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पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जयंत चौधरी के भरोसे अखिलेश यादव? RLD करेगी भाईचारा सम्‍मेलन

UP Chunav: वेस्ट यूपी में जयंत चौधरी के साथ अखिलेश यादव की मुलाकातों के चुनावी मायने निकाले जाने लगे हैं.

UP Politics: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और पश्चिमी उप्र में प्रभावशाली रालोद की बढ़ती नजदीकियों से सियासी हलचलें बढ़ीं. अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की मुलाकात के बाद राष्ट्रीय लोकदल ने वेस्ट यूपी में 'भाईचारा सम्मेलन' करने का किया ऐलान.

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    नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच गठजोड़ की सुगबुगाहट दिखने लगी है. इसी क्रम में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी के बीच कुछ दिन पहले हुई मुलाकात के बाद वेस्ट यूपी के जिलों में चुनावी माहौल का आगाज हो गया है. रालोद प्रमुख से अखिलेश यादव की मुलाकात को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं कि संभवतः पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी, जयंत चौधरी के भरोसे ही आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रही है. खुद जयंत चौधरी ने भी सपा प्रमुख से मुलाकात के बाद ट्वीट कर इन कयासों को बल दिया और उसके बाद रालोद की ओर से वेस्ट यूपी के अलग-अलग जिलों में 'भाईचारा सम्मेलन' के आयोजन का ऐलान किया गया है.

    गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने कांग्रेस-सपा गठबंधन के तहत 'खाट पंचायत' कर वोट जुटाने की कवायद की थी. अब अखिलेश-जयंत मुलाकात के बाद रालोद के भाईचारा सम्मेलन का ऐलान, चुनावी हलचलों को और बढ़ाने वाला होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रालोद ने अगले 2 महीनों तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में भाईचारा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है. इसकी शुरुआत मुजफ्फरनगर जिले के खतौली से होगी. आपको बता दें कि वेस्ट यूपी के लगभग दो दर्जन जिलों की 50 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर रालोद का प्रभाव माना जाता है. ऐसे में चुनाव पूर्व भाईचारा सम्मेलन जैसे आयोजनों से वेस्ट यूपी की सियासत में हलचल स्वाभाविक है.

    रालोद ने इन सम्मेलनों के आयोजन के पीछे तर्क दिया है कि मौजूदा माहौल को देखते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता और जातिवाद से मुक्ति का प्रयास करना जरूरी है, जिसको लेकर ही पार्टी वेस्ट यूपी में भाईचारा सम्मेलन का आयोजन करेगी. रालोद का कहना है कि आगामी चुनावों में जाति, धर्म से अलग जमीनी मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचना पार्टी की प्राथमिकता की सूची में है. इसलिए भाईचारा सम्मेलन में विभिन्न जाति और समुदाय के लोगों का जुटान होगा.

    ये भी पढ़ें- दिल्ली में अखिलेश यादव ने क्यों की आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी से मुलाकात, जानें अंदर की बात

    जयंत चौधरी का ट्वीट महत्वपूर्ण
    यूपी चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी ने यह ऐलान कर दिया है कि वह किसी बड़ी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं करेगी. साथ ही छोटे दलों को जोड़ने की रणनीतिक पहल भी पार्टी ने की है. इसके बाद ही अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की मुलाकात हुई. वेस्ट यूपी के अधिकतर जिलों में रालोद की पकड़ को देखते हुए ही अखिलेश और जयंत की मुलाकात के रणनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. खुद जयंत चौधरी ने भी इस मुलाकात के बाद ट्वीट किया, 'उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, श्री अखिलेश यादव जी ने चौधरी साहब को श्रद्धांजलि दी. चौधरी साहब के साथ बिताए समय का अखिलेश यादव जी ने स्मरण भी किया और भविष्य में उत्तर प्रदेश की उभर रही सकारात्मक सम्भावनाओं पर चर्चा की.'

    रालोद के लिए क्यों जरूरी है सपा का साथ
    2022 के चुनावों से पहले सपा का साथ रालोद के लिए क्यों जरूरी है, इस पर गौर करने से पहले पार्टी के चुनावी प्रदर्शनों को देखना होगा. वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में रालोद 38 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 14 पर ही उसे जीत मिली. 2007 में जब मायावती की बसपा ने सरकार बनाई, उस चुनाव में रालोद का प्रदर्शन और सिकुड़ गया और वह महज 10 सीटों पर सिमट गई. 2012 में 46 सीटों पर पार्टी ने प्रत्याशी उतारे, लेकिन जीत सिर्फ 9 पर मिली. इसके बाद 2014 का लोकसभा चुनाव भी निराशाजनक रहा, जब अजीत सिंह और जयंत चौधरी, दोनों पिता-पुत्र भी अपनी सीटें नहीं बचा पाए.

    अपनी जमीन फिर बना रहा रालोद
    बसपा और बीजेपी के बढ़ते प्रभावों के बीच 2017 का विधानसभा चुनाव वेस्ट यूपी में रालोद की शून्य होती मौजूदगी का प्रमाण बना. इन चुनावों में रालोद का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से गिरा और उसका मात्र एक प्रत्याशी ही चुनाव जीत सका. 2017 में छपरौली विधानसभा सीट से रालोद के टिकट पर जीते सहेंद्र सिंह रमाला भी 2018 में बीजेपी में शामिल हो गए. इन सियासी परिस्थितियों को देखते हुए ही रालोद अब 2022 के चुनावों की तैयारी में जुटा है. कोरोना से उपजे हालातों, किसान आंदोलन से गर्माई सियासत के बीच यूपी में बीजेपी को सीधी टक्कर देने वाली पार्टियों में समाजवादी पार्टी अकेली है. यही वजह है कि रालोद ने सपा के साथ जुड़कर अपनी जमीन फिर से बनाने की कवायद शुरू कर दी है.

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