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पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल, पढ़ें रोचक तथ्‍य...

दिल्‍ली के अंतिम कोतवाल गंगाधर नेहरू थे, जोकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा थे.
दिल्‍ली के अंतिम कोतवाल गंगाधर नेहरू थे, जोकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा थे.

दिल्‍ली के आखिरी कोतवाल भी एक नामी शख्सियत थे. दरअसल, दिल्‍ली के अंतिम कोतवाल गंगाधर नेहरू (Gangadhar Nehru) थे, जोकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के दादा थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 25, 2021, 3:51 PM IST
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दिल्ली में पुलिस (Delhi Police) व्यवस्था की शुरुआत करीब 800 साल पुरानी मानी जाती है. तब दिल्ली की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी शहर कोतवाल पर हुआ करती थी. कहा जाता है कि दिल्ली के पहले कोतवाल ईमानदारी की मिसाल थे. उस वक्‍त तुर्की के कुछ अमीर लोगों ने उन्‍हें बेहद मोटी रिश्‍वत की पेशकश थी, लेकिन उन्‍होंने इससे साफ इनकार कर द‍िया था. वहीं, दिल्‍ली के आखिरी कोतवाल भी एक नामी शख्सियत थे. दरअसल, दिल्‍ली के अंतिम कोतवाल गंगाधर नेहरू (Gangadhar Nehru) थे, जोकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के दादा थे.

आइये जानते हैं इस बारे में रोचक तथ्‍य...

दिल्‍ली के पहले कोतवाल..
पिछले 30 वषों से अपराध विषयों पर रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्‍ठ पत्रकार इंद्र वशिष्‍ठ ने इस बारे में विस्‍तृत लेख लिखा है. वह अपने लेख में बताते हैं कि उस समय के शहर कोतवाल से आज देश की सबसे ज्यादा साधन सम्पन्न दिल्ली पुलिस ने लंबी दूरी तय की है. उन्‍होंने न्‍यूज18 हिंदी से बातचीत में बताया कि दिल्ली के पहले कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे. वह सन् 1237 ईसवी में 40 की उम्र में कोतवाल बने. कोतवाल के साथ उन्हें नायब ए गिब्त (रीजेंट की गैरहाजिरी में) भी नियुक्त किया गया था. अपनी ईमानदारी के कारण ही वह तीन सुल्तानों के राज-काल में लंबे अर्से तक इस पद पर रहे.
Delhi First Kotwal
दिल्ली के पहले कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे.




तुर्की के अमीरों ने की थी मोटी रिश्‍वत की पेशकश, लेकिन...
वह कहते हैं कि आज भले ही दिल्ली पुलिस की छवि पर दाग लगते हों, लेकिन पहले के कोतवालों की ईमानदारी के अनेक किस्से इतिहास में दर्ज हैं. मसलन, एक बार तुर्की के कुछ अमीर उमराओं की संपत्ति सुलतान बलवन के आदेश से जब्त कर ली गई. इन लोगों ने सुलतान के आदेश को फेरने के लिए कोतवाल फखरूद्दीन को रिश्वत की पेशकश की. कोतवाल ने कहा, 'यदि मैं रिश्वत ले लूंगा तो मेरी बात का कोई वजन नहीं रह जाएगा.'

कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे खिलजी
एक लेख में उन्‍होंने बताया है, 'उन दिनों कोतवाल का पुलिस मुख्यालय किला राय पिथौरा यानी आज की महरौली में था. इतिहास में इसके बाद कोतवाल मलिक अलाउल मल्क का नाम दर्ज है. जिसे सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में कोतवाल तैनात किया था. सुलतान खिलजी ने एक बार मलिक के बारे में कहा था कि इनको कोतवाल नियुक्त कर रहा हूं, जबकि यह वजीर (प्रधानमंत्री) पद के योग्य हैं. इतिहास में जिक्र है कि एक बार जंग को जाते समय सुलतान खिलजी कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे. सुल्तान ने कोतवाल से कहा था कि जंग में जीतने वाले विजेता को वह यह चाबी सौंप दें और इसी तरह वफादारी से उसके साथ भी काम करें'.

शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल गजनफर खान
मुगल बादशाह शाहजहां ने 1648 में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के साथ ही गजनफर खान को नए शहर शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल बनाया था. गजनफर खान को बाद में कोतवाल के साथ ही मीर-ए-आतिश (चीफ ऑफ आर्टिलरी) भी बना दिया गया.

पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के आखिरी कोतवाल
उन्‍होंने बताया, '1857 की क्रांति के बाद फिंरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसी के साथ दिल्ली में कोतवाल व्यवस्था भी खत्म हो गई. अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के राज काल में उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा और पंडित मोती लाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे. 1857 की क्रांति के बाद फिरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर कत्लेआम शुरू किया तो गंगाधर अपनी पत्नी जियो देवी और चार संतानों के साथ आगरा चले गए. फ़रवरी 1861 में आगरा में ही उनकी मृत्यु हो गई. गंगाधर नेहरू की मृत्यु के तीन महीने बाद मोती लाल नेहरू का जन्म हुआ था'. आइने अकबरी के अनुसार, जब शाही दरबार लगा होता था तब कोतवाल को भी दरबार में मौजूद रहना पड़ता था. वह रोजाना शहर की गतिविधियों की सूचनाएं चौकीदारों और अपने मुखबिरों के जरिए प्राप्त करता था.
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