आजाद, अंबेडकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, अशफाक उल्ला खान और महात्मा गांधी की तस्वीरें लगी हैं. कई वॉलंटियर्स जिसमें युवक-युवतियां दोनों शामिल थे, वो तेजी से सारी व्यवस्थाएं संभाल रहे थे. अलग-अलग वक्ताओं का लगातार आना जाना जारी थी.

शाहीन बाग में जो महिलाएं धरने पर बैठी हैं, उनके बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी वॉलंटियर्स उठा रहे हैं.


बच्चों की क्लास
पाठकों की जानकारी के लिए बता दूं कि इस रोड पर कई शोरूम हैं, जो करीब एक महीने से बंद हैं. धरने के कारण कई बार व्यापारिक नुकसान और ट्रैफिक की समस्या की भी शिकायत की गई है. अब इन शो रूम के बाहरी हिस्सों में छोटे-छोटे बच्चों के लिए पढ़ाई की क्लासें लग रहीं है. जो मांएं धरने पर बैठी हैं, उनके बच्चों को पढ़ाने का काम कई वॉलंटियर्स ने संभाल रखा है. बच्चे दिन में स्कूल से आने के बाद यहीं पर अपनी पढ़ाई करते हैं. इसके अलावा यहां कई बच्चे और युवा स्लोगन वाले पोस्टर भी तैयार करते हुए देखे जा सकते हैं. बच्चों को संभालने और पोस्टर तैयार करने का जिम्मा भी वॉलंटियर्स ने संभाल रखा है.

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शाहीन बाग में सिख समाज ने लंगर की व्यवस्था की है.


सिख समाज का लंगर
यहां भारी संख्या में लोगों के आने के कारण कई फूड स्टॉल भी लगे देखे जा सकते हैं, जहां और जगहों की तरह सामान खरीदना होता है. लेकिन जिस बात की चर्चा सब जगह है, वह है इतने सारे लोगों के लिए खाने का इंतजाम. इसलिए हमने खाने के मामले की भी पड़ताल की. धरनास्थल से कुछ ही दूरी पर हमें एक लंगर का शामियाना नजर आया. जिस पर लिखा था- लंगर शाहीन बाग. हमने वहां व्यवस्था संभाल रहे एक सिख समाज के शख्स डी.एस. बिंद्रा से बातचीत की. उन्होंने बताया कि जब कुछ सौ सिख आए तो उनके लिए हमने खाने का इंतजाम किया. कुछ सामान बचा जिसे यहां के लोगों ने कहा कि गुरुद्वारा पहुंचा दिया जाए, लेकिन हमने यहां लंगर शुरू करने की योजना बनाई है.



500 रुपए का आरोप
बिंद्रा से मैंने जब पूछा कि 500 रुपए लेकर शाहीन बाग में धरने पर महिलाओं के बैठने के आरोपों पर आप क्या कहेंगे तो उन्होंने कहा- मैं एक ही बात कहता हूं जो 500 रुपए वाली भीड़ होती है वो टैंपो में आती है और टैंपो में लदकर चली जाती है. अगर आप 500 रुपए की बात करते हैं तो आप इन महिलाओं की तौहीन कर रहे हैं. जिन बहनों ने अपनी सारी जिंदगी पर्दे के पीछे निकाल दी. अपने पैर का नाखून तक किसी को देखने नहीं दिया, आज उन्हें अगर यहां आकर बैठना पड़ रहा है तो आप समझिए ये कितनी बड़ी कुर्बानी है इन बहनों की.

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शाहीन बाग में आने वालों के लिए इतनी मात्रा में खाना आ रहा है कि आयोजक परेशान हो जाते हैं.


बिरियानी
बाहर से भारी मात्रा में आ रहे खाने ने शाहीन बाग धरने की व्यवस्था संभाल रहे वॉलंटियर्स को भी मुश्किल में डाल दिया है. दरअसल, यहां लोग खुद से ही अपनी-अपनी गाड़ियों में खाना लेकर पहुंच रहे हैं. इनकी आमद इतनी ज्यादा है कि खुद आयोजक भी परेशान हैं. लेकिन गौर करने वाली बात है कि मुख्य पंडाल से खाने की ओर आते कम लोग ही नजर आते हैं, लेकिन जो लोग बाहर से आते हैं या फिर आसपास से जो जुटे हैं, वो खाना लेते नजर आते हैं. खाने को लेकर हो रही चर्चा के चलते आयोजकों ने माइक से ऐलान किया कि कोई भी वॉलंटियर जो वहां का लोकल है और घर से खाना ला सकता है, वह यहां खाना न ले. खुद ऐलान करने वालों ने वहां मंगाया गया खाना न खाने का ऐलान किया. पंडाल में इस ऐलान के बाद जोरदार तालियां बजीं.

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धरनास्थल पर डिटेंशन कैंप और इंडिया गेट की डमी भी लगाई गई है.


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शाहीन बाग धरनास्थल पर बने इंडिया गेट की डमी पर CAA के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन के दौरान मारे गए लोगों के नाम लिखे हैं.


डिटेंशन सेंटर, इंडिया गेट
कल दिनभर रुक-रुक कर बरिश होने के कारण धरनास्थल की हालत अच्छी नहीं थी, लेकिन वॉलंटियर्स पूरी व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे. इस बीच वहां डिटेंशन सेंटर के नाम से एक मॉडल (डमी) बना हुआ था, जिसे लोग देख रहे थे. दाएं वाली लेन में इंडिया गेट की भी डमी बनी हुई थी, जहां सीएए के विरोध में प्रदर्शन के दौरान असम, यूपी में मारे गए लोगों के नाम दर्ज थे. इसी बीच हमने वहां टहलती कुछ युवतियों से बात की. अबुल फज्ल में रहने वाली एक युवती से हमने बात की. हमारा सवाल था, यहां क्यों- उसका सीधा जवाब था- जब तक हमारा हक नहीं मिलेगा तब तक आते रहेंगे. अधिकतर महिलाओं ने ऐसे ही कुछ जवाब दिए.

मुख्य मंच
शाहीन बाग के दो हिस्से हैं- एक जो वहां मौजूद हैं, लेकिन मुख्य पंडाल में नहीं है वो लगातार आ-जा रहे हैं या फिर कुछ दूर खड़े होकर सुन रहे हैं. दूसरे वो जो मुख्य पंडाल में हैं और किसी भी तरह की बाहरी गतिविधि से दूर होकर सिर्फ और सिर्फ वक्ताओं को सुन रहे हैं. वो, दरअसल वहां पंडाल में बठी सैकड़ों महिलाएं थीं. इस दौरान कई वक्ताओं ने अपनी बात रखी लेकिन बीते दिन हुई कुछ आलोचनाओं से परेशान व्यवस्थापकों ने मंच से साफ किया कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल के नेता को कभी भी आमंत्रित नहीं किया. अब वो क्या कर सकते हैं कि उसके बावजूद कुछ नेता मंच पर पहुंच जाते हैं. मंच पर ऐसा भी देखने को मिला कि जो वक्ता थोड़ा भी संयम खोते दिखे उन्हें जल्द अपना भाषण खत्म करने को कहा गया.

शाहीन बाग धरनास्थल पर CAA के खिलाफ संदेश देने वाले पोस्टर और बैनर देखे जा सकते हैं.


खामोशी
देर रात मैं वहां से वापस हुआ. मेरा साथी कुछ देर पहले ही निकल चुका था. वापस उसी रास्ते से. देखता हूं कि बुर्का पहने महिलाओं का तेजी से धरनास्थल की ओर आना जारी है. मैं दूसरे पुलिस बैरियर से होता हुआ तीसरे बैरियर की तरफ बढ़ा. देखता हूं वहां कुछ पुलिसवाले मौजूद थे. मैं फिर शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन की ओर बढ़ गया. कोई हल्ला नहीं, कोई हंगामा नहीं. पुलिस अपनी जगह-शाहीन बाग की महिलाएं अपनी जगह और आंदोलन ढरकते हुए अगले दिन की ओर बढ़ गया.

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First published: January 17, 2020, 2:46 PM IST
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